मैं कौन हूँ? नाम, धर्म और देह से परे आत्मा की खोज करता निर्गुण सूफ़ियाना भजन

मैं कौन हूँ? — नाम, धर्म और देह से परे आत्मा की खोज करता निर्गुण सूफ़ियाना भजन

मनुष्य संसार में आते ही अनेक पहचानों से घिर जाता है। सबसे पहले उसे एक नाम मिलता है, फिर परिवार, धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और देश से जुड़ी पहचानें उसके साथ जुड़ती चली जाती हैं। समय के साथ वह किसी का पुत्र, पिता, पति, मित्र, चिकित्सक, शिक्षक, व्यापारी या कलाकार बन जाता है। लेकिन इन सभी परिचयों के पीछे एक प्रश्न हमेशा मौन खड़ा रहता है—

आखिर मैं कौन हूँ?

इसी शाश्वत प्रश्न को केंद्र में रखकर प्रस्तुत किया गया है मौलिक निर्गुण सूफ़ियाना भजन—“मैं कौन हूँ?”। यह केवल सुनने योग्य गीत नहीं, बल्कि अपने भीतर उतरने और स्वयं से संवाद करने की एक संगीतमय यात्रा है।

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“मैं कौन हूँ?”—एक प्रश्न, जो जीवन बदल सकता है

सामान्यतः हमसे कोई पूछता है—“आप कौन हैं?”—तो हम अपना नाम, व्यवसाय या निवास-स्थान बता देते हैं। परंतु क्या हमारा नाम ही हमारा संपूर्ण अस्तित्व है? क्या देह बदल जाने, पद छूट जाने या सामाजिक पहचान मिट जाने के बाद हमारे भीतर कुछ ऐसा बचता है, जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता?

भजन का मुखड़ा इसी प्रश्न को बहुत सहजता से सामने रखता है—

ना मैं मंदिर, ना मैं मस्जिद,
ना कर्मों की कोई बंदिश।
ना मैं साधु, ना मैं पापी,
ना बादशाह, न दास हूँ मैं।

इन पंक्तियों का आशय मंदिर या मस्जिद का निषेध करना नहीं है। यहाँ मनुष्य को यह समझाने का प्रयास है कि उसका वास्तविक अस्तित्व किसी इमारत, संप्रदाय, पद या बाहरी पहचान तक सीमित नहीं है। साधु, पापी, राजा और दास—ये सभी संसार द्वारा दिए गए नाम हैं। इनके पीछे जो चेतना है, वही इस गीत की खोज का विषय है।

निर्गुण भक्ति का अर्थ क्या है?

भारतीय संत परंपरा में ईश्वर को दो रूपों में अनुभव किया गया है—सगुण और निर्गुण

सगुण भक्ति में उपासक ईश्वर को किसी नाम, रूप और गुण के साथ आराध्य मानता है। श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान शिव, माता दुर्गा और हनुमान जैसे आराध्य स्वरूप सगुण भक्ति के केंद्र हैं।

इसके विपरीत निर्गुण साधना उस परम सत्ता को रूप, आकार और बाहरी परिभाषाओं से परे अनुभव करने का प्रयास करती है। वह परम सत्य किसी एक स्थान में बंद नहीं है; वह प्रत्येक जीव, प्रत्येक कण और स्वयं साधक के भीतर उपस्थित है।

इसीलिए गीत का सामूहिक प्रश्न बार-बार मन को झकझोरता है—

ओ मन मेरे, बोल तू कौन?
बोल तू कौन, बता तू कौन?
नाम-निशानों से आगे जो है,
क्या सचमुच वह मौन हूँ मैं?

