हम अक्सर दुनिया के प्रति, अपने अस्तित्व के प्रति, कुछ ज़्यादा ही नेगेटिव हो जाते हैं। सुबह आँख खुलते ही शिकायतें शुरू—यह नहीं मिला, वह नहीं हुआ, दुनिया ख़राब है, हालात बिगड़े हुए हैं, भविष्य डरावना है। और इसी बीच हम एक सबसे बुनियादी, सबसे चमत्कारी तथ्य को भूल जाते हैं—कि हम ज़िंदा हैं। सिर्फ़ ज़िंदा नहीं, बल्कि इस ब्रह्मांड के सबसे जटिल, सबसे बुद्धिमान और सबसे रहस्यमय प्रयोग का हिस्सा हैं।
आप सोचिए, हम बार-बार पूछते हैं—मैं क्यों हूँ? Why do I exist? धर्म में खोजा, दर्शन में ढूँढा, विज्ञान की प्रयोगशालाओं में झाँका, वेदों और उपनिषदों तक पलटे। फिर भी जवाब पूरा नहीं मिलता। शायद इसलिए, क्योंकि हम सवाल ही गलत जगह से पूछ रहे हैं। हम यह पूछते हैं कि पर्पज़ क्या है, जबकि पहले यह समझना ज़रूरी है कि अलाइव होना अपने आप में कितना बड़ा चमत्कार है।
इस समय, अभी इसी पल, आपके शरीर के भीतर लगभग 30 ट्रिलियन कोशिकाएँ काम कर रही हैं। हाँ, 30 के बाद 12 शून्य। हर एक कोशिका के भीतर एक न्यूक्लियस है, और उस न्यूक्लियस के भीतर डीएनए। इतनी छोटी-सी जगह में इतनी विराट जानकारी कि दिमाग ठहर जाए। उस डीएनए को अगर सीधा फैलाया जाए, तो उसकी लंबाई करीब डेढ़ से दो मीटर होगी—यानि आपकी ऊँचाई के बराबर। और यह सिर्फ़ एक कोशिका की बात है।
अब ज़रा कल्पना कीजिए—अगर आपके शरीर की सभी 30 ट्रिलियन कोशिकाओं के डीएनए को एंड-टू-एंड जोड़ दिया जाए, तो वह इतनी लंबी “डोरी” बन जाएगी कि पृथ्वी से सूरज तक जाकर 240 बार चक्कर लगाकर वापस आ सकती है। और यह सारा डेटा—आपकी आँखों का रंग, आपके बालों का रंग, आपकी इम्यूनिटी, आपकी कमजोरियाँ, आपकी ताक़त, आपके पूर्वजों की पूरी कहानी—सिर्फ़ 60 ग्राम में समाया हुआ है।
यह डीएनए किसी कुक-बुक की तरह है। चार अक्षर—A, C, G, T—और इन्हीं चार अक्षरों के संयोजन से आपकी पूरी जीवन-कथा लिखी गई है। अगर इस “रेसिपी बुक” को शब्दों में छापा जाए, तो वह किताब सवा किलोमीटर से भी ज़्यादा मोटी हो जाएगी। और यह सिर्फ़ आपकी कहानी नहीं है; इसमें आपके पहले पूर्वज से लेकर आज तक की पूरी यात्रा दर्ज है। आप यूँ ही नहीं हैं। आप लाखों-करोड़ों संघर्षों, निर्णयों, जीत-हार और बलिदानों का परिणाम हैं।

फिर हम कैसे कह सकते हैं—“मैं अकेला हूँ”, “मेरे अंदर कुछ ख़ास नहीं”, “मेरी ज़िंदगी का कोई मतलब नहीं”? यह सच नहीं है। यह उस ब्रह्मांड के प्रति अन्याय है जिसने इतनी मेहनत से आपको यहाँ तक पहुँचाया।
हर इंसान यूनिक है, क्योंकि हर इंसान का डीएनए यूनिक है। दुनिया में अब तक जितने लोग पैदा हुए और मर चुके—करीब 93 बिलियन—उनमें से कोई भी आपके जैसा नहीं था, और न होगा। अगर दुनिया के सारे डीएनए एक मेज़ पर रख दिए जाएँ, तो आपकी एक कोशिका भी यह पहचान लेगी कि “मैं कौन हूँ” और “मेरे पूर्वज कौन थे।” यह इंटेलिजेंस किसी बड़े दर्शन से कम नहीं।
