वहम पालिए, जिंदगी आसान बनाइए
— डॉ. मुकेश असीमित
देखिए साहब, आदमी और कुछ पाले या न पाले, वहम जरूर पाल सकता है। बल्कि आज के समय में वहम पालना कोई कमजोरी नहीं, बाकायदा जीवन-कौशल है। जिसे अच्छे वहम पालने आते हैं, वह बुरे वक्त में भी सुखी रह सकता है।
मैंने भी देर से सही, यह कला सीख ली है।
आजकल बच्चों को पालना बड़ा कठिन काम हो गया है। बाकायदा पेरेंटिंग के कोर्स चल रहे हैं, सलाहकार बैठे हैं, किताबें हैं, वीडियो हैं। इसके बावजूद जिस नाज-नखरे से हमने बच्चों को पाला, आजकल बच्चे पालने में झूलने की उम्र में ही पलने में उससे भी बड़े नाज-नखरे करते हैं। कुछ लोग कुत्ते पाल लेते हैं। यह लिबर्टी भी हमें नहीं है, क्योंकि मैंने कुत्ते पालने वालों को देखा है—कुछ दिनों बाद यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि कौन किसको पाल रहा है।
वहम इस मामले में बड़ा सीधा है। कोई नाज-नखरा नहीं। जब मन करे पाल लीजिए। इसे पालने के लिए ‘अहम’ जैसी महँगी खुराक भी नहीं चाहिए। यानी अहम् पालना महँगा है, वहम पालना आज भी सस्ता है।
पहले मैं सच पर भरोसा करता था। बड़ी तकलीफ रहती थी। जो दिखता था, वही दिखाई देता था। सड़क टूटी है तो टूटी ही दिखती थी। महँगाई बढ़ी है तो जेब हल्की लगती थी। नेता चुनाव के बाद नहीं आया तो लगता था कि नहीं आया। फिर एक समझदार आदमी ने मुझे जीवन का सूत्र दिया—“तुम बहुत तथ्यवादी हो। थोड़े वहमवादी बनो।”
मैंने बात गाँठ बाँध ली।
अब जिंदगी मजे में है।
चुनाव आते हैं। नेताजी गली-गली घूमते हैं। कल तक जिन्हें हम पहचानते थे और वे हमें नहीं पहचानते थे, आज वे हमें दूर से देखकर हाथ जोड़ रहे हैं।
लो जी, पल गया वहम—आदमी जमीन से जुड़ा हुआ है।
नेताजी मेरा हाथ पकड़ते हैं। पूछते हैं—“सब ठीक?”
मैं भावुक हो जाता हूँ।
पाँच वर्ष की समस्याओं का ऐसा संक्षिप्त सर्वेक्षण मैंने कहीं नहीं देखा।
मैं कहता हूँ—“जी।”
बस।
समस्या हल।
वे आगे बढ़ जाते हैं। मैं पीछे खड़ा अपने वहम को फलता-फूलता देखकर फूला नहीं समाता।
मैं मध्यमवर्गीय आदमी हूँ। हमारे यहाँ वहम के बिना गृहस्थी चल ही नहीं सकती। महीने की पहली तारीख को वहम पालते हैं कि इस बार कुछ बचा लेंगे। दस तारीख को वहम थोड़ा कमजोर पड़ता है। पंद्रह तक किसी प्रकार उसे जिंदा रखते हैं। तब तक अगले महीने के वहम का गर्भाधान हो चुका होता है।
बैंक से मकान का लोन लिया है। वहम पाल रखा है कि घर अपना है। बैंक हर महीने ईएमआई काटकर मेरे इस वहम को बहुत ज्यादा पाल-पोसकर मोटा हो जाने से बचाता रहता है।
कार खरीदी तो वहम हुआ कि सामाजिक स्तर ऊँचा हो गया। पेट्रोल भरवाते समय लगता है जैसे वहम की खुराक कम करके उसका वजन नियंत्रित कर रहा हूँ।
बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं—वहम है कि भविष्य सुरक्षित है। स्कूल की फीस देखकर लगता है कि स्कूल वालों को भी पूरा वहम है कि उनका भविष्य सुरक्षित है।
