होड़ से परे फकीरी में ठहरा मन

आज मन कुछ रुका, कुछ ठहरा सा है,

खिन्न नहीं— मौन में कुछ गहरा सा है।

अध्यात्म ने वाणी को थोड़ा थाम लिया,

ईश्वर की सृष्टि पर चिंतन का काम दिया।

प्रभात की रश्मियों संग चेतना जागी,

वैराग्य की कोई सूक्ष्म सी तान लागी।

संसार से नहीं, उस होड़ से हो रही विरक्ति,

जो हर श्वास से निरंतर छीन रही शक्ति।

यशेषणा, धनेषणा, बलेषणा का बंधन,

आँखों पर कसकर बाँधा गया अंधन।

इन्हीं पट्टियों में हम सब हो अनजाने,

अपनों को धकेल रहे हैं अनजान ठिकाने।

यदि चैन की रोटी से श्रेष्ठ कोई सुख हो,

यदि सुकून की नींद से मधुर कोई क्षण हो—

तो कह देना मुझसे, संकोच न तनिक करना,

उस आनंद के सुख से मेरी झोली भी भरना।

मुस्कराती आँखें, करुण हृदय का वास,

इनसे सुंदर क्या होगा—पूछती हर श्वास।

ईश्वर ने सब सुख देकर धरती पर उतारा,

हमने ही त्यौरियों का ताज माथे पर सँवारा।

यश का प्रतिफल है मात्र एकाकीपन,

सिंहासन सदा देता है तन्हाई का आँगन।

शिखर जितना ऊँचा, उतनी ही सूनी राह,

ऊँचाई अक्सर बन जाती है आत्मा की चाह।

बुनियाद बोझ उठाकर भी गुनगुनाती है,

कंगूरों की ऊँचाई बस उदासी ही पाती है।

विकास अनिवार्य है, इसमें न कोई विवाद,

पर शांति त्याग न हो सकता विकास-संवाद।

कमाने की धुन में स्वंय को इतना क्यों उलझाएँ,

कि ख़र्चने को पल भी शेष न रह पाएं?

संभव है मुझे कल फिर वही दौड़ बुलाए,

पर आज “फकीरी” का अनहद मन मेरा गाए।

आज मीरा का नर्तन सत्य-सा भाता है,

राणा का वैभव सामने फीका पड़ जाता है।

कैकेयी के सम्मुख श्रेष्ठ हैं वनवासी राम,

आज अधिक अर्थवान, अधिक निष्काम।

प्रेम के एक क्षण पर जीवन वारने वाले,

आज वही विवेकी, वही हैं उजियाले।

कल मन किस कठिन धारा में बह जाएगा,

क्या पता ये मन कब तक यहीं रुक पाएगा?

और जो सफलता के मापों से हुआ मुक्त,

शांति को चुनकर, सहज-सरल- विरक्त—

उसके पास ही जग का परम सौभाग है,

उसकी मुस्कान में ही जीवन का राग है।

Dr Shailesh Shukla

राजभाषा अधिकारी, एनएमडीसी लिमिटेड [भारत सरकार का उद्यम] हीरा खनन…

राजभाषा अधिकारी, एनएमडीसी लिमिटेड [भारत सरकार का उद्यम] हीरा खनन परियोजना, मझगवाँ, पन्ना (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए.(हिंदी), एम.ए.(जनसंचार), पीएचडी प्रकाशन : भारत सहित विश्व के अनेक देशों से प्रकाशित विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं - अस्मिता, राजभाषा भारती,

Comments ( 1)

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डॉ मुकेश 'असीमित'

2 hours ago

यह कविता भीतर के शोर को धीरे-धीरे मौन में बदल देती है। यश और वैभव के शिखर के नीचे छिपी तन्हाई को उजागर करते हुए यह रचना याद दिलाती है कि सच्चा सुख ठहरने, मुस्कराने और करुण होने में है—न कि आगे निकल जाने में।