विकास का विस्तृत वितान: सूक्ष्म उद्योगों से सशक्त होता उत्तर प्रदेश और सुदृढ़नेतृत्व की सार्थक साधना


समय की सतत सरिता में जब शासन की सजगता, संकल्प की सुदृढ़ता और समाज की सहभागिता एक
साथ संगम करती है, तब विकास केवल आंकड़ों का आभूषण नहीं रहता, बल्कि जनजीवन का जमीनी
यथार्थ बन जाता है। आज उत्तर प्रदेश इसी यथार्थ का जीवंत उदाहरण बनकर उभर रहा है। विशेष रूप से
सूक्ष्म, लघु और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के क्षेत्र में जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वह केवल योजनाओं
का परिणाम नहीं, बल्कि नेतृत्व की दूरदर्शिता, प्रशासन की दक्षता और नीति के प्रभावी क्रियान्वयन का
समन्वित स्वरूप है। प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना, जिसे सामान्यतः पीएमएफएमई
योजना कहा जाता है, में उत्तर प्रदेश का देश में प्रथम स्थान प्राप्त करना इस व्यापक परिवर्तन की एक
सशक्त और प्रमाणिक अभिव्यक्ति है।
अब तक उत्तर प्रदेश इस योजना के अंतर्गत 2000 करोड़ रुपये से अधिक के टर्म लोन स्वीकृत कर देश में
शीर्ष स्थान पर पहुँच गया है, और यह उपलब्धि केवल वित्तीय विस्तार नहीं, बल्कि विश्वास, व्यवस्था और
विकास की त्रिवेणी का परिणाम है। इस योजना के अंतर्गत स्वीकृत प्रस्तावों की संख्या भी सर्वाधिक रही है,
जहाँ 7340 प्रस्तावों को स्वीकृति दी गई और लगभग 98 प्रतिशत का स्ट्राइक रेट दर्ज किया गया, जो
राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन का द्योतक है। यह आँकड़े केवल उपलब्धि नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक
सक्रियता का प्रमाण हैं, जिसने योजनाओं को फाइलों से निकालकर फर्श तक पहुँचाया।
यदि इस सफलता की संरचना को गहराई से समझें, तो स्पष्ट होता है कि उत्तर प्रदेश ने सूक्ष्म उद्योगों को
केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की आधारशिला के रूप में देखा है। प्रधानमंत्री सूक्ष्म
खाद्य उद्योग उन्नयन योजना का मूल उद्देश्य छोटे उद्यमियों को वित्तीय, तकनीकी और विपणन
सहायता प्रदान करना है, और इस योजना के लिए केंद्र सरकार द्वारा 10000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया
गया है, जैसा कि भारत सरकार के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की आधिकारिक जानकारी में
उल्लेखित है। इस योजना के अंतर्गत देश भर में लाखों सूक्ष्म इकाइयों को सहायता प्रदान की जा रही है, और
उत्तर प्रदेश ने इस प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभाई है।

यहाँ यह समझना भी आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश की सफलता केवल ऋण वितरण तक सीमित नहीं है,
बल्कि यह एक सुव्यवस्थित तंत्र का परिणाम है। राज्य में प्रत्येक जिले में जनपदीय संसाधन व्यक्तियों की
नियुक्ति की गई है, जो उद्यमियों को योजना की जानकारी, आवेदन प्रक्रिया और इकाई स्थापना में
मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। यह व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि सरकार केवल योजनाएँ घोषित नहीं कर
रही, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए संस्थागत ढाँचा भी तैयार कर रही है।
इस योजना के अंतर्गत औसत टर्म लोन लगभग 10 लाख रुपये और औसत अनुदान राशि लगभग 4 लाख
रुपये प्रति इकाई स्वीकृत की जा रही है। यह वित्तीय सहायता छोटे उद्यमियों के लिए केवल पूंजी नहीं,
बल्कि संभावनाओं का पंख है, जिससे वे अपने व्यवसाय को विस्तार दे सकते हैं। यह वही प्रक्रिया है, जिसे
‘नीति से नीयत और नीयत से परिणाम’ की यात्रा कहा जा सकता है।
यदि इस उपलब्धि को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि उत्तर प्रदेश ने सूक्ष्म, लघु और
मध्यम उद्यमों को विकास का केंद्रीय स्तंभ बनाया है। यह दृष्टिकोण उस समय और अधिक महत्वपूर्ण हो
जाता है, जब वैश्विक स्तर पर रोजगार सृजन और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता
महसूस की जा रही है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग विशेष रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है,
क्योंकि यह कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन करता है और किसानों की आय में वृद्धि करता है।
समाचार विश्लेषणों में यह भी उल्लेख किया गया है कि इस योजना के माध्यम से अब तक 24197 से
अधिक इकाइयों को अनुदान की स्वीकृति प्रदान की जा चुकी है। यह संख्या केवल उद्योगों की नहीं, बल्कि
परिवारों की समृद्धि और युवाओं के रोजगार का संकेत है। प्रत्येक इकाई के पीछे एक उद्यमी का सपना,
एक परिवार की आशा और एक समाज की प्रगति जुड़ी होती है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश ने इस योजना के क्रियान्वयन में समयबद्धता और पारदर्शिता
को प्राथमिकता दी है। औसत स्वीकृति समय लगभग 100 दिन रखा गया है, जो प्रशासनिक दक्षता का
स्पष्ट संकेत है। यह वही गति है, जो विकास को गतिशील बनाती है और निवेशकों का विश्वास बढ़ाती है।
इस पूरी प्रक्रिया में नेतृत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश में शासन की शैली में जो परिवर्तन
देखने को मिला है, उसमें निर्णय की दृढ़ता, क्रियान्वयन की निरंतरता और परिणाम की प्रतिबद्धता स्पष्ट
रूप से दिखाई देती है। योजनाओं को केवल घोषणा तक सीमित न रखकर, उन्हें लक्ष्य आधारित और
परिणाम केंद्रित बनाया गया है। यही कारण है कि आज उत्तर प्रदेश की नीतियाँ केवल राज्य तक सीमित
नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन रही हैं।

