“नक्षत्र और राशि: आकाश को देखने की दो खिड़कियाँ”

जब महीनों का वैज्ञानिक आधार समझ में आने लगता है, तब पंचांग का एक और हिस्सा आधुनिक मन को उलझन में डाल देता है—नक्षत्र और राशि। आमतौर पर दोनों शब्दों को एक-दूसरे का पर्याय समझ लिया जाता है, और यहीं से आधी ग़लतफ़हमियाँ जन्म लेती हैं। कोई कह देता है कि “मेरी राशि सिंह है”, कोई पूछ बैठता है कि “आज कौन-सा नक्षत्र है”, और ज़्यादातर लोग यह मान लेते हैं कि दोनों एक ही चीज़ हैं। लेकिन पंचांग की दृष्टि में नक्षत्र और राशि दो अलग-अलग खिड़कियाँ हैं, जिनसे आकाश को देखा जाता है—एक चंद्रमा के लिए, दूसरी सूर्य के लिए।

यही बिंदु पंचांग को साधारण कैलेंडर से अलग कर देता है।

सबसे पहले नक्षत्र को समझिए। नक्षत्र चंद्र आधारित इकाई है। जब हम आकाश में चंद्रमा को देखते हैं, तो वह हर दिन तारों की पृष्ठभूमि में अपनी स्थिति बदलता है। पंचांग ने इस आकाशीय पृष्ठभूमि को 27 भागों में बाँटा है, जिन्हें नक्षत्र कहा जाता है। ये 27 नक्षत्र कोई मनगढ़ंत कल्पना नहीं हैं, बल्कि वे विशिष्ट तारक-समूह हैं जिनके सापेक्ष चंद्रमा की गति को मापा जाता है। चंद्रमा लगभग 27.3 दिनों में पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करता है, इसलिए औसतन वह हर दिन एक नक्षत्र पार करता हुआ दिखाई देता है। यही कारण है कि नक्षत्रों की संख्या 27 रखी गई—यह संख्या चंद्र की गति से निकली, किसी धार्मिक प्रतीक से नहीं।

अब ध्यान दीजिए, यहाँ फिर वही पैटर्न दिखता है जो तिथि और मास में दिखा था। पंचांग पहले गति देखता है, फिर इकाई बनाता है। चंद्र की गति से नक्षत्र बने, नक्षत्रों से मास का नाम तय हुआ, और तिथि से चंद्र–सूर्य का कोण मापा गया। यह एक जुड़ा हुआ सिस्टम है, अलग-अलग टुकड़ों का संग्रह नहीं।

अब आते हैं राशि पर।

राशि सूर्य आधारित इकाई है। सूर्य आकाश में एक वर्ष में एक पूरा चक्र करता है, जिसे हम राशि चक्र कहते हैं। इस चक्र को पंचांग ने 12 बराबर भागों में बाँटा है। 360 डिग्री को 12 से विभाजित किया जाए, तो प्रत्येक राशि 30 डिग्री की बनती है। जब सूर्य एक राशि में प्रवेश करता है, तो उसे संक्रांति कहा जाता है। मकर संक्रांति इसी का उदाहरण है—सूर्य का मकर राशि में प्रवेश।

यहीं से यह साफ़ हो जाता है कि नक्षत्र और राशि का आधार अलग-अलग है। नक्षत्र चंद्र के लिए हैं, राशि सूर्य के लिए। यही कारण है कि पंचांग में 27 नक्षत्र हैं और 12 राशियाँ। दोनों की संख्या अलग है क्योंकि दोनों की गति अलग है। पंचांग इस फर्क को मिटाने की कोशिश नहीं करता, बल्कि उसे स्वीकार करता है।

अब ज़रा सोचिए—अगर कोई प्रणाली एक ही समय में सूर्य और चंद्र दोनों को ट्रैक कर रही है, तो वह कितनी जटिल और कितनी परिष्कृत होगी। यही कारण है कि पंचांग को समझने में धैर्य चाहिए, लेकिन एक बार समझ में आ जाए तो वह अद्भुत स्पष्टता देता है।

