वादा तेरा वादा
बरसाती मौसम में सुकून की ओपीडी अभी शुरू नहीं हुई थी। सोचा, चाय का दौर एक और हो जाए। श्रीमती जी भुनभुनाते हुए रसोई में चली गईं, शायद इस डर से कि चाय के साथ हम पकौड़ों की भी फरमाइश न कर दें। तभी पड़ोस के बब्बन चाचा की खिड़की से छन-छनकर किसी पुराने फिल्मी गीत के कुछ शब्द कानों में पड़े,“वादा तेरा वादा, मारा गया मैं बंदा सीधा-सादा…” मैं सोचने लगा, वायदे के साथ कुछ ऐसा भी होता था क्या? मुझे तो नहीं लगता। पुरानी बात हो गई। आजकल बंदा तो क्या मरेगा, वायदे ही मरते हैं और फिर जीवित हो जाते हैं,हाइड्रा, ड्रैकुला की तरह। मरकर भी अमर हो जाने वाले हो गए हैं वायदे।
लोग कहते हैं कि यार, किसी को कुछ दो या न दो, वायदा मत दो। वायदे से उम्मीद आती है और उम्मीद मरती है तो आदमी टूट जाता है। लेकिन क्या करें, आदमी इतना दीन-हीन हो गया है कि चाहे अरबपति हो जाए, रसूखदार हो जाए, कुर्सीधारी हो जाए, पर बात जब कुछ देने की आती है तो उसके पास देने के लिए आखिर में वायदा ही बचता है। वायदों की फसल भी बड़ी अनोखी है। इसे जितना काटो, खत्म नहीं होती। इस पर कोई जीएसटी लागू नहीं होता, कोई ट्रांजैक्शन टैक्स नहीं लगता। वायदों पर ही सरकार, सत्ता, अफसर और लोकतंत्र की गाड़ी चल रही है। वायदों की खाद देकर जनता से वोटों की फसल लहलहाई जा रही है। नेताओं के पास वायदों की फसल है और जनता के पास वोटों की।
वादा शायद संसार की अकेली ऐसी वस्तु है जिसे बनाने में कुछ नहीं लगता, रखने में कोई जगह नहीं घेरती और टूट जाने पर कचरा भी पैदा नहीं होता। यानी वादा पूर्णतया पर्यावरण-अनुकूल वस्तु है। मैं बचपन से वादों के बीच पला हूँ। पिताजी कहते थे, “इस बार अच्छे नंबर ले आओ, साइकिल दिला दूँगा।” मैं अच्छे नंबर ले आया। पिताजी ने कहा, “अगली कक्षा में जरूरत ज्यादा पड़ेगी, तब दिलाएँगे।” अगली कक्षा में पहुँचा तो बोले, “अब तो बड़े हो गए हो, थोड़ा पैदल चलना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।” यानी बचपन से ही वायदों की घुट्टी पीकर बड़े हुए हैं।
माँ के वादे कुछ अलग किस्म के होते थे। “पहले खाना खा लो, फिर बाजार चलेंगे।” खाना खाने के बाद बाजार जाने का प्रसंग रहस्यमय ढंग से गायब हो जाता था। पत्नी ने विवाह के समय कहा था, “आप वायदा करिए, जैसे हैं वैसे ही रहिएगा।” मैंने इस वायदे पर मर जाना उचित समझा, सो वैसा ही रह गया। कुछ महीने बाद उन्होंने सुधार कार्यक्रम शुरू कर दिया,जूते यहाँ क्यों हैं, तौलिया वहाँ क्यों है, मोबाइल हाथ में क्यों है, चाय इतनी क्यों पीते हैं, रात को देर तक क्यों जागते हैं? तब मुझे लगा कि वायदे करने के लिए नहीं, तोड़ने के लिए होते हैं।
प्रेम का तो पूरा कारोबार ही वादे पर चलता है। प्रेमी जोड़ों में वायदों की बस यही अदला-बदली चलती रहती है। कोई चाँद-तारे तोड़ लाने की बात करता है तो कोई बस तुमसे ही प्यार करने का वायदा करता है। प्रेम की खिचड़ी की हांडी वायदों की इसी आँच पर चढ़ी रहती है। प्रेम में असंभव वादा ही रोमांटिक माना जाता है। चाँद तोड़ लाना प्रेम है, धनिया लाना जिम्मेदारी। इसीलिए पुराने गीतों में प्रेमी चाँद, तारे, आसमान और दुनिया लुटाने की बात करते थे। किसी ने यह नहीं गाया,“तेरा बिजली का बिल मैं भरता रहूँगा…” जबकि वैवाहिक जीवन में इसकी उपयोगिता चाँद से कहीं अधिक है।
