अब व्यंग्य-विमर्श में हाथ आज़माया जाए | साहित्यिक विमर्श पर आत्मव्यंग्य

अब व्यंग्य-विमर्श में हाथ आज़माया जाए

, डॉ. मुकेश असीमित

व्यंग्य खूब पका लिया। हांडियाँ भरी हैं। बाकायदा लंगर लगा रखा है। कोई खाने वाला नहीं था, फिर भी लिखता गया। लिखा इसलिए भी कि सब लिख रहे हैं तो मैंने सोचा, मैं भी लिख लेता हूँ। कुछ पुरस्कार-सम्मान पद, आयोग वगैरह, रॉयल्टी, मानदेय, कुछ मंच, माला, माइक,सबकी अपनी-अपनी संभावनाएँ हैं। खूब छप भी लिया। सो लिखता गया।

फिर किसी ने कहा,
“आप लगातार लिख रहे हैं।”

मैंने कहा,
“लेखन रियाज़ माँगता है।”

वो हँसे। जोर से हँसे।

बोले,
“यार, बड़े-बड़े व्यंग्यकार दो जून की रोटी एक ही रचना से कमा लेते हैं। वही किताब में, वही कोर्स में लग गई, उसी पर पुरस्कार पा गए, उसी पर शोध हो गया। वही ओढ़ना, वही बिछौना।”

एक दूसरे ने कहा,
“आप बहुत लिख रहे हैं।”

मैंने इसे उपलब्धि माना।

एक वरिष्ठ ने अंततः कहा,
“आप रुकते क्यों नहीं?”

तब भी मैं संकेत नहीं समझा।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है, व्यंग्य को जितना बिगाड़ सकता था, उतना बिगाड़ लिया मैंने। इससे ज्यादा बिगाड़ना अब मेरे वश की बात नहीं।

अब आगे क्या किया जाए?

मनुष्य का स्वभाव है,एक क्षेत्र में पर्याप्त नुकसान करने के बाद दूसरे क्षेत्र में संभावनाएँ तलाशता है। राजनीति में विभाग बदलते हैं, प्रशासन में पद बदलते हैं, व्यापार में उत्पाद बदलते हैं। साहित्य में लेखक ही क्यों एक ही विधा से चिपका रहे?

बहुत सोचा।

मैंने अपनी यह मंशा एक पहुँचे हुए व्यंग्यकार के सामने जाहिर की।

पूछा,
“अब आगे क्या?”

वे बोले,
“यार, विमर्श में हाथ आजमाओ। अब यही बचा है। यहाँ अच्छी-खासी चाँदी कूटी जा सकती है।”

मुझे लगा,यही वह क्षेत्र था जहाँ मेरी प्रतिभा अब तक बेरोजगार बैठी थी।

व्यंग्य लिखकर मैं केवल अपनी रचनाओं को नुकसान पहुँचा रहा था। विमर्श में उतरकर पूरे व्यंग्य-साहित्य को छेड़ सकता था। दरअसल यह खासकर मेरी कमजोर रचनाओं, मृतप्राय रचनाओं को सीपीआर देने जैसा है। शुरुआत अपनी रचनाओं से ही करूँगा। उनमें सात अर्थ, नौ संकेत और ग्यारह अंतर्ध्वनियाँ खोजने में मैं माहिर हूँ।

अच्छी रचना तो पाठक खुद समझ लेता है। असली विद्वत्ता वहाँ है जहाँ लेखक को भी अपनी रचना का अर्थ पहली बार विमर्शकार से पता चले।

मैंने तय किया,अब पाठक से यह नहीं कहूँगा,
“मेरी रचना पढ़िए।”

कहूँगा,
“पहले यह समझिए कि मेरी रचना को पढ़ा कैसे जाना चाहिए। कौन-सी नजर से, किस नजरिए से, किस विचारधारा की रस्सी में बाँधकर मेरी रचना पढ़ी जाए।”

यही लेखक की अगली अवस्था है। साधक से सिद्ध बनने के बाद आदमी साधना कम करता है और उपदेश अधिक देता है। मैं भी अब सिद्धि की ओर अग्रसर हूँ।

तो कहाँ से शुरू करूँ?

