The Fear of Death and the False Identity of the Ego

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 3, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

The fear of death does not arise from death itself, but from the ego’s false identification with body, mind, and memory. When we mistake the changing for the self, insecurity and fear follow. Freedom begins the moment we recognize ourselves as the witness—not the role, not the form, but the aware presence behind them.

अयोध्या और लंका के बीच मनुष्य का धर्म

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 26, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

अयोध्या हमारी पहचान है, लंका हमारी उपलब्धि। धर्म इन दोनों के पार है—जहाँ साहस और विवेक मिलते हैं। रामत्व अधिकार से बड़ा है, और सत्ता से मुक्त होने का नाम है।

गीता सार: कर्तव्य, समत्व और समर्पण का जीवन-दर्शन

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 24, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

गीता हमें सिखाती है कि जीवन का सबसे बड़ा संकट युद्ध नहीं, निर्णयहीनता है। कर्तव्य करते हुए फलासक्ति त्यागना, समत्व में स्थिर रहना और भीतर के सत्य की शरण लेना ही गीता का सार है।

ज़िंदगी: एक बोझिल कहानी या खुलता हुआ बैग?

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 6, 2026 Darshan Shastra Philosophy 3

ज़िंदगी घटनाओं की नहीं, व्याख्याओं की शृंखला है। हर इंसान अपने कंधे पर एक बैग उठाए चढ़ रहा है—यह मानकर कि उसमें सोना है। पर ऊँचाई बढ़ते ही जब साँस फूलने लगती है, तब सवाल उठता है— क्या सच में बोझ की क़ीमत थी, या हम सिर्फ़ कहानी ढो रहे थे?

वेदों का ब्रह्मांडीय समय और समय की सापेक्षता

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 29, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

समय को हम एक सीधी रेखा समझते आए हैं—घड़ी की सुइयों, दिनों और वर्षों में बँटा हुआ। लेकिन श्रीमद्भागवत पुराण की राजा ककुद्मी की कथा इस धारणा को पूरी तरह उलट देती है। यहाँ समय एक नहीं, बल्कि बहुस्तरीय है—हर लोक, हर आयाम और हर चेतना-स्तर का अपना समय है। कुछ क्षणों की प्रतीक्षा पृथ्वी पर करोड़ों वर्षों में बदल सकती है। यह लेख राजा ककुद्मी की कथा के माध्यम से वैदिक काल-गणना, चतुर्युग की अवधारणा और आधुनिक विज्ञान में समय-विलंब (Time Dilation) के सिद्धांत के बीच अद्भुत साम्य को उजागर करता है। यह केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि मनुष्य को उसकी ब्रह्मांडीय लघुता का बोध कराने वाला गहन दार्शनिक अनुभव है।

आत्मबोध से विश्वबोध तक — ‘मैं’ से ‘हम’ बनने की चेतना यात्रा

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 19, 2026 Darshan Shastra Philosophy 2

आत्मबोध मनुष्य की सबसे गहन यात्रा है — अहं से अनंत तक की। यह यात्रा हमें केवल स्वयं से नहीं, समस्त सृष्टि से जोड़ती है। जब चेतना ‘मैं’ के घेरे से बाहर निकलकर ‘हम’ का स्वर ग्रहण करती है, तभी करुणा, सहानुभूति और वैश्विक उत्तरदायित्व का जन्म होता है। विज्ञान और वेदांत दोनों आज इसी सत्य की ओर संकेत कर रहे हैं — भीतर की चेतना जागे बिना बाहरी संसार का संतुलन संभव नहीं।

नया साल : कैलेंडर नहीं, चेतना का उत्सव

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 5, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

नया साल समय के बदलने का नहीं, सोच के बदलने का उत्सव है। प्रकृति जहाँ निरंतरता में जीती है, वहीं मनुष्य हर साल खुद से पूछता है—क्या मैं यही रहना चाहता हूँ? यह लेख नए साल के उत्साह, मनुष्य की अनुकूलन क्षमता और पशु-प्रवृत्तियों से आगे बढ़ने की मानवीय बेचैनी पर एक विचारोत्तेजक दृष्टि डालता है।

देवव्रत, वेद और स्मृति की पराकाष्ठा : एक बालक, दो हज़ार मंत्र और अनंत परंपरा

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 5, 2025 Darshan Shastra Philosophy 0

देवव्रत महेश रेखे ने सिर्फ 19 वर्ष की उम्र में शुक्ल यजुर्वेद के 2000 मंत्रों का दंडक्रम स्मृति से पारायण कर दिखाया। यह केवल धार्मिक चमत्कार नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क की क्षमता, वैदिक स्मृति-विज्ञान और हमारी श्रुति-परंपरा की जीवंत प्रयोगशाला है। यह कथा बताती है कि जहाँ दुनिया किताबों पर निर्भर है, वहाँ भारत अब भी चेतना पर ज्ञान लिखता है।

पुरुष सूक्त और सृष्टि–चिन्तन : पर्यवेक्षक की चेतना में जन्मा ब्रह्मांड

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 27, 2025 Darshan Shastra Philosophy 0

“पुरुष सूक्त हमें बताता है कि ब्रह्मांड कोई जड़ मशीन नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रेक्षक की चेतना में जागता हुआ दृश्य है, जिसके ‘सहस्र सिर’ अनगिनत जीवों की आँखों से दुनिया को देख रहे हैं।” “जैसे ही प्रेक्षक देखता है, संभावनाएँ ठोस रूप ले लेती हैं — यही वह दार्शनिक सेतु है जो क्वांटम भौतिकी और संख्य दर्शन को जोड़ता है।” “वेदांत का पुरूष कहता है — ब्रह्मांड 25% दृश्य, 75% अदृश्य है; और यह अदृश्यता ही चेतना का विशाल क्षेत्र है जहाँ से प्रकृति अपनी अभिव्यक्ति पाती है।” “सृष्टि तब जन्म लेती है जब चेतना प्रकृति को ‘देखती’ है — वही क्षण है जहाँ विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म एक बिंदु बनकर खड़े हो जाते हैं।”

हिरण्यगर्भ का रहस्य : सृष्टि से पहले के अंधकार में चमकती एक स्वर्ण-बूँद

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 27, 2025 Darshan Shastra Philosophy 0

“जब कुछ भी नहीं था—न आकाश, न पृथ्वी—तब भी एक चमकता बीज था, ‘हिरण्यगर्भ’। यही वह आदिम स्वर्ण-कोष है, जहाँ ब्रह्मांड समय और स्थान बनने से पहले ही संभावनाओं की तरह छिपा पड़ा था, और जहाँ से सृष्टि की पहली धड़कन जन्मी।”