वादा असल में भविष्य की मुद्रा है। इसे आज खर्च किया जाता है और भुगतान कल पर छोड़ दिया जाता है। वादा करने वाले के पास समय की कभी कमी नहीं होती। वह समय की अमरता पर विश्वास करता है। आज किया गया वायदा सात अगले जन्मों तक भी पूरा किया जा सकता है। “कल आकर काम पूरा कर दूँगा”,ऐसा कहने वाला आदमी पुनर्जन्म में विश्वास करता है। एक कल समाप्त होता है, दूसरा कल जन्म ले लेता है।
नेता कह दे, “पाँच साल में तस्वीर बदल देंगे।” वह तस्वीर बदल भी देता है। कल तक जो विकास आप देख रहे थे, उसे और बदतर हालत में किया जा सकता है। नेताजी ने तस्वीर बदलने के लिए कहा था, यह तो नहीं कहा था कि आपके क्षेत्र की अच्छी तस्वीर बना देंगे। मुझे राजनीति ने वादे की असली ताकत समझाई। प्रेमी का वादा अधिकतम दो व्यक्तियों को प्रभावित करता है, नेता का वादा लाखों को। राजनीति ने वादे का औद्योगिकीकरण कर दिया है। घोषणा-पत्र दरअसल वादों का थोक बाजार है,सड़क देंगे, पानी देंगे, रोजगार देंगे, मकान देंगे, अस्पताल देंगे, स्कूल देंगे, भत्ता देंगे, राहत देंगे।
इतना कुछ देने की घोषणा सुनकर कभी-कभी मुझे लगता है कि उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ रहा, जैसे अपना खुद का घर खाली कर रहा हो। इतना सब सुनकर आदमी को एक बार तो शक होना ही चाहिए कि भाई, जीतने के बाद आपके पास अपने लिए कुछ बचेगा भी या नहीं।
जनता भी कम भोली नहीं है। उसे पुराने वादे याद रहते हैं, लेकिन नए वादे सुनते ही पुराने कुछ धुँधले पड़ जाते हैं। जैसे मोबाइल में नया अपडेट आते ही पुराने बग कुछ देर के लिए भूल जाते हैं। चुनाव आते ही वादों का नया संस्करण जारी हो जाता है। पैकिंग नई, नारा नया, रंग नया, मंच नया, पर भीतर कहीं पुराने वादों की आत्मा पुनर्जन्म लेकर बैठी रहती है।
राजनीतिक वादे की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उसके टूटने की कोई आधिकारिक तारीख नहीं होती। आप पाँच साल बाद पूछें,“पिछले वादे का क्या हुआ?” उत्तर मिल सकता है,“प्रक्रिया में है।” अब यह “प्रक्रिया” लोकतंत्र का वह विशाल गोदाम है जहाँ न जाने कितने वादे वर्षों से सुरक्षित रखे हैं। कुछ मंजूरी में हैं, कुछ प्रस्तावित हैं, कुछ विचाराधीन हैं, कुछ बजट के अभाव में हैं, कुछ बजट में हैं मगर जमीन पर नहीं हैं और कुछ जमीन पर हैं मगर दिखाई नहीं दे रहे। जनता को धैर्य रखना चाहिए। आखिर वादा कोई इंस्टेंट नूडल्स तो है नहीं कि दो मिनट में तैयार हो जाए।
मुझे लगता है चुनाव में असली मुकाबला उम्मीदवारों के बीच नहीं, वादों के बीच होता है। उम्मीदवार तो आते-जाते रहते हैं, वादे टिके रहते हैं। कभी पार्टी बदल लेते हैं, कभी शब्द बदल लेते हैं, कभी मंच बदल लेते हैं, मगर जीवित रहते हैं। इसीलिए मुझे उस पुराने गीत के सीधे-सादे बंदे पर अब दया नहीं आती। पहले लगता था बेचारा किसी प्रेमिका के वादे पर मारा गया होगा। अब लगता है वह बहुत छोटा खिलाड़ी था। एक वादे पर ही मारा गया!