सुझाव आया,विमर्श-संगोष्ठियों में अच्छा-खासा किया जा सकता है। खासकर अगर हाथ में समोसा हो तो विमर्श अपने आप निकलता है।

मुझे विमर्श के रूल-रेगुलेशन समझने में ज्यादा समय नहीं लगा। संगोष्ठी के निमंत्रण में सबसे ऊपर यह लिख देना है,

“सहभोज आप हमारे साथ करेंगे।”

वो क्या है, श्रोता को पता रहना चाहिए कि पूरा विमर्श सुनने के बाद ही खाना मिलेगा। वक्ता और श्रोता साथ-साथ भोजन करेंगे। इससे श्रोता आखिरी वक्तव्य तक टिके रहने की नैतिक शक्ति जुटा लेता है।

मैंने कुछ जरूरी शब्द नोट कर लिए हैं,

अस्मिता, प्रतिरोध, विघटन, अंतर्पाठ, लोकधर्मिता, सरोकार, विमर्श और संरचना।

बहुत हैं। इतने से काम चल जाएगा।

मैं यही करता हूँ,हर वाक्य में इनमें से एक-दो शब्द डाल देता हूँ।

आपकी भी कोई रचना पर विमर्श करवाना है तो मुझे बताइए। खर्च अपना ज्यादा कुछ नहीं है। हॉल का किराया, समोसे-चाय का खर्च लगेगा। बस मेरी दो-चार किताबें बिकवा दें तो मेहरबानी होगी आपकी।

बहुत कुछ अभ्यास कर लिया है।

पहले अपनी रचना के बारे में मैं कहता था,
“मेरी रचना में महँगाई पर अच्छा लिखा है।”

अब ऐसे नहीं कहूँगा।

अब कहूँगा,

“रचनाकार ने बाजारवादी संरचना के भीतर आम आदमी की विखंडित अस्मिता को लोकधर्मी प्रतिरोध की अंतर्पाठीय चेतना में रूपायित किया है।”

विमर्शकार की पोशाक पर भी विचार किया है। लेखक साधारण कपड़ों में चल सकता है, विमर्शकार को गंभीर दिखना पड़ता है। आँखों पर ऐसा चश्मा हो जिससे लगे कि वह दुनिया नहीं, प्रवृत्तियाँ देखता है। हाथ में दो-तीन किताबें रहें। पढ़ना आवश्यक नहीं; किताबें विमर्शकार के लिए वही काम करती हैं जो डॉक्टर के गले में स्टेथोस्कोप,विश्वास पैदा करती हैं।

मैं एक विमर्श-मंडली भी बनाने की सोच रहा हूँ।

चार लोग एक-दूसरे को महत्वपूर्ण घोषित करेंगे। पहला दूसरे को गंभीर अध्येता बताएगा, दूसरा तीसरे को समय का जरूरी हस्ताक्षर, तीसरा चौथे को व्यंग्य-चेतना का विशिष्ट स्वर और चौथा बाकी तीनों पर शोधपत्र पढ़ देगा।

साहित्य का पारिस्थितिकी तंत्र तैयार हो गया, यूँ समझिए।

एक नए रचनाकार , मेरे से दो महीने बाद लिखना शुरू किया था। मैं उन्हें नवोदित मानता हूँ। मैंने धर दबोचा उन्हें एक दिन।

कहा,
“लिख तो अच्छा रहे हो, लेकिन तुम्हारे यहाँ विमर्श की कमी है।”

उन्होंने पूछा,
“यह विमर्श कैसे डालूँ रचना में?”