यदि इस उपलब्धि को राष्ट्रीय संदर्भ में देखें, तो यह भी स्पष्ट होता है कि अन्य राज्यों की तुलना में उत्तर
प्रदेश ने इस योजना के क्रियान्वयन में अधिक सक्रियता दिखाई है। जहाँ अन्य राज्यों में योजना का प्रभाव
सीमित रहा, वहीं उत्तर प्रदेश ने इसे व्यापक स्तर पर लागू किया और अधिक से अधिक लाभार्थियों तक
पहुँचाया। यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
सूक्ष्म खाद्य उद्योगों का विकास केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी माध्यम है। यह
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करता है, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाता है और स्थानीय उत्पादों
को राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस प्रकार यह योजना “वोकल फॉर
लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” की अवधारणा को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
प्रयागराज जैसे जिलों में इस योजना के सफल क्रियान्वयन के उदाहरण भी सामने आए हैं, जहाँ हजारों
उद्यमियों को वित्तीय सहायता प्रदान की गई और अनेक इकाइयाँ स्थापित हुईं। यह दर्शाता है कि यह
सफलता केवल राज्य स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि जिला स्तर तक भी प्रभावी रूप से पहुँची है।
यह भी उल्लेखनीय है कि इस योजना के अंतर्गत सामाजिक समावेशन पर भी विशेष ध्यान दिया गया है।
विभिन्न सरकारी आंकड़ों में यह उल्लेख किया गया है कि बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति, जनजाति और
अन्य पिछड़ा वर्ग के लाभार्थियों को इस योजना के तहत सहायता प्रदान की गई है, जिससे सामाजिक न्याय
और आर्थिक समानता को बढ़ावा मिला है।
इस पूरी प्रक्रिया को यदि काव्यमय दृष्टि से देखें, तो यह विकास का वह दीपोत्सव है, जिसमें प्रत्येक उद्यमी
एक दीपक है और प्रत्येक योजना एक प्रकाश। यह वह परिवर्तन है, जहाँ परिश्रम की पगडंडी पर प्रगति का
पथ प्रशस्त हो रहा है, और संभावनाओं के पंखों पर सफलता का सूरज उग रहा है।
निष्कर्षतः यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश का यह मॉडल केवल एक योजना की सफलता नहीं, बल्कि शासन की
सशक्त संरचना, नेतृत्व की दूरदर्शिता और समाज की सहभागिता का समन्वित परिणाम है। यह वह
उदाहरण है, जो बताता है कि यदि नीति, नीयत और नियोजन में समरसता हो, तो विकास केवल लक्ष्य नहीं,
बल्कि उपलब्धि बन जाता है।
समय की सशक्त सीख यही है कि विकास का वास्तविक अर्थ तभी साकार होता है, जब वह अंतिम व्यक्ति
तक पहुँचे। उत्तर प्रदेश ने इस दिशा में जो प्रयास किए हैं, वे न केवल प्रशंसनीय हैं, बल्कि प्रेरणादायक भी हैं।
यह मॉडल बताता है कि सशक्त नेतृत्व, सतत संकल्प और सजग शासन के माध्यम से कोई भी प्रदेश

प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकता है। यही कारण है कि आज उत्तर प्रदेश का यह विकास मॉडल देश भर में
लोकप्रिय हो रहा है और भविष्य के भारत की दिशा निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

Dr Shailesh Shukla

Dr Shailesh Shukla

राजभाषा अधिकारी, एनएमडीसी लिमिटेड [भारत सरकार का उद्यम] हीरा खनन…

राजभाषा अधिकारी, एनएमडीसी लिमिटेड [भारत सरकार का उद्यम] हीरा खनन परियोजना, मझगवाँ, पन्ना (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए.(हिंदी), एम.ए.(जनसंचार), पीएचडी प्रकाशन : भारत सहित विश्व के अनेक देशों से प्रकाशित विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं - अस्मिता, राजभाषा भारती,

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