लेखक की साहित्यिक होली
“रंग लगाने गया था, पर हर दरवाज़े पर रंगों की परिभाषा बदल गई। संपादक ने रंग सुरक्षित रख लिए, समीक्षक ने विमर्श पूछ लिया, आलोचक ने कालजयी होने की शर्त लगा दी। अंततः बचा हुआ गुलाल घर की चौखट पर ही काम आया।”
“रंग लगाने गया था, पर हर दरवाज़े पर रंगों की परिभाषा बदल गई। संपादक ने रंग सुरक्षित रख लिए, समीक्षक ने विमर्श पूछ लिया, आलोचक ने कालजयी होने की शर्त लगा दी। अंततः बचा हुआ गुलाल घर की चौखट पर ही काम आया।”
28 फरवरी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय वैज्ञानिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। डॉ. सी.वी. रमन की साधारण प्रयोगशाला से निकली खोज ने विश्व वैज्ञानिक मानचित्र को बदल दिया। आज आवश्यकता है कि विज्ञान को विषय नहीं, विचार बनाया जाए और जिज्ञासा को समाज की चेतना में स्थान दिया जाए।
एप्सटीन फाइल्स केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना हैं जो शक्ति और धन के शिखर पर बैठकर खुद को अजेय मान बैठती है। यह लेख सत्ता, सेक्स और नैतिकता के जटिल संबंधों को मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संदर्भ में परखता है।
एक ज्वलंत विषय पर बहस करवाने की योजना स्टूडियो प्रबंधन के लिए अप्रत्याशित परीक्षा बन गई। वर्णमाला क्रम, विशेषज्ञता और समय-सारिणी सब धरी रह गईं—और बहस का मंच देखते ही देखते शक्ति प्रदर्शन में बदल गया।
अयोध्या हमारी पहचान है, लंका हमारी उपलब्धि। धर्म इन दोनों के पार है—जहाँ साहस और विवेक मिलते हैं। रामत्व अधिकार से बड़ा है, और सत्ता से मुक्त होने का नाम है।
“हम इसे चोरी मानते ही नहीं। हम सीना ठोककर कहते हैं—यह हमारा मौलिक अधिकार है। हमने तो छह दिखाया था, आपने नौ समझ लिया तो यह आपकी दृष्टि-दोष है।” “हम विचारों की खेती कम और प्रतिलिपियों की फसल अधिक उगाते हैं।”
कभी पटिए पर बैठकर शहर की राजनीति, समाज और संस्कार तय होते थे; अब वही चर्चाएँ व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम की स्क्रीन पर सिमट गई हैं। पटिया संस्कृति का यह पटाक्षेप समय की विडंबना है।
तलाक का असली कारण अब ईगो या संवादहीनता नहीं, दूल्हे का जूता घोषित हो चुका है। शादी में जूता चुराई नहीं, मानो वैवाहिक सत्ता परिवर्तन का शंखनाद हो गया हो।
गीता हमें सिखाती है कि जीवन का सबसे बड़ा संकट युद्ध नहीं, निर्णयहीनता है। कर्तव्य करते हुए फलासक्ति त्यागना, समत्व में स्थिर रहना और भीतर के सत्य की शरण लेना ही गीता का सार है।
राजमहल जैसे वैभव के बीच, असली युद्ध तंदूर पर था—एक रोटी की तलाश में खड़े आधुनिक अर्जुन।