हम तो इतने मजबूत निकले कि दशकों से वादे सुन रहे हैं और अभी तक जीवित हैं। गरीबी हटाने का वादा सुना, महँगाई घटाने का वादा सुना, रोजगार का सुना, भ्रष्टाचार मिटाने का सुना, गड्ढे भरने का सुना, नदी साफ करने का सुना, शहर चमकाने का सुना, व्यवस्था बदलने का सुना। इतने वादे सुनते-सुनते मुझे तो लगता है कि होमो सेपियन्स से आगे मनुष्य की एक नई प्रजाति विकसित हो गई है,होमो प्रॉमिसिस,जो वादा खाकर भी जीवित रह सके।
संभव है भविष्य में राशन कार्ड पर गेहूँ-चावल के साथ दो किलो आश्वासन भी मिलने लगे। दुकानदार पूछे,“गेहूँ पूरा दूँ या थोड़ा वादा मिला दूँ?” आदमी कहे,“भाई, इस महीने वादा ज्यादा दे देना, घर में उम्मीद कम पड़ रही है।”
मुझे तो कभी-कभी लगता है कि देश में वादों की कमी नहीं, रखने की जगह कम पड़ गई है। हर चुनाव में करोड़ों नए वादे पैदा होते हैं। पुराने कहाँ जाते हैं? शायद किसी सरकारी गोदाम में पड़े होंगे। उनके ऊपर धूल जमती होगी, फाइलों में दबे होंगे, किसी रजिस्टर में लिखा होगा,“अत्यंत आवश्यक”, फिर नीचे किसी ने पेंसिल से जोड़ दिया होगा,“समय आने पर देखा जाएगा।” इस तरह वादा सरकारी संरक्षण में दीर्घायु होता जा रहा है।
अब मैं वादा सुनते ही उत्साहित नहीं होता। अनुभव ने सिखाया है कि वादे और बारिश की भविष्यवाणी में एक समानता है,हो जाए तो बताने वाला श्रेय लेता है, न हो तो परिस्थितियाँ जिम्मेदार होती हैं। फिर भी वादा जरूरी है। वादा न हो तो प्रेमी क्या बोलेगा, उम्मीदवार क्या बोलेगा, विज्ञापन वाला क्या बोलेगा, बच्चा होमवर्क न करने पर क्या बोलेगा, पति देर से घर लौटकर क्या बोलेगा और सरकार अगला चुनाव कैसे लड़ेगी?
असल में वादा हमारी सभ्यता का आधार है। हम वर्तमान की तकलीफ को भविष्य की संभावना से ढँकते हैं और उसका नाम वादा रख देते हैं।
कान फिर से उसी पुराने गीत की आखिरी पंक्ति की तरफ लौट रहे हैं,“वादा तेरा वादा, मारा गया मैं बंदा सीधा-सादा…” अब मुझे उस बंदे की मूर्खता पर हँसी आती है। भाई, वादा सुनकर कोई मरता है क्या? समझदार आदमी वादा ऐसे सुनता है जैसे बीवी की घुड़की,मुँह लटकाकर “हाँ-हाँ” करता है, सिर हिलाता है और फिर चुपचाप अपने काम पर चला जाता है।
मेरा मतलब बस इतना है,वायदे हैं, वायदों का क्या। आज हैं, कल फिर नए रूप में आ जाएँगे। इन्हें दिल पर नहीं लेना चाहिए। और हाँ, वादा कभी इतना गंभीर भी नहीं होना चाहिए कि वह किसी वाद-विवाद की जड़ बन जाए।
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