कैपविहीन कलम का करुण क्रंदन
डॉक्टर साहब की जिंदगी पेन की कैप पर अटक गई है। कभी स्टाफ फेंक देता है, कभी चूहा चुरा लेता है! कैपविहीन पेन की स्याही उनकी जेब पर हमला बोल देती है। यह मज़ेदार व्यंग्य बताता है — असली ताक़त अब कैप में है, पेन में नहीं!
डॉक्टर साहब की जिंदगी पेन की कैप पर अटक गई है। कभी स्टाफ फेंक देता है, कभी चूहा चुरा लेता है! कैपविहीन पेन की स्याही उनकी जेब पर हमला बोल देती है। यह मज़ेदार व्यंग्य बताता है — असली ताक़त अब कैप में है, पेन में नहीं!
श्रीमती बिंदिया ढहया लेखिका बनने के बाद अब "एडमिन" बनने पर अड़ी हैं — फेसबुक पेज, लाइव कार्यक्रम, महिला मंच... सब कुछ चाहिए उन्हें! बेटा और पति परेशान, पर बिंदिया जी का आत्मबल चट्टान-सा अडिग। जैसे पड़ोसी देश अड़ते हैं, वैसे ही बिंदिया जी भी साहित्यिक क्रांति में जुटी हैं। उन्हें न आलोचना से फर्क पड़ता है, न गॉसिप से। अब वे महिलाओं को खुद की पहचान बनाने की प्रेरणा दे रही हैं — क्योंकि आज का नारा है: अड़ी रहो सखियों, क्योंकि ये ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा।
जब हम छोटे थे तो समझते थे कि सबसे ताकतवर लोग पुलिसवाले होते हैं, फिर बड़े हुए तो लगा कि मंत्री सबसे ताकतवर होते हैं। लेकिन जैसे ही किसी सरकारी या कॉरपोरेट दफ्तर में कदम रखा, सच्चाई की बिजली गिरी— सबसे ताकतवर तो सामग्री विभाग का प्रमुख (Head of Material Department) होता है! यह कोई […]
तुम भगवान हो, तो गलती नहीं कर सकते — क्योंकि इंसान की तो गलती माफ़ होती है। अब जब भगवान बना दिया है, तो ये भी जान लो... इंसानों के हक़ मांगोगे, तो चोला उतार फेंका जाएगा। क्या कहा? छुट्टी चाहिए? भगवानों को छुट्टी नहीं मिलती... बस पूजा मिलती है या पत्थर!
"डॉक्टर साहब, आपकी पढ़ाई अपनी जगह… हम तो इसे 'नस जाना' ही मानेंगे!" ग्रामीण चिकित्सा संवादों में हर लक्षण का एक लोकनाम है — 'चक चली गई', 'हवा बैठ गई', 'गोड़ा बोल गया', 'ऊपर की हवा का असर है'। ये केवल शब्द नहीं, एक पूरी चिकित्सा-व्याख्या है, जिसमें विज्ञान, विश्वास और व्यंग्य की त्रिवेणी बहती है। गाँव के मरीज डॉक्टर से नहीं, खुद अपनी बीमारी का निदान लेकर आते हैं। इस लेख में इन्हीं रंग-बिरंगे अनुभवों, प्रतीकों और मुहावरों के ज़रिए एक लोक-चिकित्सा संस्कृति का हास्य-चित्रण किया गया है।
“गालियों का बाज़ार” नामक उस लोकतांत्रिक तमाशे का प्रतीक है जहाँ भाषाई स्वतंत्रता के नाम पर अपशब्दों की होड़ है। हर कोई वक्ता है, हर गाली एक ब्रांड। संविधान की आड़ में तर्क नहीं, तापमान बढ़ाया जा रहा है। यह व्यंग्य मौजूदा सोशल-मीडिया और राजनीति की भाषा पर करारा प्रहार है।
पुरस्कारों की चमक साहित्यकारों को अक्सर पितृसत्ता की टोपी पहना देती है। ये ‘गुप्त रोग’ बनकर छिपाया भी जाता है और पाया भी जाता है, झाड़-पोंछकर अलमारी में रखा जाता है। साहित्यिक संसार में आज पुरस्कार एक ‘औषधि’ है – बिना मांगे मिल जाए तो शक होता है, न मिले तो रोग गहराता है।
एक तीखा हास्य-व्यंग्य जो दिखावे के मदर्स डे और असल माँ के संघर्षों के बीच की खाई को उजागर करता है। सोशल मीडिया की चमक के पीछे वो माँ छुपी है, जो आज भी बिना शिकायत अपने बच्चों की खुशियाँ बुन रही है — रोटी सेंकते हुए, ममता लुटाते हुए। पढ़िए, मुस्कुराइए और सोचिए — क्या एक पोस्ट ही काफी है उस ममता के लिए?
आज गणेश चतुर्थी के अवसर पर विध्नहर्ता गणेश जी की स्तुति तो सभी करते ही हैं,उनके वाहन मूषकराज की भी स्तुति अत्यावश्यक है ! एक स्तुति गान मैंने वक्रतुण्डाय गणाधिपति से खैरात में मिली बुद्धी से सृजित की है,अगर पसंद आये तो कृपया अपने लायक ,कमेंट ,शेयर के मोदक मुझ खाकसार को प्रदान करें ! […]
भारतीय आम आदमी की ज़िंदगी में काम नहीं, मज़ा ज़रूरी है। वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स उसे नहीं समझ पाया — लेकिन वो तो मस्ती के लिए जीता है! नेताओं के भाषण हों या सरकारी घोषणाएं, सब कुछ ‘मजा आया की नहीं?’ से तय होता है। यही तो असली लोकतंत्र है – मजेदार लोकतंत्र!