यहाँ “मौन” निष्क्रियता नहीं, बल्कि उस अनुभूति का प्रतीक है जिसे शब्द पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकते।

पुस्तकीय ज्ञान से आगे आत्मानुभूति

ज्ञान के ग्रंथ हमें रास्ता दिखा सकते हैं, लेकिन रास्ते का अनुभव स्वयं चलकर ही होता है। गीत की पंक्तियाँ इसी अंतर की ओर संकेत करती हैं—

ना मैं वेद-पुराण में मिलता,
ना अक्षर के ज्ञान में मिलता।
ना मदिरा के जाम में मिलता,
ना मदहोश उड़ान में मिलता।

केवल ग्रंथ पढ़ लेने से आत्मबोध नहीं होता और संसार से भागने या कृत्रिम मदहोशी में डूबने से भी अपने वास्तविक स्वरूप का उत्तर नहीं मिलता। इसके लिए मनुष्य को अपने भीतर उतरना पड़ता है।

ना मैं जागूँ, ना मैं सोऊँ,
ना मैं खोऊँ, ना कुछ पाऊँ।
अपने भीतर खोज रहा हूँ,
किसको अपना नाम बताऊँ?

यह खोज बाहर से भीतर की ओर होने वाली यात्रा है। इसमें प्रश्न पूछने वाला भी हम हैं और उत्तर देने वाला भी हमारे भीतर ही बैठा है।

नाम बदलते हैं, भीतर का सत्य नहीं

जीवन में हमारे रूप और भूमिकाएँ निरंतर बदलती रहती हैं। बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था में शरीर बदलता है। संबंध बदलते हैं, विचार बदलते हैं और परिस्थितियाँ बदलती हैं। फिर भी भीतर कोई ऐसा साक्षी है जो इन सभी परिवर्तनों को देखता रहता है।

भजन में यह भाव अत्यंत सुंदरता से सामने आता है—

रूप बदलते, नाम बदलते,
फिर भी कोई शेष है भीतर।
जिसको दुनिया बाँट न पाए,
वही अनकहा देश है भीतर।

“अनकहा देश” किसी भौगोलिक स्थान का नाम नहीं है। वह हमारे भीतर की ऐसी भूमि है जहाँ धर्म, जाति, भाषा और राजनीतिक सीमाओं के विभाजन नहीं पहुँच पाते। वहाँ मनुष्य केवल मनुष्य नहीं रहता—वह व्यापक चेतना का अंश बन जाता है।

धर्म और सीमाओं से ऊपर मनुष्यता

आज संसार में व्यक्ति की पहचान कई बार उसके मानवीय गुणों से अधिक उसके धर्म, भाषा या राष्ट्रीयता के आधार पर की जाने लगी है। ऐसे समय में गीत की ये पंक्तियाँ विशेष अर्थ ग्रहण करती हैं—

ना मैं पूरब, ना मैं पश्चिम,
ना मैं दिल्ली, ना लाहौर।
ना मैं हिंदू, ना मुसलमाँ,
ना सीमाओं का कोई छोर।

इन पंक्तियों का उद्देश्य किसी धार्मिक पहचान को मिटाना नहीं, बल्कि मनुष्य की मूल चेतना को इन पहचानों से कहीं अधिक व्यापक मानना है। धर्म हमें सदाचार, करुणा और सत्य की दिशा दिखाता है; लेकिन यदि वही पहचान मनुष्यों के बीच दीवार बन जाए तो उसकी आत्मा पीछे छूट जाती है।

ना भाषा में कैद हुआ हूँ,
ना पहचानें बाँध सकीं।
जिस सच को दीवारें रोकें,
उस सच की आवाज़ हूँ मैं।

सत्य किसी एक भाषा में नहीं बोलता। करुणा का कोई अलग धर्म नहीं होता और प्रेम को किसी सीमा-रेखा की अनुमति की आवश्यकता नहीं पड़ती।

बूँद और समंदर का सूफ़ियाना दर्शन

गीत के अंतिम भाग में बूँद और समंदर का अत्यंत अर्थपूर्ण रूपक आता है—

ना मैं आता, ना मैं जाता,
ना मेरा कोई ठौर-ठिकाना।
बूँद समंदर में जब उतरे,
कौन अलग है, किसने जाना?

