“महारास: राधा–कृष्ण की लीलाओं में कवियों का अमर रस”
गणेश महोत्सव की विशाल झांकी का दूसरा दिन था। शहर की शामें तो वैसे ही रौनक से भरी रहती हैं, लेकिन जब गणेश दरबार की झलक देखने और झांकी की प्रस्तुति का अवसर मिले, तो सैर-सपाटा और भी सुखद बन जाता है।
कल के कार्यक्रम में महारास का आयोजन था। बचपन की यादें अनायास ही मन में ताज़ा हो उठीं। गाँवों में जब पूरी रासलीला मंडली आती थी, तो ब्रज क्षेत्र की बोली और वहीं के कलाकारों के सहज अभिनय से वातावरण अद्भुत हो उठता था। पदावली और छंदों से सजे संवाद जब गोपियों और राधा रानी की भाषा में भगवान कृष्ण की लीलाओं को जीवंत कर देते, तो बालमन रोमांचित हो उठता। भले ही उस समय छंदों का गूढ़ अर्थ समझ न आता, मगर उनके भाव और संवादों के जरिए कथा का मर्म आत्मा तक उतर जाता।
यही नहीं, रामलीला का मंचन भी उतना ही आकर्षक होता था। नाटक मंडलियाँ गाँव-गाँव घूमतीं और अलग-अलग प्रसंगों का मंचन करतीं—सावित्री द्वारा अपने पति के प्राण वापस लाने की कथा, हरिश्चंद्र की सत्यवादिता, भगवान शिव और सती की करुण गाथा। रामलीला में तो मानो शब्द ही संगीत बन जाते। नगाड़ों और ताशों की ताल पर रामचरितमानस की चौपाइयाँ व्यासजी गाते, फिर उसी का अर्थ संवाद के रूप में अभिनीत किया जाता। बीच-बीच में सूत्रधार अपनी टिप्पणियों से रस और रोचकता और गाढ़ा कर देता।
आज के महारास की बात करें, तो नाम वही है लेकिन स्वरूप बदल चुका है। अब रासलीला न रहकर महज डांस शो बनकर रह गई है। पारंपरिक छंदों और पदावलियों की जगह डीजे की धुनें, बॉलीवुड की धुनों पर बने पैरोडी भजन और मंच पर थिरकते कदमों ने ले ली है। यह दृश्य देखकर मन में प्रश्न उठता है कि यदि कभी घनानंद, विद्यापति, रसखान और सूरदास जैसे कवियों की रचनाएँ फिर से मंचित हों, तो कैसा दिव्य वातावरण बनेगा।
ज़रा सोचिए—सूरदास का वह पद जब गाया जाए:
“मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो…”
या विद्यापति के श्रृंगार रस से भरे गीत जब राधा-कृष्ण की लीलाओं में गूँजें। घनानंद की संवेदनशील पदावली, रसखान की भक्ति से लबालब कविताएँ—यदि इनका मंचन हो, तो रस, भाव और कला का जो संगम बनेगा, वह वर्तमान की कृत्रिम चकाचौंध से कहीं अधिक मनमोहक और आत्मिक आनंद देने वाला होगा।
जितना सग्रह मेरे पास फिजिकल बुक्स का है उस से कहीं अधिक ,प्राचीन काव्य ग्रन्थ ,साहित्यिक कृतियों का पीडीऍफ़ संग्रह है, यह वो संग्रह है जो इन्टरनेट आर्काइव में फ्रीली उपलब्ध है l कल ऐसी ही कुछ रचनावलियों को सरसरी द्रष्टी से देख रहा था उन्ही में से कुछ पद चुनकर आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ —ताकि आप स्वयं देख सकें कि शब्द और छंद में कितना अद्भुत माधुर्य छिपा है।
रसखान, नंददास, कुम्भनदास और घनानंद—इन सबकी रचनाओं में महारास (रासलीला) और राधा–कृष्ण–गोपियों का अद्भुत चित्रण मिलता है।
रसखान (१७वीं शताब्दी, सूफी कवि)मुख्य कृतियाँ: सुजन रसखान, प्रेमवाटिका
प्रसिद्ध पद (रास और श्रृंगार की झलक):
“मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।“
