आज रपट जाएँ तो हमें न उठइयो…
बड़ा ऐतिहासिक दिन है आज का जी। लोकतंत्र के रहनुमाओं की आत्मस्वीकृति का दिन—“भाइयो-बहनो, आज अगर हम रपट जाएँ… तो हमें न उठइयो।” मानो आदत से मजबूर होकर सबने बेशर्मी को धारण कर लिया हो, जैसे सबने अपने माथे पर लिख लिया हो—“फिसलन हमारी फितरत है, और माफ़ी माँगना हमारी नीति।”
उधर न्यूज़ मीडिया पहले से तैयार बैठा था। एंकर ने गला खंखारा और घोषणा की—“आज की सबसे बड़ी खबर—देश में सामूहिक फिसलन!” फिर कैमरे की तरफ झुककर बोला—“हम आपको सबसे पहले दिखा रहे हैं कि कैसे हर वर्ग अपने-अपने अंदाज़ में रपट रहा है। और हाँ, अगर हम भी टीआरपी की सीढ़ी पर चढ़ते-चढ़ते थोड़ा फिसल जाएँ, तो हमें न उठइयो… ब्रेक के बाद हम खुद ही उठकर फिर संभल जाएँगे—‘एक्सक्लूसिव!’”
सबसे पहले नेताजी ने माइक संभाला। चेहरे पर वही चुनावी सियार-सी करुणा, आँखों में विकास का धुंधलका भरा गीड। बोले—“देखिए, हम तो सेवा के लिए आए हैं। अब अगर कभी-कभार बयान फिसल जाए, वादा इधर से उधर सरक जाए, तो उसे गिरना मत समझिए… वह तो लोकतांत्रिक लचक है। तने रहना, जमे रहना—अड़ियलता है, ढिठाई है… गिरना और फिसलना ही जीवंतता है। आज अगर हम रपट जाएँ तो हमें न उठइयो… बस अगली रैली तक हमें संभलने दीजिए।” और यह कहते-कहते वे खुद ही अपने शब्दों पर फिसलकर दूसरे वादे पर पहुँच गए, जैसे वादे उनके लिए स्लाइड हों और जनता को मनोरंजन पार्क का मुफ्त टिकट दे दिया गया हो।
तभी साहित्यकार मंच पर आए। चेहरे पर गंभीरता, शब्दों में करुणा और जेब में पुरस्कार आवेदन पत्र। उन्होंने धीमे से कहा—“हम तो समाज का दर्पण हैं। अब दर्पण ही टेढ़ा हो जाए तो इसमें हमारा क्या दोष? अगर कभी हम सत्य से फिसलकर प्रशंसा में जा गिरें, या आलोचना से फिसलकर चाटुकारिता में पहुँच जाएँ… तो हमें न उठइयो। आखिर साहित्य भी तो समय का साथ देता है—और समय आजकल बहुत ही चिकना चल रहा है।” रचना सुनाते वक्त चार बार उनकी जुबान फिसली… साहित्य की शब्दावली कब फिसलकर गालीवली पर आ गई, उन्हें पता ही न चला।
फिर धर्मगुरु जी का प्रवेश हुआ। उन्होंने आते ही फिसलन को आध्यात्मिक ऊँचाई दे दी। बोले—“वत्स, यह संसार ही माया है। यहाँ सब कुछ अस्थिर है—भटकाव है, फिसलन है। अगर हम भी कभी प्रवचन से फिसलकर प्रपंच और पाखंड-व्यवसाय में जा गिरें, या त्याग से फिसलकर संग्रह में… या मोक्ष से मोह-माया में… तो हमें न उठइयो। यह सब पूर्व जन्म के कर्मों का खेल है।”
अब बारी थी अफसर और बाबू की। बाबूजी फाइल लेकर आए और बोले—“देखिए, हम तो नियम से बंधे हैं… नियम की फाँस में ही मुहक्किल को बाँधते हैं। अब अगर कभी फाइल ‘लंबित’ से ‘स्वीकृत’ पर फिसल जाए, या नोटिंग में ‘विचारणीय’ से ‘अनिवार्य’ हो जाए… तो हमें न उठइयो। यह सब प्रक्रिया का हिस्सा है।” अफसर साहब ने तुरंत समर्थन किया—“हाँ, और अगर हम भी कभी जिम्मेदारी से फिसलकर ‘जांच बैठा दी जाएगी’ पर आ टिकें, तो इसे गिरना मत कहिए… यह प्रशासनिक संतुलन है।”
और अंत में आया आम आदमी। वह थोड़ा हिचकिचाया, फिर बोला—“भैया, मैं तो रोज़ ही फिसलता हूँ—सड़क पर, घर में, ऑफिस में, राशन की लाइन में, लोन की किस्तों में, फुटपाथ पर, सिस्टम में, सपनों में… हर जगह। अब अगर आज भी रपट जाऊँ तो मुझे मत उठाना, क्योंकि उठने की आदत तो है ही। मेरी फितरत में फिसलना नहीं था… पर आपने सिखा दिया।”
आम आदमी की फिसलन भला कब नोटिस होने वाली थी? बड़ा बोरिंग-सा यह फिसलना तो रोज़ ही दिखता है… आदत-सा हो गया है। इसे मंच पर शामिल भी क्यों कर लिया? अरे, यह आम आदमी रपट रहा है तो इसे माफ़ी माँगने की क्या ज़रूरत… किसको फर्क पड़ता है इसके गिरने से!
सबने एक-दूसरे को देखा… रपट सब ही रहे हैं तो ऐसे रपटने में शर्मिंदगी कैसी! सामूहिक फिसलन का संकल्प ले लिया गया—“हम गिरेंगे, फिसलेंगे, मुकरेंगे और फिर मुस्कुराकर कहेंगे—क्या करें, फितरत में ही फिसलना है।”
लोकतंत्र किनारे खड़ा यह सब देख रहा था। उसने गहरी साँस ली और बोला—“वत्स, यहाँ उठाने वाले कम हैं, गिरने वाले अधिक। इसलिए तुम सब निश्चिंत होकर फिसलो… यहाँ गिरना ही व्यवस्था है।”
और फिर सब अपने-अपने रास्ते चल दिए—कोई बयान पर फिसलता हुआ, कोई सिद्धांत पर, कोई सच्चाई पर… और हर कोई मन ही मन गुनगुना रहा था—
“आज रपट जाएँ तो हमें न उठइयो…
यार क्या करें… फितरत में ही फिसलना है…”
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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