शिव—यह शब्द सुनते ही हमारे भीतर एक परिचित-सी छवि उभर आती है। जटाओं में गंगा, गले में सर्प, भस्म लिपटा शरीर, कैलास पर विराजमान एक देवता। हम सहजता से मान लेते हैं कि यही शिव हैं। पर यहीं से भ्रम शुरू होता है। शिव किसी एक रूप में सीमित हो जाएँ, यह स्वयं शिवत्व के विरुद्ध है। शिव को समझना हो तो पहले यह स्वीकार करना पड़ेगा कि शिव किसी मूर्ति से बड़े हैं, किसी कथा से गहरे हैं और किसी पूजा-पद्धति से कहीं आगे—वे एक अवस्था हैं, एक अनुभव हैं, एक निरंतर चलने वाली आंतरिक प्रक्रिया हैं।
शिव का वास्तविक अर्थ कल्याणकारी या मंगलकारी कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता। शिव का अर्थ है—लांघना। जहाँ भी कोई व्यक्ति अपनी ही बनाई सीमाओं को चुनौती देता है, वहीं शिवत्व प्रकट होता है। सामने बाधा है, भय है, संशय है, और फिर भी व्यक्ति रुकता नहीं, पीछे नहीं हटता, बल्कि उस बाधा को पार कर जाता है—यही शिव है। यही शिवत्व का मूल है। बाकी जो भी कथाएँ हैं, जो भी रूपक हैं, वे उसी मूल अनुभव का विस्तार भर हैं।
इसी संदर्भ में जब हम निर्वाण षट्कम् या आत्मसटकम् की बात करते हैं, तो वह कोई दार्शनिक कविता मात्र नहीं रह जाती। वह एक सीधा-सा लेकिन कठिन सूत्र है—खुद को पहचानने का। निर्वाण षट्कम् का पहला ही छंद नमन करता है उस सबको जो अनाम है, और साथ ही नकार देता है उस सबको जो मैं नहीं हूँ। मन नहीं, बुद्धि नहीं, चित्त नहीं, अहंकार नहीं—यह नकार कोई भागने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि छँटनी की प्रक्रिया है। जो मुझे बाँधता है, जो मुझे रोकता है, जो मेरे मार्ग में अवरोध बनता है—उसका नकार ही शिवत्व है।
हम भीतर जो कुछ भी अनुभव करते हैं—विचार, भाव, स्मृतियाँ, प्रतिक्रियाएँ—उन्हें ही अपना सत्य मान लेते हैं। जबकि अंतःकरण चतुष्टय, यानी मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार, ये सब केवल उपकरण हैं। समस्या तब शुरू होती है जब उपकरण मालिक बन जाते हैं। शिवत्व का पहला आग्रह यही है कि इन चारों को अत्यधिक महत्व मत दो। इसका अर्थ यह नहीं कि मन नष्ट हो जाए या बुद्धि काम न करे। मन रहेगा, बुद्धि रहेगी, चित्त रहेगा, अहंकार भी रहेगा—पर वे स्वामी नहीं होंगे। वे सेवक होंगे।
तो फिर स्वामी कौन होगा?
