ज़ेन ज़ी की किरांति सफल हुई
ज़ेन ज़ी की किरांति सफल हुई। शहर के एक होटल में जश्न मनाया जा रहा है। उधर कई बूढ़े खूसटों के पेट में मरोड़े उठने लगे हैं। अरे… तुम क्या समझोगे ज़ेन ज़ी का दर्द! जिस पीढ़ी ने बचपन से “रील” में जीना सीखा हो, वह क्रांति भी फुल एचडी क्वालिटी में ही करेगी।
हम ठहरे पुराने ज़माने के लोग। हमारी किरांति का क्या था? चप्पल पहनकर किसी भी मोहल्ले के नेता के पीछे चल पड़ते थे। हमें बड़ा मुगालता रहता था कि व्यवस्था बदलने निकले हैं। न नारा ढंग का, न कैमरा, न ड्रोन। बस गला फाड़ते रहो, पसीना बहाते रहो और शाम को घर आकर चाय पी लो।
पर ज़ेन ज़ी… वाह! इनकी तो बात ही निराली है। इन्हें हर बात में किक चाहिए, फील चाहिए, मोमेंट चाहिए। आंदोलन ऐसा होना चाहिए कि दस रील बन जाएँ, बीस स्टोरी चढ़ जाएँ, नए-नए नारे और दो-चार नई गालियाँ भी ट्रेंड कर जाएँ। आखिर आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी कि “दादा जी, आपने कौन-सी किरांति की थी?” तो एल्बम दिखाने लायक कंटेंट भी तो होना चाहिए।
ज़ेन ज़ी जानती है कि सरकार तो अभी बदलनी नहीं। चलो, कम से कम एक दो मंत्री ही बदल जाएँ तो किरांति सफल मानी जाएगी।
पेपर लीक हुआ। लाखों युवाओं का भविष्य दाँव पर लगा। गुस्सा स्वाभाविक था। सड़कें भर गईं। नारे लगे। कैमरे आए। ड्रोन उड़ने लगे। मीडिया वाले ऐसे माइक घुसा रहे थे मानो यहीं से अगला प्रधानमंत्री चुन लिया जाएगा।
इतने में भी कुछ ज़ेन ज़ी मित्रों का मन नहीं भरा।
एक बोला, “यार, पुलिस का डंडा पड़ते समय कितना दर्द होता होगा? जिसके पड़ गया, उसी से पूछना पड़ेगा।”
दूसरा बोला, “मेरे तो नहीं पड़े… लेकिन जिसकी पिटाई हुई उसकी रील बनाकर ही आत्मिक संतोष मिल गया।”
एक तीसरा आँसू गैस का गोला देखकर बोला, “यार… अगर आँखों से आँसू नहीं निकले तो आंदोलन का इमोशनल एंगल कैसे बनेगा?”
उधर बिहार वाले कुछ जांबाज़ों ने तो बारिश का इंतज़ार ही छोड़ दिया। सीधे वाटर कैनन की माँग कर डाली—”भाई, थोड़ा इधर भी घुमा दो… रेन डांस भी हो जाएगा और वीडियो भी वायरल हो जाएगी!”
थोड़ी देर बाद एक अनुभवी क्रांतिकारी बोला—
“भाई… मज़ा तो आ गया। अब अगला सीन क्या है?”
दूसरा बोला—
“बस यार… एक रिज़ाइन दिलवा दो।”
तीसरा बोला—
“शिक्षा मंत्री का नहीं हो तो कोई स्टैंडबाय मंत्री ही सही। सरकार ने किसी न किसी को तो रिज़ाइन देने के लिए रिज़र्व रखा ही होगा।”
“अच्छा… फिर?”
“फिर पार्टी करेंगे।”
देखिए, माँग कितनी मासूम है। व्यवस्था सुधरे या न सुधरे… परीक्षा प्रणाली मजबूत बने या न बने… दोषियों को सज़ा मिले या न मिले… लेकिन एक इस्तीफ़ा तो गिरना ही चाहिए। आखिर इतने दिनों से ज़ेन ज़ी धूप में नारे लगा रही है। किरांति का कोई तो ट्रॉफी मोमेंट होना चाहिए।
सुना है कुछ लोगों ने पहले से ही केक बुक करा रखा था ,मोमबत्तियाँ तैयार थी । डीजे तैयार। बस त्यागपत्र गिरते ही लोकतंत्र के नाम पर केक कटेगा और बैकग्राउंड में बजेगा—
“आज ब्लू है पानी-पानी…”
तभे जेन जी का लीडर चिल्लाया-अरे सुबह हो गयी मामू…
“अरे… त्यागपत्र आ गया!”
वाह! पूरा न्याय तंत्र जैसे त्यागपत्र की जेब में ही रखा था। त्यागपत्र निकला और पेपर लीक का वायरस मोबाइल से अनइंस्टॉल हो गया। भ्रष्टाचार रीसेट हो गया। अगली सुबह सूरज भी सरकारी अधिसूचना पढ़कर उगा होगा।
उधर लाखों विद्यार्थी अब भी सोच रहे हैं कि अगली परीक्षा कब होगी। लेकिन कुछ लोग उनसे भी नाराज़ हैं।
“ये बच्चे भी बड़े अहसानफ़रामोश हैं। मंत्री जी ने त्यागपत्र दे दिया, फिर भी संतुष्ट नहीं हैं!”
ज़ेन ज़ी ने भले खुद नीट न दी हो, लेकिन नीट देने वालों का दर्द खूब महसूस किया। कुछ लोगों नीट देकर नहीं, ‘नीट‘ पीकर आंदोलन किया में भाग लिया है । अब जब त्यागपत्र निकलवा ही लिया है तो जश्न मनाने में क्या बुराई है? अब वही नीट दुआब्रा पीकर हम जीत का जश्न मनाएंगे l
देखिए, पेपर लीक बुखार की तरह है। उसका इलाज कठिन है। लेकिन ज़ेन ज़ी दूरदर्शी है। दवा से बुखार उतरता है या नहीं, यह बाद की बात है। उसने तो सीधा थर्मामीटर ही तोड़ दिया।
अब न बुखार नापा जाएगा…
न जिम्मेदारी तय होगी…
और सब कहेंगे—
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