भाषा और मेरा रिश्ता
भाषा और मेरा रिश्ता—
जैसे जेब की तह में रखी पुरानी चिट्ठी,
हर मौसम में खुलते ही
बस महक उठे सोंधी मिटटी ।
भाषा और मेरा रिश्ता—
जैसे अँधेरे में जलती लालटेन,
रास्ता भी दिखाए, मन भी जगाए,
गीत बन जाए—
“चलते रहो, थको नहीं, रुको नहीं…”
भाषा और मेरा रिश्ता—
जैसे भीड़ में माँ की पुकार,
अनजान गलियों में दिशा बताती,
देती मेरी संवेदनाओं को आकार।

भाषा और मेरा रिश्ता—
जैसे बचपन का आँगन,
झूले की रस्सी पर बंधी हँसी,
“कभी मुक्त, कभी बंधी,
फिर भी मेरी साँसों से गुँथी, यादों में फँसी।”
भाषा और मेरा रिश्ता—
सिर्फ़ शब्द नहीं, है धड़कन भी ,
सिर्फ़ अर्थ नहीं, है स्वर भी ,
यह गीत है, यह छंद है, यह लय है—
“साँसों की लयबद्ध सरगम,
मन और मिट्टी का शाश्वत संगम।”
और मैं—
भाषा के बिना वही हूँ,
जैसे बिना पते की पाती ,
“जैसे बिना सुर का गायक,
जैसे अधूरा सपना दिन-राती।”

✍ लेखक, 📷 फ़ोटोग्राफ़र, 🩺 चिकित्सक
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