यहीं से वह सवाल भी हल हो जाता है जो अक्सर पूछा जाता है—“हमारे त्योहार हर साल अलग-अलग तारीख़ों पर क्यों आते हैं?” इसका उत्तर सीधा है। जो पर्व चंद्र आधारित हैं, वे तिथि और नक्षत्र के अनुसार चलते हैं, इसलिए वे ग्रेगोरियन कैलेंडर की तारीख़ों पर स्थिर नहीं रहते। और जो पर्व सूर्य आधारित हैं, जैसे मकर संक्रांति, वे लगभग हर साल एक ही तारीख़ के आसपास आते हैं, क्योंकि सूर्य की गति सौर कैलेंडर से मेल खाती है।

यह कोई गड़बड़ी नहीं, बल्कि दो अलग समय-मानों का स्वाभाविक परिणाम है।

अब यहाँ एक और रोचक बिंदु उभरता है—सप्ताह और वार का। हम सात दिन का सप्ताह मानते हैं, रविवार से शनिवार तक। आम धारणा यह है कि यह व्यवस्था पश्चिम से आई है। लेकिन अगर आप ग्रंथों में देखें, तो सप्ताह और वार की संकल्पना का स्पष्ट गणितीय और खगोलीय आधार भारतीय ग्रंथों में पहले मिलता है। पंचांग के पाँच अंगों में “वार” भी एक अंग है। रविवार, सोमवार, मंगलवार—ये नाम सीधे-सीधे उन ग्रहों से जुड़े हैं जिन्हें पृथ्वी से प्रमुख रूप से देखा जा सकता है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि—इन सात ग्रहों के क्रम से सात वार बने।

यह क्रम मनमाना नहीं है। इसके पीछे भी ग्रहों की गति और आकाशीय स्थिति का एक निश्चित तर्क है, जिसका उल्लेख प्राचीन भारतीय खगोलीय ग्रंथों में मिलता है, विशेष रूप से सूर्य सिद्धांत जैसे ग्रंथों में। यह अलग बात है कि बाद में यूरोप ने इसी व्यवस्था को अपनाया और अपने देवताओं के नामों से उसे ढाल लिया—Sunday, Monday, Saturday—लेकिन मूल ढांचा वही रहा।

यहीं पर एक दिलचस्प सांस्कृतिक फर्क भी दिखता है। पश्चिमी समाज में रविवार अवकाश का दिन बना, क्योंकि चर्च को सामूहिक सभा के लिए एक दिन चाहिए था। भारत में परंपरागत रूप से अवकाश अमावस्या या पर्वों से जुड़ा रहा, न कि किसी निश्चित वार से। यह फर्क इस बात को रेखांकित करता है कि समय को देखने का दृष्टिकोण सभ्यता के साथ बदलता है।

अब तक के हिस्सों को जोड़कर देखें, तो एक तस्वीर साफ़ उभरती है। पंचांग कोई रहस्यमयी धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक बहुस्तरीय समय-प्रणाली है। उसमें तिथि है, जो कोण बताती है; मास है, जो नक्षत्र से जुड़ा है; नक्षत्र है, जो चंद्र की स्थिति दिखाता है; राशि है, जो सूर्य की गति दर्शाती है; और वार है, जो ग्रहों के क्रम से समय को बाँधता है। यह पूरा ढांचा मिलकर समय को केवल मापता नहीं, बल्कि समझाता है।

शायद इसी कारण पंचांग को पढ़ना हमें कठिन लगता है, क्योंकि वह हमसे सक्रिय समझ माँगता है। वह सिर्फ़ “आज क्या तारीख़ है” नहीं बताता, बल्कि यह भी कहता है कि “आज आकाश क्या कर रहा है।”

और जब कोई प्रणाली हमें आकाश से जोड़ देती है, तो वह केवल कैलेंडर नहीं रह जाती—वह दृष्टि बन जाती है।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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