हिंदी हैं हम हिंदोस्ता हमारा

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 14, 2025 हिंदी लेख 0

हिंदी दिवस कोई स्मृति-लेन नहीं, आत्मगौरव का वार्षिक एमओयू है—जिसमें हम तय करें कि अदालत, विज्ञान, स्टार्टअप और दफ्तर की फाइल तक हिंदी का सलीका पहुँचे। भाषा मैनेज की जा सकती है, नियंत्रित नहीं; वह बारात है—जहाँ रोकोगे, वहीं ऊँची ‘हुर्र’ निकलेगी। एआई के युग में भी संवेदना की मुद्रा इंसान ही छापता है; इसलिए हिंदी को रोज़मर्रा, रोज़गार और रोज़दिल में उतारना होगा। यही उसका असली दिवस, कंठ का।

राजभाषा, ज्ञान-व्यवस्था और डिजिटल युग में हिंदी की आगे की राह

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 14, 2025 शोध लेख 0

हिंदी का भविष्य केवल भावनाओं से तय नहीं होगा, बल्कि छह खानों में इसकी ताक़त और चुनौतियाँ दिखती हैं—संस्कृति, व्यापार, न्याय, शिक्षा, मीडिया और सद्भाव। बोलचाल और मनोरंजन में हिंदी मज़बूत है, पर न्याय-व्यवस्था और उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व चुनौती बना हुआ है। समाधान है मातृभाषा-आधारित शिक्षा, द्विभाषिक पुल, देवनागरी-प्रथम मानक और अंतरभाषिक सम्मान। हिंदी तभी लोकतांत्रिक धड़कन बनेगी जब आत्म-सम्मान और समावेशन साथ चलेंगे।

हिंदी: उद्भव, विकास और “भाषा” की मनुष्यता

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 14, 2025 शोध लेख 0

भाषा केवल संचार का औज़ार नहीं, बल्कि मनुष्यता की आत्मा है। संस्कृत से प्राकृत, अपभ्रंश और फिर हिंदी तक की यात्रा हमारे सांस्कृतिक विकास की कहानी है। हिंदी आज विश्व की शीर्ष भाषाओं में है, लेकिन उसकी असली ताक़त आत्मविश्वास और समावेश में है—जहाँ वह तमिल, तेलुगु, बांग्ला, उर्दू जैसी भारतीय भाषाओं के साथ पुल बनाए। टकराव नहीं, संवाद ही हिंदी का भविष्य है।

वैचारिक आज़ादी और हिंदी की अस्मिता

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 14, 2025 Important days 0

1947 की आज़ादी ने हमें शासन से मुक्त किया, पर मानसिक गुलामी अब भी जारी है। अंग्रेज़ी बोलना प्रतिष्ठा, हिंदी बोलना हीनता क्यों माना जाए? हिंदी विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है, फिर भी हम अपनी ही मातृभाषा से संकोच करते हैं। सच्ची आज़ादी पार्ट-टू यही है—हीन भावना की जंजीरें तोड़कर, हिंदी को गर्व और आत्मविश्वास के साथ जीवन में अपनाना।

हिंदी दिवस-माइक, माला और मातृभाषा

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 13, 2025 Important days 0

ओपीडी में लेखक-डॉक्टर को एक चालाक रिश्तेदार ‘हिंदी दिवस’ पर मुख्य अतिथि का न्योता थमा देता है—मंशा डोनेशन बटोरने की। तैयारियों के बीच सड़क पर ‘हिंदी माता’ मिलती हैं—लंगड़ाती, अपमानित, साल भर किनारे धकेली हुई। शाल-ताम्रपत्र की औपचारिकता, विभागीय खानापूर्ति और नौकरी-प्रतियोगिता में हिंदी की हीनता पर वे करुण कथा सुनाती हैं। लेखक लौटकर ठठा नहीं, बच्चों को श्रेष्ठ हिंदी साहित्य भेंट करने का संकल्प लेता है।

मैं और मेरी हिंदी-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 13, 2025 व्यंग रचनाएं 0

मैं, अंग्रेज़ी दवा लिखने वाला डॉक्टर, अब हिंदी में लिखने लगा तो शहर के ‘हिंदी प्रहरी’ गुरुजी मेरी हर पोस्ट में बिंदी-अनुस्वार ढूंढते फिरते हैं। फेसबुक की वॉल अब क्लासरूम बन गई है—खद्दर कुर्ता, झोला, फाउंटेन पेन और ‘हिंदी की टूटी टांग’ का स्थायी दर्द। मैं त्रिशंकु-सा, हिंग्लिश और देसी मुहावरे के बीच लटका, गूगल इनपुट से जूझता, फिर भी लिखने की खुजली शौक से खुजाता हूँ। बेखौफ़, मुस्कुराते हुए.

जमाई राजा—कलियुग के कौवे 

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 12, 2025 व्यंग रचनाएं 1

श्राद्ध पक्ष में कौवों की कमी ने परम्पराओं को भी स्टार्टअप बना दिया। अब्दुल चाचा दो कौवे पालकर खीर चखवाने का 101 रुपये वाला ‘डिलीवरी सेवा’ चला रहे हैं। पर असली ‘कागभुशुंडी’ तो कलियुग का जमाई है—जाति-धर्म से परे, ससुराल की मुंडेर पर बैठकर कांव-कांव करता और थाली में पहला निवाला पक्का करता। कौवे न मिलें तो जमाई ही तर्पण का ब्रांड एम्बेसडर, नाग पंचमी तक आउटसोर्सिंग पक्की! हो जाएगी

मोगली आज़म -लघु नाटिका

Ram Kumar Joshi Sep 12, 2025 व्यंग रचनाएं 0

मोगली सल्तनत का दरबार दो सदियों के बीच झूला झूलता है—एक ओर शाही खंजर, सुराही, घूंघरू; दूसरी ओर जींस, बीयर, पिज़्ज़ा और जिम। बादशाह की नीतियाँ अख़बारों से सीखी गईं, शहज़ादा सलीम ‘हैलो डैड’ कहकर बगावत की सूचना कुरियर से देता है। नर्तकी का ग्लास सिंहासन तक पहुँचता है, तलवारें जंग खाती हैं और घोड़े बेरोज़गार। सत्ता का तख़्त अंततः नृत्य-मंच में बदल जाता है—और जनता तमाशा देख हँसती।

पान-दर्शन शास्त्र-हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 11, 2025 व्यंग रचनाएं 0

पान हमारी सभ्यता का ऐसा रस है जिसने गली-कूचों को संसद बना दिया। दीवारों पर मुफ्त “पीक आर्ट,” नेताओं के वादों में कत्था-चूना और जनता के मुँह में चुनावी पान—यह वही संस्कृति है जहाँ पानवाला ही न्यूज़ चैनल, गूगल मैप और थिंक-टैंक रहा। आज इंस्टा स्टोरी ने उसकी जगह ले ली है, मगर स्वाद, लाली और व्यंग्य अब भी उसी गिलौरी में छुपा है।

क्वांटम फिजिक्स और अध्यात्म: जब ‘वेव’ वेदांत से हाथ मिलाती है

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 9, 2025 Science Talk (विज्ञान जगत ) 0

When Vedanta shakes hands with Quantum, the monk smiles: “Wave or particle?—depends on who’s watching.” A saffron-clad thinker juggles photons and sine-waves like circus toys, one eye on a magnifying glass, the other on an Upanishad scroll. Behind him a chalkboard doodles “E=mc²,” while a temple gopuram hums “ॐ.” Science counts, scripture chants—but both whisper the same punchline: all is one, just differently measured.