मेरा देश आगे बढ़ रहा है
मेरा देश आगे बढ़ रहा है—
इतनी तेज़ी से
कि अब पीछे मुड़कर देखने का
समय भी नहीं बचा।
रास्ते मिल गए हैं,
पर मंज़िल गुम हो गई है कहीं ।
दिशाएँ गड्डमड्ड हैं,
पर नारों की दिशा बिल्कुल साफ़ है—
आगे! सिर्फ़ आगे!
समझना कठिन नहीं,
बस पूछना मना है—
आगे बढ़ने का मतलब क्या है?
अगर
वाइन के अड्डे खोल देना ही विकास है,
तो हाँ—हम विकसित हैं।
अगर स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन में
किसानों की ज़मीन
स्पेशल तरीके से ग़ायब कर देना
आर्थिक क्रांति है,
तो निस्संदेह हम क्रांतिकारी हैं।
अगर विदेशी निवेश के स्वागत में
घर के दरवाज़े ही नहीं,
रीढ़ की हड्डी भी खोल देना
उदार नीति कहलाती है,
तो हमारी उदारता का
कोई मुकाबला नहीं।
हमने फैशन शो देखे—
जहाँ भूख ने कपड़े नहीं पहने थे।
हमने नग्नता देखी—
जहाँ शर्म ने आत्महत्या कर ली थी।
हमने करोड़ों की कारें खरीदीं—
और पैदल चलने वालों को
देश की रफ्तार में
अवरोध घोषित कर दिया।
हिंदी अख़बारों में
अंग्रेज़ी घुसी,
और हमने उसे
भाषाई सुधार कहा।
बिना शर्माए
अपने कमीशन को
प्रशासनिक दक्षता का नाम दिया,
और भ्रष्टाचार को
संस्था में बदलकर
उद्घाटन की तिथि तय कर दी।

हाँ,
हम बहुत आगे बढ़ चुके हैं।
इतना आगे
कि रास्ते में
एक किसान की विधवा
और दो अनाथ बच्चे
हमें सिर्फ़
गति अवरोधक से लगे।
वे लोकतंत्र के पहियों तले कुचले गए—
लेकिन ट्रैफिक नहीं रुका।
जो साथ न चल सका,
उसे देशद्रोही कहा गया,
या भगवान भरोसे छोड़ दिया गया।
भगवान भी शायद थक गए हैं,
इतनी ज़िम्मेदारियाँ उठाते-उठाते।
पर देश आगे बढ़ता रहा—
ईश्वर से भी आगे।
हम आगे इसलिए नहीं बढ़े
कि सबको साथ ले जाएँ,
बल्कि इसलिए
कि पीछे छूटे लोग
दिखाई न दें।
अब हमें
ऐसे लोगों की तरफ़ देखने की
फ़ुर्सत नहीं है—
आँखें ऊपर हैं,
नज़र सूचकांकों पर।
मेरा देश आगे बढ़ रहा है—
और पीछे
इंसान
धीरे-धीरे
ग़ायब हो रहा है।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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