मुझे ऑनलाइन रिश्ते क्यों पसंद हैं? | डिजिटल दोस्ती पर आत्मव्यंग्य — डॉ. मुकेश असीमित

मुझे ऑनलाइन रिश्ते क्यों पसंद हैं

— डॉ. मुकेश असीमित

कइयों को ऑनलाइन शॉपिंग पसंद है, मुझे ऑनलाइन रिश्ते। रिश्तों के इतिहास में इससे बड़ी सुविधा पहले कभी नहीं आई। अब आप मेरी बात पर विश्वास थोड़े ही करेंगे, लेकिन मुझे पक्का विश्वास है कि मेरी दलीलें सुनकर आप अपने सभी तथाकथित ऑफलाइन रिश्तों से सोशल डिस्टेंसिंग बना ही लेंगे। अब देखिए, पहले किसी का हाल पूछना हो तो उसके घर जाना पड़ता था। वहाँ पहुँचकर चाय पीनी पड़ती थी, उसकी बात सुननी पड़ती थी और लौटते समय यह भी याद रखना पड़ता था कि उसने क्या बताया था। अब मैं सुबह एक साथ पचास लोगों को सूरज उगने से पहले ही बता सकता हूँ कि आज की मॉर्निंग ‘गुड’ है। लोग बिना खिड़की से झाँके, अपनी रजाई में या कमोड पर—जहाँ भी सुविधा लगे—मेरे भेजे उगते सूरज की फोटो से सुबह की शुभ शुरुआत कर सकते हैं। मैं तो करवा चौथ पर श्रीमती जी का व्रत भी किसी सुदूर देश के कोने में, जहाँ चाँद का दीदार हो गया हो, वहाँ की फोटो ऑनलाइन मँगवाकर खुलवा सकता हूँ और उनकी भूखी नज़रों को शांत कर सकता हूँ।

गया वह ज़माना, जब किसी रिश्ते को मज़बूत करने के लिए आपकी उपस्थिति ज़रूरी होती थी। अब केवल आपका ऑनलाइन स्टेटस हरा रहे, यही रिश्तों के ट्रैफिक में ग्रीन सिग्नल माना जाता है। ऑनलाइन रहकर मैं दूर रहकर भी पास हो सकता हूँ। इस लिहाज़ से स्क्रीन रिश्तों को नया आयाम दे रही है—आदमी मौजूद भी रहता है और बचा हुआ भी।

शादी के न्यौते में आई यह प्रगति मुझे विशेष प्रिय है। पहले मिठाई का डिब्बा लेकर जाना पड़ता था। घर पर कोई न मिले तो फिर जाना पड़ता था। मिले तो आग्रह करना पड़ता था कि “आपको ज़रूर आना है।” अब पीडीएफ भेजकर नीचे लिख दीजिए—Kindly attend। न्यौता पहुँच गया, आग्रह भी हो गया। मेरी तरफ़ से तो नीली टिक लगते ही सामाजिक कर्तव्य पूरा हो गया है। सामने वाला पीडीएफ खोले या न खोले, यह उसके भाग्य का विषय है।

बधाई देना भी कितना सरल हुआ है। जन्मदिन पर “HBD dear, stay blessed” लिखकर केक का इमोजी भेज देता हूँ। केक खरीदने, मोमबत्ती बुझने तक खड़े रहने और यह सोचने की झंझट खत्म कि सामने वाला कितने साल का हुआ। एक ही संदेश परिचित, घनिष्ठ मित्र और उस व्यक्ति को भी भेजा जा सकता है जिससे पिछली बार तीन साल पहले किसी और के जन्मदिन पर बात हुई थी। मेरे पास तो बधाइयों के अलग-अलग ड्राफ्ट हैं। भूल से कभी ‘शादी की सालगिरह मुबारक’ किसी अविवाहित मित्र को चला जाए, तो वह भी इसे भविष्य में कुँवारापन मिटने का आशीर्वाद समझकर ग्रहण कर लेता है।

इमोजी ने मेरे भावहीन चेहरे से भी भावनाएँ निकालकर दूसरों को जता देने का काम आसान किया है। किसी की लंबी बात काटने या बीच में रोकने के लिए, अपनी झुँझलाहट या असहमति के बावजूद सामने वाले को टालने के लिए हाथ जोड़ देता हूँ। दिल पर लगे या न लगे, लेकिन दिल्लगी के लिए दिल भेज देता हूँ। सामने ठेंगा दिखाने के बजाय अंगूठा दिखा देता हूँ। पहले अंगूठा दिखाने पर रिश्ते बिगड़ते थे। मुझे तो हर घरेलू स्थिति के लिए अलग इमोजी चाहिए—“हाँ, मैं सुन रहा हूँ”, “इस पर अभी बात न करें”, “इनमें से कोई भी साड़ी पसंद नहीं”, “क्या आज खाने में मेरा मनपसंद बन सकता है?”, “तुम आज अच्छी नहीं लग रहीं” और “मेरी गलती नहीं है।” अगर इस प्रकार के इमोजी आ जाएँ, तो मेरा वैवाहिक जीवन और सुगम हो सकता है।

