सकारात्मकता आत्म-उपहार
“हमसे हर ओर उजाले हैं, क्योंकि हम दिलवाले हैं!” “चेहरे पर कोई चेहरा नहीं, जो हैं, हम हूबहू हैं वही!” “प्रेम हमारा जीवन सार, प्रकृति से करते हैं प्यार!” “अनुपम यह आत्म-उपहार, तुकबंदी भरे ये प्रिय उद्गार!”
“हमसे हर ओर उजाले हैं, क्योंकि हम दिलवाले हैं!” “चेहरे पर कोई चेहरा नहीं, जो हैं, हम हूबहू हैं वही!” “प्रेम हमारा जीवन सार, प्रकृति से करते हैं प्यार!” “अनुपम यह आत्म-उपहार, तुकबंदी भरे ये प्रिय उद्गार!”
“टूटा आईना कभी दाग छुपा लेता है, कभी छुपे घाव दिखा देता है—एक ही प्रतिबिंब में बिखराव और आत्मबोध का सुंदर द्वंद्व।”
“कचरा — बन बैठा है मानवीय संबंधों का नया व्याकरण। वह चाय के प्यालों में बहस बनकर उफनता है, और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ‘ज्ञान’ में अवधारणाओं को सड़ा देता है।”
“प्रेम की मदहोश धड़कनों में खोई एक आत्मा—जिसे न जाने कब अपने ही भीतर से किसी और का उजाला छू गया। ‘मैं तेरी ही कब हो गई’ में विद्या दुबे प्रेम की उस सूक्ष्म अनुभूति को रेखांकित करती हैं जहाँ व्यक्ति स्वयं से सरककर प्रिय की परछाई बन जाता है, अनकहे जादू में डूबता चला जाता है।”
“शादी के पंडाल में तंदूरी रोटी अब सिर्फ़ खानपान नहीं रही, पूर्ण युद्ध बन चुकी है। दूल्हे से ज़्यादा चर्चा उस वीर की होती है, जो तंदूर से सटकर खड़ा रहता है और दो रोटी के लिए इतिहास लिख जाता है। ‘वीर तुम डटे रहो’ इस जंग के मोर्चे पर खड़े हर भूखे शौर्यवान की व्यंग्य-गाथा है।”
साठ साल का आदमी दरअसल चलता-फिरता पेड़ है—अनुभव की जड़ों में धँसा, सद्भाव की शाखों से भरा और भीतर अब भी एक प्यारा बच्चा लिये हुए। उसकी बातें कभी जुगाली लगती हैं, पर उनमें समय का सच और जीवन का रस बहता है।”
बैरागी बन म्है फिरा, धरिया झूठा वेश जगत करै म्होरी चाकरी, क्है म्हानें दरवेश क्है म्हानें दरवेश, बड़ा ठिकाणा ठाया गाड़ी घोड़ा बांध, जीव रा बंधन बाध्या कह जोशी कवि राम, तपस्या कुण रे करणी मची संतों में होड़, पाप री खाडो भरणी (मची संतों में होड़, भक्त री लछमी हरणी।)
छठ पर्व केवल आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, राष्ट्र और संस्कृति के प्रति समर्पण का सामूहिक संकल्प है। यह लेख छठ मैया की भक्ति के माध्यम से स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्र प्रेम और जनकल्याण की भावना का संदेश देता है — जहां सूर्य उपासना के साथ-साथ देशभक्ति और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
“बहती प्रकाश की ओर अगर है ज़िंदगी, तो हर अंधकार भी एक पड़ाव मात्र है। जो दीप भीतर जलता है — वही अमर है, वही सत्य है, वही जीवन का उजास।”
कविता “तेरा लाल मां तुझे पुकारे” मां और पुत्र के भावनात्मक रिश्ते का सुंदर चित्र है। इसमें भक्त पुत्र अपने लाल वस्त्रों, फूलों, चुनरिया और माला के साथ मां से विनती करता है कि वह अपने नौ रूपों में आकर उसका जीवन प्रकाशमय करे। भक्ति, प्रेम और समर्पण से भरी यह कविता मां और भक्त के आत्मिक संवाद की मधुर प्रस्तुति है।