मैंने कहा,
“ऐसे नहीं…”

फिर गंभीर होकर समझाया,
“अगली संगोष्ठी में आइए।”

हर शहर में व्यंग्य-चिंतन शिविर होना चाहिए। उद्घाटन, बीज वक्तव्य, मुख्य वक्तव्य, अध्यक्षीय वक्तव्य और बीच में चाय-समोसे। चाय-समोसे साहित्य के लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं। गंभीर विमर्श प्रायः उन्हीं के पास जन्म लेते हैं और समोसे खत्म होते ही दम तोड़ देते हैं।

देखिए, व्यंग्य-विमर्श में व्यंग्य की जो दुर्गति हमने की है, उसको देखकर एक सदाबहार चिंता के सहारे मैं हजारों गोष्ठियाँ करवा सकता हूँ,बशर्ते कोई आयोजक झाँसे में आ जाए।

विषय रहेगा,

“व्यंग्य कहाँ जा रहा है?”

किसी को पता नहीं होगा कि वह अभी कहाँ है, फिर भी शाम तक सर्वसम्मति से घोषित कर दिया जाएगा कि व्यंग्य जहाँ भी जा रहा है, वहाँ संकट में है।

हर विधा के साथ यही है। कोई भी विधा ऐसी नहीं जो संकट में नहीं है। साहित्य में सभी विधाएँ करुण पुकार कर रही हैं साहित्य-साधकों से,

“अब तो निकालो प्रभु, इस संकट से!”

कितनी गलत बात है कि बिना इस संकट पर विमर्श किए ही बीच में किताबें छप रही हैं, पुरस्कार मिल रहे हैं, विशेषांक निकल रहे हैं।

व्यंग्य भी यदि संकट में न हो तो विमर्श का रोजगार कैसे चले?

जिसे बचाना है, पहले उसे संकटग्रस्त तो घोषित करो।

जीवन में यही सबसे सफल मॉडल है।

और केवल व्यंग्य-विमर्श पर्याप्त नहीं होगा। व्यंग्य-विमर्श पर विमर्श होगा, उस विमर्श की समीक्षा होगी, समीक्षा पर प्रतिक्रिया, प्रतिक्रिया पर प्रत्युत्तर और अंत में इन सब पर विशेषांक निकाला जाएगा।

उसके लिए “भिक्षां देहि” पात्र घुमाया जाएगा।

तब साहित्य को लगेगा कि कुछ गंभीर काम हुआ है।

बस एक डर है,कहीं कोई सिरफिरा पूछ न बैठे,

“अच्छी व्यंग्य रचनाएँ कौन लिखेगा?”

ऐसे प्रश्न विमर्श के वातावरण के लिए हानिकारक हैं। उसे तुरंत समझाया जाएगा,

“रचना तो कोई भी लिख लेता है; असली काम यह तय करना है कि वह किस परंपरा में है, किस प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करती है और लेखक किस खेमे में बैठा हुआ है।”

सच कहूँ तो व्यंग्य लिखते-लिखते थक भी गया हूँ। हर बार विषय खोजो, भाषा सँवारो, पंचलाइन सोचो और पाठक को अंत तक पकड़े रखो।

विमर्श में सुविधा है।

विषय सामने वाला कहीं न कहीं से उड़ा चुका है; हमें केवल उसकी धज्जियाँ उड़ानी हैं।

इसलिए निर्णय हो चुका है।

साहित्य की इस अँधेरी रात में जब इतने लोग अपनी-अपनी चाँदी काट रहे हैं, तब हम अकेले लालटेन लेकर क्यों घूमें?

हम भी चाँदी काटेंगे।

कल तक मैं व्यंग्यकार था।

अब व्यंग्य-विमर्शकार बनने जा रहा हूँ।

और जिस दिन व्यंग्य की टेढ़ी पूँछ मेरे हाथों सीधी हो गई, उस दिन व्यंग्य भले पहचान में न आए,

विमर्श के इतिहास में मेरा नाम अवश्य दर्ज हो जाएगा।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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