सरकार कहती है योजनाएँ आम आदमी के लिए हैं। मैं मान लेता हूँ। यहाँ तो वहम की होम डिलीवरी है। घर बैठे आम जनता को पालने के लिए नए-नए वहम मिल रहे हैं। वरना सरकार इसके लिए आपको सड़क पर भी ला सकती है।
बजट आता है। टीवी पर विशेषज्ञ बताते हैं—मध्यमवर्ग को बड़ी राहत।
मैं अपना बटुआ टटोलता हूँ।
मुझे वहम है कि राहत कभी न कभी अपना असली घर ढूँढ़ ही लेगी। आखिर कब तक वह सरकार के चंगुल में फँसी रहेगी।
महँगाई पर भी मैंने सकारात्मक वहम पालना सीख लिया है। सब्जी महँगी हो जाए तो सोचता हूँ किसान समृद्ध हो रहा होगा। स्कूल फीस बढ़े तो मानता हूँ शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ रही होगी। अस्पताल का बिल बढ़े तो सोचता हूँ स्वास्थ्य सेवा आधुनिक हुई है। बिजली का बिल बढ़ जाए तो समझता हूँ—चलो, देश रोशन हो रहा है।देश को 2047 में पहुँचना है, वह अँधेरे में कैसे अपना रास्ता ढूंढेगा ।
आम आदमी का क्या है, उसे तो अँधेरे में रहने की आदत है।
बिल भरने के पैसे लगते हैं, वहम पालना अभी भी सरकार ने फ्री कर रखा है।
लोकतंत्र ने विकल्प भी खूब दिए हैं। एक वहम जल्दी टूट जाए तो दूसरा पाल लीजिए। करना ही क्या है—बस न्यूज चैनल बदलना है।
आपको जो वहम सुविधाजनक लगे, उसे पाल लीजिए।
सोशल मीडिया ने तो वहम पालन में क्रांति कर दी है। वहाँ हर आदमी विशेषज्ञ है। समाज में, रिश्तों में, जाति में, क्षेत्र में—हर जगह हमने वहम के सहारे एक-दूसरे से दूरी बना ली है। शायद सोशल डिस्टेंसिंग इसी को कहते हैं।
मैंने एक और वहम पाल रखा है कि मेरी राय बहुत महत्वपूर्ण है। इसीलिए हर मुद्दे पर देता हूँ। कोई माँगे या न माँगे। आखिर लोकतंत्र में नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपनी राय उस व्यक्ति तक जरूर पहुँचाए जिसे उसकी सबसे कम आवश्यकता हो।
घर में भी वहम बहुत काम आते हैं।
पत्नी कहती है—“आप मेरी बात सुन ही नहीं रहे।”
मैं वहम पाल लेता हूँ कि सुन रहा हूँ।
वह भी शायद वहम पाल लेती हैं कि कभी न कभी सुधरूँगा।
इसी पर दांपत्य चल रहा है।
डॉक्टर कहते हैं—वजन कम कीजिए।
मैं सुबह वजन मशीन पर खड़ा होकर वहम पालता हूँ कि मशीन गलत है।
दर्जी कहता है—कमर बढ़ गई।
मैं कपड़ों के टाइट होने का वहम पाल लेता हूँ।
असल में वहम आदमी को वास्तविकता से बचाने वाला घरेलू हेलमेट है। हकीकत सिर पर पड़े, उससे पहले वहम चोट सोख लेता है।
आप बेरोजगार हैं—वहम पालिए, अवसर आने वाला है।आप परेशान हैं—वहम पालिए, अच्छे दिन सामने हैं।
आप टैक्स दे रहे हैं—मानिए राष्ट्र निर्माण कर रहे हैं।सड़क पर गड्ढा मिले—समझिए विकास की प्रक्रिया बीच में है।
इसलिए अब मैंने सवाल कम कर दिए हैं। सवाल आदमी को उत्तर तक ले जाते हैं, और उत्तर कई बार वहम के लिए घातक होते हैं।
अब मेरा जीवन बहुत सरल हो गया है।
मैं सुबह उठता हूँ और वहम पालता हूँ कि आज सब ठीक होगा।
दोपहर तक वहम टूटने लगता है।
तो शाम आते-आते दूसरा पाल लेता हूँ। आखिर आम आदमी हूँ साहब।
वहम नहीं पालूँगा—
तो जिऊँगा कैसे?
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