हाल ही में मेरा जन्मदिन आया। सुबह बैंक ने बधाई दी, फिर शॉपिंग ऐप ने। दोनों को मुझसे इतना लगाव है कि हर शुभकामना के साथ कोई न कोई ऑफर भी भेजते हैं। एक मित्र रास्ते में मिला। वह मुझसे आधा घंटा बात करता रहा और मैं इंतज़ार करता रहा कि शायद अभी आधा घंटा पहले फेसबुक पर उसने मेरी जन्मदिन की बधाई में अपनी और मेरी फोटो को प्रमाणपत्र की तरह लगाकर उस पर जो बढ़िया-सा बर्थडे कोट चिपकाया था, फूल, गुलदस्ते और केक लुटाए थे, उसका थोड़ा-सा अंश भी मुझे सामने दे दे तो ज़िंदगी सफल हो जाए। तब समझ आया कि गलती उसकी नहीं थी। सामने मिलने पर जन्मदिन याद दिलाने वाला नोटिफिकेशन नहीं बजा होगा। अब मैं भी किसी का जन्मदिन याद रखने की कोशिश नहीं करता।

फेसबुक रोज़ दस-पंद्रह लोगों के जन्मदिन बताता है। इसी बहाने मुझे अपनी फ्रेंडलिस्ट देखने का मौका मिल जाता है। जिनसे साल भर कोई बात नहीं हुई, उन्हें बधाई देकर रिश्ता एक साल के लिए नवीनीकृत कर देता हूँ। कुछ को उसी दिन अनफ्रेंड भी कर देता हूँ। ये वे लोग हैं जो साल में एक बार जन्मदिन के नोटिफिकेशन के रूप में मेरी सोशल वॉल पर टपकते हैं। साल में तो घूरे के भी दिन फिरते हैं; इनके भी अच्छे दिन आ जाते हैं। मैं इन्हें जन्मदिन पर उपहार देना चाहता हूँ। अब इससे बढ़िया ऑनलाइन उपहार क्या होगा कि इन्हें अनफ्रेंड करके मेरी दोस्ती का जो भार ये अपने कंधों पर झेल रहे हैं, उसे हल्का कर दूँ। उनकी नज़र में इसका जो अर्थ हो, वह उनका अधिकार है।

ऑनलाइन मित्रता ने मुझे मनुष्य की कई नई प्रजातियों से भी परिचित कराया है। कुछ सज्जन हर महिला की तस्वीर के नीचे “Nice pic dear” लिखते मिलेंगे। उनकी प्रशंसा में घोर नियमितता है। प्रोफाइल लॉक रहता है, तस्वीर बीस साल पुरानी होती है या बीस साल पहले की उनकी उम्र के किसी हीरो की लगी होती है, और घर का कोई सदस्य फ्रेंडलिस्ट में दिखाई नहीं देता। किसी पोस्ट पर “Thank you” मिल जाए तो कई दिनों तक उनकी टिप्पणियों में शायरी बढ़ जाती है। फिर एक दिन वे अचानक गायब हो जाते हैं। संभवतः घर में सब्ज़ी लाने की ज़िम्मेदारी मिल गई होगी।

मैं इन पर अधिक हँस भी नहीं सकता। अपने इनबॉक्स की पुरानी चैट पढ़ते समय कई बार मुझे खुद पर भी हँसी आती है। किसी की गंभीर बात पर मैंने “वाह” लिख दिया था; किसी के “जल्दी मिलते हैं” पर आज तक हाथ जोड़कर बैठा हूँ। ऑनलाइन रिश्तों में मेरी विनम्रता अद्भुत है। लोग बुलाते हैं, मैं दिल भेज देता हूँ। कोई नाराज़ होता है, मैं दुखी चेहरे वाला इमोजी भेज देता हूँ। किसी को सचमुच मेरी ज़रूरत हो तो मैं लिखता हूँ, “बताइए।” इसके बाद फोन एक तरफ़ रख देता हूँ ताकि वह आराम से बता सके।

हाँ, एक परेशानी है। कभी कोई सचमुच दरवाज़े पर आ जाता है। उस समय न चैट को म्यूट कर सकते हैं, न अपनी आख़िरी बार की सक्रियता छिपा सकते हैं। उसे देखकर मुस्कुराना पड़ता है, बैठाना पड़ता है और अपनी आवाज़ में पूछना पड़ता है, “कैसे हो?” ऑनलाइन रिश्तों ने मुझे इन सब मेहनतों से बड़ी सुंदर राहत दी थी। फिर भी दरवाज़ा खोल देता हूँ—आख़िर जिसे मैं इतने दिनों से ‘अपना’ लिख रहा हूँ, उसे यह पता तो चलना ही चाहिए कि इस दुनिया में अभी तक यहाँ लिखने वाला एक चेहरा भी है। बाकी तो खुदा खैर करे, आगे ये ऑनलाइन रिश्ते और क्या-क्या गुल खिलाएँगे!

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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