बीबी कहां छिटक गई
लल्लन के दिमाग में
दिल्ली नगर की छाप थी,
हवा में उड़ती ट्रेन और
रौनकें अपार थी।
ले चलें बीबी को अपने
सैर दिल्ली क्या हुईं,
उड़ गए जब होश उनके
बीबी कहां छिटक गई।
जेब जो अलग कटी
असबाब दिल्ली खा गई।
बहुत शोर सुनते थे हाथी की पूंछ का,
निकट आ के देखा तो डोर हिल रहीं थीं।
अप्रकाशित है ।
डा राम कुमार जोशी
Ram Kumar Joshi
Feb 11, 2026
हिंदी कविता
2 Comments
Comments ( 2)
Join the conversation and share your thoughts
Jitendra B Vyas
2 months agoहल्के व्यंग्य में गहरी बात कहने की अद्भुत क्षमता—बहुत प्रभावशाली कविता।
डॉ मुकेश 'असीमित'
2 months agoयह कविता महानगर दिल्ली की चकाचौंध, अव्यवस्था और आम आदमी की असहजता पर तीखा, लेकिन हल्का-फुल्का व्यंग्य है। ‘बीबी कहाँ छिटक गई’ सिर्फ़ एक व्यक्ति के खोने की बात नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की स्थिति का रूपक है, जो महानगरीय भीड़, जेबकतरी, शोर और भ्रम में स्वयं को खो बैठता है। हाथी की पूँछ और हिलती डोर जैसी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ सत्ता, व्यवस्था और भ्रमजाल पर करारा कटाक्ष करती हैं। कविता सरल भाषा में शहरों की जटिल सच्चाई उजागर करती है।