आज हनुमान जयंती है—और यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हमारे भीतर सोई हुई शक्ति को जगाने का एक निमंत्रण है। जैसे ही हम इस दिन का स्मरण करते हैं, मन में एक साथ अनेक छवियाँ उभरती हैं—कहीं गदा धारण किए, पर्वत उठाए, समुद्र लांघते हुए वीर हनुमान; तो कहीं करताल बजाते, भजन में डूबे, नेत्र बंद किए ध्यानमग्न भक्त हनुमान। यही द्वैत—बल और भक्ति का—हनुमान जी को अद्वितीय बनाता है।
हम सामान्यतः हनुमान जी को केवल पराक्रम के प्रतीक के रूप में देखते हैं—वह जो पहाड़ उठा लें, समुद्र लांघ जाएँ, लंका जला दें। लेकिन यदि ध्यान से देखें, तो उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनका बल नहीं, उनका समर्पण है। उनके भीतर “मैं” का अस्तित्व नहीं, केवल “राम” का वास है। और शायद यही कारण है कि जिस पर उनकी कृपा होती है, उसके जीवन में भी “राम” का नाम स्वतः फूट पड़ता है—वाणी में, कर्म में, और विचार में।
भारतीय चेतना में जब भी साहस, समर्पण और निर्भयता की बात होती है, तो सबसे पहले स्मरण होता है हनुमान जी का। वे केवल रामभक्त नहीं हैं—वे जीवन की ऊर्जा हैं, प्रज्ञा के स्रोत हैं। जीवन और कष्ट, ये दोनों अविभाज्य सत्य हैं। पर इन दोनों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए—यह “हनुमान तत्व” हमें सिखाता है।
रामायण का वह प्रसंग याद आता है, जब समुद्र के किनारे पूरी वानर सेना खड़ी थी। सामर्थ्य सबमें था, पर विश्वास डगमगा रहा था। तब जामवंत ने हनुमान जी को उनके सामर्थ्य का स्मरण कराया। यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि जीवन का गूढ़ संकेत है—हम सबके भीतर अपार शक्ति है, लेकिन उसे जागृत करने के लिए “स्मरण” और “विश्वास” चाहिए।
और जब विश्वास जागता है, तो समुद्र लांघे जाते हैं—बाहर के भी और भीतर के भी।
हनुमान जी चिरंजीवी हैं—यह केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि एक दार्शनिक सत्य भी है। वे वायु तत्व के प्रतीक हैं—अदृश्य, पर सर्वव्यापी। जैसे वायु दिखाई नहीं देती, पर जीवन का आधार है; वैसे ही हनुमान तत्व भी हमारे भीतर अदृश्य रूप से प्रवाहित होता रहता है—साहस बनकर, धैर्य बनकर, निष्ठा बनकर।

उनके बाहुबल का स्मरण हमें केवल शारीरिक शक्ति की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह संकेत देता है कि जब मन, प्राण और मंत्र एक सूत्र में बंध जाते हैं, तब असंभव भी संभव हो जाता है। यही कारण है कि मंत्र केवल ध्वनि नहीं होते—वे चेतना की दिशा होते हैं।
यदि हम सुंदरकांड को ध्यान से देखें, तो वह केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक यात्रा है—भय से विश्वास तक, संशय से सिद्धि तक। और यही यात्रा हर मनुष्य को अपने जीवन में करनी होती है।
अक्सर एक प्रश्न उठता है—हनुमान जी की उपासना करने वाले लोग भी कभी-कभी भयभीत क्यों दिखाई देते हैं? शायद इसलिए कि उन्होंने भक्ति को शक्ति में रूपांतरित नहीं किया। यदि भक्ति हमारे भीतर साहस नहीं जगाती, तो वह केवल एक अनुष्ठान बनकर रह जाती है।
सच तो यह है कि हनुमान जी “देने वाले” भगवान कम और “जगाने वाले” गुरु अधिक हैं। वे बाहर से कुछ देने से पहले भीतर छिपी शक्ति को जागृत करते हैं। यही कारण है कि उनका स्मरण हमें केवल आशीर्वाद नहीं देता, बल्कि आत्मविश्वास भी देता है।
गोस्वामी तुलसीदास और हनुमान जी का संबंध केवल भक्त और भगवान का नहीं था—वह विश्वास का संबंध था। ऐसा विश्वास, जिसमें तर्क की सीमाएँ भी समर्पण में विलीन हो जाती हैं।
आज के इस पावन अवसर पर, शायद हमें हनुमान जी से यही सीखना चाहिए—
कि अपने भीतर के “समुद्र” से डरना नहीं है,
अपने भीतर के “लंका” को पहचानना है,
और अपने भीतर के “राम” पर विश्वास करना है।
क्योंकि जब भीतर राम का विश्वास जागता है,
तो बाहर की हर असंभवता स्वतः ही संभव हो जाती है।
जय हनुमान। 🚩
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