स्वामी होगा प्रेम।

यहाँ प्रेम शब्द पर अक्सर सबसे बड़ा भ्रम होता है। हम प्रेम को कामना से जोड़ लेते हैं—पाने की इच्छा, किसी और पर निर्भरता, किसी से अपेक्षा। इसलिए यहाँ “शुद्ध प्रेम” शब्द का प्रयोग करना पड़ता है। पर सच तो यह है कि प्रेम अपने आप में ही पर्याप्त है। प्रेम वह जो अहं का आत्मा के प्रति हो। प्रेम वह जो स्वयं की शुद्धता के प्रति हो। अपने होने के प्रति प्रेम। यही शिवत्व का केंद्र है।
जब प्रेम स्वामी बनता है, तब मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार उसके पीछे चलते हैं। तब बुद्धि साधन बन जाती है, अहं पहचान नहीं बल्कि जिम्मेदारी बन जाता है, चित्त स्मृतियों का बोझ नहीं बल्कि अनुभवों का संग्रह बनता है, और मन भटकाव नहीं बल्कि संवेदनशीलता बन जाता है। तब यह चारों बाधा नहीं रहते, संसाधन बन जाते हैं।
इसीलिए आत्मसटकम् हमें यह भी सिखाता है कि हमारी पहली जिम्मेदारी किसके प्रति है—स्वयं के प्रति। यह वाक्य सुनते ही भीतर प्रतिरोध उठता है। हमें लगता है कि यह स्वार्थ है। पर यह प्रतिरोध इसलिए उठता है क्योंकि हमने जिम्मेदारी को हमेशा बाहर की ओर देखा है। जबकि सच यह है कि यदि पहली जिम्मेदारी पूरी हो जाए—अपने प्रति—तो बाकी सारी जिम्मेदारियाँ अपने आप पूरी हो जाती हैं। जो व्यक्ति स्वयं के प्रति ईमानदार है, वह किसी और के प्रति अन्यायी नहीं हो सकता। जो अपनी आत्मा से प्रेम करता है, वह संसार से घृणा नहीं कर सकता।
अब बात निराकार और साकार शिव की। साकार शिव वे हैं जिन्हें हम देखते हैं, जिनकी कल्पना करते हैं, जिनके सामने दीप जलाते हैं। साकार रूप मन के लिए आवश्यक हैं, क्योंकि मन को प्रतीक चाहिए। पर निराकार शिव वह शुद्ध सत्ता है जो इन प्रतीकों के पीछे है। वह जो अनुभव है, आकार नहीं। जो चेतना है, रूप नहीं। जब मन-बुद्धि-अहंकार के पार जाकर जो शुद्धता बचती है, वही निराकार शिव है।
और शिव-शक्ति? शिव चेतना हैं, शक्ति ऊर्जा है। चेतना बिना ऊर्जा निष्क्रिय है और ऊर्जा बिना चेतना दिशाहीन। जब भीतर चुनौती उठती है और हम ऊर्जा के साथ उसका सामना करते हैं, लेकिन अहं के उन्माद में नहीं बहते—वहीं शिव और शक्ति का मिलन होता है। जब कोई ललकार उठती है और वह ललकार विवेक से संचालित होती है—वह शिव-शक्ति है।
अब सबसे असहज प्रश्न—शिव के नाम पर झूठ कौन फैला रहा है? इसका उत्तर किसी एक व्यक्ति या समूह की ओर उँगली उठाकर नहीं दिया जा सकता। यह झूठ तब फैलता है जब शिव को सीमित कर दिया जाता है। जब शिव को केवल एक पहचान, एक पंथ, एक झंडे में बाँध दिया जाता है। जब शिव को केवल चमत्कारों का वितरक बना दिया जाता है और आत्म-चुनौती से बचने का बहाना बना लिया जाता है। तब शिव नहीं, हमारा अहं बोल रहा होता है।
शिव लांघन हैं। सीमाओं का अतिक्रमण। जो शिव को सीमित करे, वही झूठ है।
और शिव चतुर्दशी? वह हमें याद दिलाती है कि पूर्णिमा से ठीक पहले का अंधकार भी आवश्यक है। पूर्णता के ठीक पहले की बेचैनी, असमंजस, प्रश्न—यही चतुर्दशी है। यही वह क्षण है जहाँ भीतर शिवत्व जाग सकता है।
यदि आज शिव चतुर्दशी पर हम केवल इतना कर लें कि अपने भीतर की किसी एक सीमा को पहचान लें और उसे लांघने का साहस कर लें—तो वही सच्ची शिव-पूजा है। दीप, धूप, व्रत—सब बाद में। पहले यह देखना जरूरी है कि हम कहाँ रुक गए हैं, कहाँ डर गए हैं, और कहाँ अपने ही मन के आगे हार मान ली है।
जहाँ भी कोई व्यक्ति अपनी सीमाओं को चुनौती देता है—वहाँ शिव हैं।
जहाँ भी कोई अपनी शुद्धता से प्रेम करता है—वहाँ शिवत्व है।
और जहाँ मन-बुद्धि-अहंकार प्रेम के पीछे चलने लगते हैं—वहीं निर्वाण घटित होता है।
शिव कहीं बाहर नहीं हैं।
वे हर उस क्षण में हैं, जब आप रुकते नहीं—बल्कि लांघते हैं। 🔱
मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योमभूमि- र्न तेजो न वायुः चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।।
न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः न वा सप्तधातु- र्न वा पञ्चकोशाः।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।।
न मे द्वेषरागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।।
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम् न मंत्रो न तीर्थ न वेदा न यज्ञाः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।।
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता न जन्म ।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।।
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपः विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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