यहाँ रसखान स्वयं को ग्वाला बनने की इच्छा व्यक्त करते हैं ताकि वे कृष्ण की रासलीला और गोपियों संग उनके खेल का आनंद ले सकें।
“गोपी गृह के गोकुल गाँव गलीं, सब खेलत नंदलाल।“
इस पद में गोकुल की गलियों का वर्णन है, जहाँ नंदलाल (कृष्ण) गोपियों के साथ रास और क्रीड़ाओं में मग्न हैं।
घनानंद (रीतिकालीन कवि)मुख्य ग्रंथ: घनानंद सागर
प्रसिद्ध पद (रास और विरह):
“राधा कुंजन गइयाँ, कहत हिय की गइयाँ।
श्याम बिनु जियरा बैरागी, नयनन नीर बहइयाँ।।“
यहाँ राधा की विरह-व्यथा व्यक्त हुई है, जब महारास में कृष्ण की झलक न पाकर विरह में डूब जाती हैं।
“नाचत बनमाली, बनितन संग।
रस भरी नजरी, रसिक रँग।।“
महारास का दृश्य—कृष्ण वनमाली गोपियों संग नाचते हैं, उनकी दृष्टि रस-भरी और मोहक है।
कुम्भनदास (अष्टछाप कवि)मुख्य ग्रंथ: कुम्भनदास पदावली
कुम्भनदासजी भक्ति-रस कवि थे, फिर भी रास-लीला का सुन्दर चित्रण उनके पदों में झलकता है:
“आजु नचत बनमालि गोकुल की नारी संग।
मुरली की मधुर तान सुनि, हरषत सब अंग।।“
कृष्ण का गोपियों संग नृत्य—महारास—का सजीव दृश्य
नंददासजी – रास पंचाध्यायी से चयनित पद
नंददासजी की रास पंचाध्यायी भागवत के रास प्रसंग को छंदों और पदों में गाती है। इन पदों में रास केवल नृत्य नहीं बल्कि अनंत माधुरी, भक्ति और रस का महासागर है।
रास आरंभ का दृश्य
“जगमगि रही रजनी, रास रच्यो नंदलाल।
सखी सब संग राधिका, देख्यो अपार विशाल।।“
पूर्णिमा की रजनी, उज्ज्वल चाँदनी और गोकुल की गोपियों के साथ श्रीकृष्ण का रास आरंभ।
गोपियों का आकर्षण और मुरली की टेर
“मुरली की मधुर तान सुनि, हरषत सब अंग।
आजु नचत बनमालि, गोकुल की नारी संग।।“
कृष्ण की बंसी की ध्वनि से आकृष्ट होकर गोपियाँ दौड़ी चली आती हैं और महारास का रंग जमता है।
महारास का नृत्य और अलंकार
“सांवरें पिय संग नृत्यति चंचल ब्रज की बाला।
जनु घन–मंजुल मंडल खेलति दामिनी माला।।“
कृष्ण के साथ गोपियाँ नृत्य करतीं, मानो बादलों के बीच विद्युतमाला लहरा रही हो।
गोपियों का हाव-भाव और श्रृंगार
“कोतउ चटपट सों कर कपटी, कोतउ उर वर लपटी।
कोतउ गरें लपटी कहरति—भले जु भले कान्हर कपटी।।“
यहाँ महारास का श्रृंगार-रस, जहाँ गोपियाँ कृष्ण के अंगों से लिपटकर प्रेमाभिव्यक्ति करती हैं।
महारास की माधुरी और रस का वर्णन
“यहर शरद की जितियक परम मनोरम राती।
खेलति रास रसिक पिय, प्रतिक्षण नई नई भांति।।“
शरद की चाँदनी रात, और हर क्षण नए-नए रूप में कृष्ण का रास—यही महारास की माधुरी है।
निष्कर्ष और रस का सार
“नित्य रास रसमत्त, नित्य श्रीगोपिजनवल्लभ।
नित्य निगम जोति कहरयति, नित्य नौतन अद्भुत दुर्लभ।।“
नंददासजी यहाँ रासलीला को नित्य, अनंत और अद्भुत घोषित करते हैं—जिसे समझ पाना दुर्लभ है।
इन पदों में महारास केवल नृत्य नहीं, बल्कि अनंत प्रेम, भक्ति और सौंदर्य का दार्शनिक अनुभव है।
रसखान में सूफियाना प्रेम, नंददास में भागवत-प्रधान भक्ति, कुम्भनदास में सहज माधुर्य और घनानंद में विरह-श्रृंगार की करुणा—सब मिलकर रासलीला को अमर बना देते हैं।

✍ लेखक, 📷 फ़ोटोग्राफ़र, 🩺 चिकित्सक
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Vaoww nice
आभार
Vaoww sundar
thanks