जब बूँद समुद्र से अलग होती है तो उसकी एक स्वतंत्र पहचान दिखाई देती है। लेकिन जैसे ही वह समुद्र में मिलती है, बूँद समाप्त नहीं होती—उसकी सीमित पहचान अनंत में विलीन हो जाती है।

सूफ़ी और निर्गुण दर्शन में आत्मा तथा परमात्मा के संबंध को समझाने के लिए यह भाव अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। मनुष्य स्वयं को अलग मानता है क्योंकि वह देह, अहंकार और नाम की सीमाओं में बँधा रहता है। जैसे ही ये सीमाएँ ढीली पड़ती हैं, उसे अपने भीतर उसी व्यापक सत्ता की झलक मिलने लगती है जो सबमें उपस्थित है।

गीत का संगीत-संयोजन

इस रचना का संगीत भी इसके दार्शनिक भाव के अनुरूप रखा गया है। शुरुआत ध्यानमय पुरुष आलाप, तानपुरे की गूँज, कोमल सारंगी और बाँसुरी के साथ होती है। धीमी प्रवाहपूर्ण लय श्रोता को भीतर उतरने का समय देती है।

गीत के आगे बढ़ने पर हारमोनियम, हल्का तबला, ढोलक, खड़ताल और संयमित सामूहिक स्वर जुड़ते हैं। “ओ मन मेरे, बोल तू कौन?” को प्रश्न और प्रतिउत्तर की शैली में प्रस्तुत किया गया है। इससे ऐसा अनुभव होता है मानो एक स्वर प्रश्न कर रहा हो और अनेक अंतर्मन मिलकर उत्तर खोज रहे हों।

संगीत में अनावश्यक शोर या अत्यधिक वाद्य-विस्तार के स्थान पर शब्दों और भावों को प्रमुखता दी गई है। यही संयम इसे ध्यान, आत्मचिंतन और शांत वातावरण में सुनने योग्य बनाता है।

उत्तर बाहर नहीं, अपने प्राणों में है

गीत का समापन पूरी रचना का सार प्रस्तुत करता है—

ना मंदिर में… ना मस्जिद में…
ना शब्दों के ज्ञान में…
जिसको खोजूँ सारे जग में,
वह बैठा मेरे प्राण में…

मनुष्य जीवन भर सुख, शांति, प्रेम और परम सत्य को बाहर खोजता रहता है। कभी वह स्थान बदलता है, कभी संबंध और कभी साधना की विधि। लेकिन अंततः यात्रा वहीं पहुँचती है जहाँ से आरंभ हुई थी—अपने भीतर।

“मैं कौन हूँ?” का उत्तर संभवतः किसी एक वाक्य में नहीं दिया जा सकता। यह प्रश्न स्वयं में एक साधना है। जब मनुष्य कुछ क्षण अपनी सामाजिक भूमिकाओं, उपलब्धियों और अहंकार को एक ओर रखकर मौन में बैठता है, तभी भीतर से उत्तर की पहली आहट सुनाई देती है।

एक आत्मिक आमंत्रण

यह निर्गुण सूफ़ियाना भजन आपको किसी बनी-बनाई मान्यता को स्वीकार करने के लिए नहीं कहता। यह केवल एक प्रश्न आपके सामने रखता है—

नाम से आगे, देह से आगे और सभी पहचानों से आगे—आप वास्तव में कौन हैं?

इस गीत को शांत वातावरण में, आँखें बंद करके और बिना किसी जल्दबाजी के सुनिए। संभव है कि गीत समाप्त हो जाए, लेकिन इसका प्रश्न आपके भीतर कुछ देर और गूँजता रहे।

यदि यह रचना आपके मन को छुए, तो वीडियो को Like करें, अपने आत्मीयजनों के साथ Share करें और अपनी अनुभूति Comment में अवश्य लिखें।

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रचना एवं परिकल्पना: डॉ. मुकेश असीमित
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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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