रोने वाले रोना चाहें पर रो ना पाएं !
डाॅ प्रेमचंद द्वितीय
जिस तरह से देश विदेश में लाफिंग क्लब में लोग हंस-हंसकर अपने मन को आल्हादित करते हैं, उसी तरह अब ,, क्राइंग क्लब ,,जैसी संस्थाओं में लोग रो-रो कर मन का बोझ हल्का करते हैं। शहर की चौपाल पर जब ठहाके लगाकर और बुक्का फाड़ कर हंसने और मुस्कुराने की बात चली तो पं शिवनारायण जी बोले कई लोग रो रो कर जिंदगी पूरी कर देते हैं । और कोई हंस-हंसकर जिंदगी को आनंद से भर देते हैं ।वे बोले हाइटेक युग में जब रिश्ते सिमट गए हैं लोग एक दूसरे के साथ बैठने से कतराने लगे हैं और साथ बैठकर भी इमोशनली नहीं जुड़ते हैं तब बोझ से लदे भारी मन को हल्का करने के लिए रोना पड़ता है । वे बोले कई मर्तबा रोना मासूमियत का सबूत है और वहीं कई बार हंसना उपहास और हंसी उड़ाने का फेक्टर हो जाता है। वे बोले हंसी लोटपोट वाली होती है तो रोना सिसकी भर भर कर दिल के टुकड़े करने वाला होती है ।
हंसने रोने की चर्चा को सुनकर सुनील भैया बोल पड़े कस्बे के मजरे, टोले, ओटले, चौपाल चौराहे ,पटिए पर जब बातों में हंसी और रोने की बात आती है तो आनंद हमेशा हर बात को लेकर रोते रहते हैं ,उनको रोतले स्वभाव से उन्हें ,आनंद रोतला, के नाम से जानते हैं। और लोग कहते है आनंद के पास रोने का आनंद है ,ठीक इसके विपरीत स्वामी मुस्कुरा मुस्कुरा कर ,स्वामी मुस्कुरा के, बन गए हैं तो कोई तो कोई दिल मिलाकर स्वामी ,दिल मिला के ,तो कुछ हंस कर जश्न मना कर ,,स्वामी जश्न खिला के ,,नाम से पहचाने जाने लगे हैं ।लेकिन मुस्कुराने की हकीकत को जांच तो पता चलेगा कि इसमें इमोशन का मिशन कहीं से कहीं नहीं होता है जबकि रोने में जो रो-रो कर भावनाओं को छलका कर मन का बोझ हल्का हो जाता है ।वे बोले रो-रो कर कई राज लेते हैं तो कई फर्जी ,आटिॅफिशियल रोना रोकर ऑफिस में लगी अर्जी को मंजूरी हासिल कर लेते हैं। कई रोने धोने के छोटे-छोटे आंसुओं से सहानुभूति
का समंदर लूट लेते हैं ।
इस पर पवन बाबू बोले हमारे देश में कमलेश ,मसाला वाला, ने लोगों को खूब हंसाया लेकिन हंस-हंसकर और हंसा हंसा कर उन्होंने महसूस किया कि मानव शरीर के लिए रोने की और आंसुओं की जरूरत होती है ताकि आर्टिफिशियल हंसी हंस हंस कर जब हल्का न हो सके तो रो-रो कर हर कोई हल्का हो सकता है। जब आंसुओं की बात सामने आई तो अखिलेश जी बोले बगैर आंसुओं के रोने का कोई वजूद नहीं है। रोना कोई ट्रेंड, ट्रेड ,फेशन नहीं है बल्कि मरी हुई भावनाओं को जीवित करने का लोशन है ।
जब आंसूओं की बात शुरू हुई तो आशु जी बोले परेशानी को व्यक्त करने का हथियार आंसू होते हैं ।आंसू कईयों के लिए कमजोरी हो सकती है लेकिन आंसुओं से लो और हाई प्रोफाइल का ड्रामा खेल सकते हैं ।
इस पर शैलू जी बोले ,क्राइंग क्लब, में आंसू न हो तो इस क्लब की कोई औकात ही नहीं होती है ।आंसू रिसर्च का विषय है । वे बोले जब श्रीमती को प्याज काटते काटते आंख में आंसू आ जाते हैं तो वह आंसू इतने खतरनाक नहीं होते हैं जितने चुनाव के व्यक्त प्याज की कीमत के आंसू जब निकलते हैं तो प्याज सरकारों को रुला देते है और अक्सर प्याज चुनाव के दौरान रुलाने का काम करने में अभ्यस्त हो गए हैं ।वे बोले आंसू घड़ियाली भी होते हैं और इन घड़ियाली आंसू से रोने वाले हंसी को रोॅद देते हैं ।जहां तक आंसू न हो ,रोने का कोई महत्व नहीं है। मगर बगैर आंसुओं के लोग महंगाई का रोना रोते हैं आंसू पक्ष विपक्ष को दोनों को रुला देते हैं। वैसे भी आंसू इमोशनल होते हैं लेकिन कई मर्तबा आंसू पत्थर बन जाते हैं जिनसे न तो रोया जाता है न हीं हंसा जाता है। गम और खुशी दोनों के आंसू अलग-अलग होते हैं ।आंसू बेशकीमती होते हैं। ऊंट के आंसू बहुत महंगे बिकते हैं लेकिन मनुष्य के आंसू अमूल्य होते हैं। वे बोले जिस तरह मुस्कुराहट की आहट अच्छे-अच्छे काम बना देती है इस तरह रोने के आंसू अच्छों अच्छों को रुला कर अपना मतलब सिद्ध करा देते हैं। हाईटेक युग में लोग साथ में रोने वाले का साथ ढूंढते हैं। रोकर इमोशंस शेयर करते हैं और फिर हल्के होकर घर लौटते हैं ।कुछ रो-रो कर अपनी यातना के किस्से कहानी बताते हैं ।उम्र दराज और सीनियर सिटीजन साथ बैठकर केवल हंसी से नहीं वरन रो रो कर अकेलेपन को दूर करते हैं ।
वे बोले आज के जमाने में अकेलापन इतना है कि रोने वाले रोना चाहते है पर रो ना पाते है वस्तुत रोना मात्र इमोशन नहीं शरीर का एक सिस्टम है ।कोई तो रोने में आठ आठ आंसू रो देते हैं और फूट-फूट कर रोते हैं ,कई अंधों के आगे भी रोते हैं कई आंसू पी पी कर रोते हैं ,खुशी और गम में भी रोते हैं लेकिन हर किसी के लिए रोना आसान नहीं है कि क्योंकि रोना भी एक आर्ट है! और रोने वाले रोना चाहे पर रो ,ना, पाते है!
Comments ( 1)
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डॉ मुकेश 'असीमित'
20 minutes agoलाफिंग क्लब के बाद अब क्राइंग क्लब! आधुनिक जीवन, अकेलेपन, आंसुओं और रोने की कला पर डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का रोचक हास्य-व्यंग्य।