अब सवाल आता है—तो पर्पज़ क्या है? सच यह है कि आपका पर्पज़ कोई और आपको नहीं बता सकता। क्योंकि अगर डीएनए अलग है, तो पर्पज़ भी अलग होगा। लेकिन एक जनरल फ्रेमवर्क ज़रूर है—पहला उद्देश्य है खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखना, भावनात्मक रूप से स्थिर रहना। दूसरा, यह पहचानना कि आप किस चीज़ में अच्छे हैं, किस काम में आपको खुशी मिलती है।
समस्या यह है कि आज हम अपनी तुलना दूसरों से करने में ज़्यादा समय लगाते हैं, खुद को समझने में नहीं। सोशल मीडिया ने एक नकली दुनिया बना दी है, जहाँ हर कोई खुश दिखता है, सफल दिखता है, हमेशा छुट्टियाँ मनाता दिखता है। कोई यह नहीं लिखता कि आज उसकी फ्लाइट छूट गई, बॉस ने डाँट दिया, घर में झगड़ा हो गया, या वह भीतर से टूटा हुआ है। नतीजा यह होता है कि हमें लगता है—सबकी ज़िंदगी बढ़िया है, मैं ही पीछे रह गया हूँ।
सच यह है कि ज़िंदगी कठिन है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ज़िंदगी अनुचित है। इतिहास उठाकर देख लीजिए—आज के दौर में हम सबसे कम बीमारियों से मरते हैं, सबसे ज़्यादा जीते हैं, और पहले से कहीं ज़्यादा जागरूक हैं। गरीबी कम हुई है, संघर्ष अब भी हैं, लेकिन पहले से कम हैं। हमें लगता है कि दुनिया ज़्यादा हिंसक हो गई है, जबकि असल में अब हिंसा ज़्यादा दिखाई देती है, क्योंकि हम ज़्यादा कनेक्टेड हैं।

एक और बड़ी बीमारी है—विक्टिम माइंडसेट। हर चीज़ के लिए दुनिया, सिस्टम, माता-पिता, समाज को दोष देना। हाँ, ट्रॉमा होते हैं, मानसिक बीमारियाँ भी होती हैं—और उनका इलाज ज़रूरी है, ज़िम्मेदार और प्रमाणित लोगों से। लेकिन हर असफलता को बहाना बना लेना, कोशिश ही न करना, यह रास्ता आपको कहीं नहीं ले जाता।
ज़िंदगी में समय ही असली मुद्रा है। एक दिन में 86,400 सेकंड। अगर आप 80 साल जिए, तो आपके पास करीब 4,000 संडे हैं। बस 4,000। सोचिए, आप इन 4,000 मौकों के साथ क्या करना चाहते हैं? शिकायतें? तुलना? या कुछ ऐसा जो आपको भीतर से संतोष दे?
मार्केटिंग आपको यह यक़ीन दिलाने की कोशिश करती है कि आपको वही चाहिए जो दूसरों के पास है। नया फोन, बड़ी गाड़ी, अगला लेवल। लेकिन हर चाहत पूरी नहीं होती—और होनी भी नहीं चाहिए। क्योंकि चाहतों की कोई सीमा नहीं होती।
अंत में बात बहुत सरल है—खुश रहने के लिए किसी बहुत बड़े दर्शन की ज़रूरत नहीं। अच्छा खाइए, ठीक से सोइए, अपने विचारों का ख्याल रखिए। दिन का हिसाब लिखिए—समय कहाँ गया, क्यों गया। अपने आप से बात करना सीखिए, क्योंकि आप ही अपने सबसे बड़े शुभचिंतक हैं।
पर्पज़ अपने आप मिलेगा। बस इतना याद रखिए—आप यूँ ही नहीं हैं। आपका ज़िंदा होना ही इस ब्रह्मांड का सबसे बड़ा सबूत है कि आप “सिम्पली ऑसम” हैं।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
मेरी व्यंग्यात्मक पुस्तकें खरीदने के लिए लिंक पर क्लिक करें – “Girne Mein Kya Harz Hai” और “Roses and Thorns”
Notion Press –Roses and Thorns
संपर्क: thefocusunlimited@gmail.com
Comments ( 0)
Join the conversation and share your thoughts
No comments yet
Be the first to share your thoughts!