आमिर ख़ान की फ़िल्म “सितारे ज़मीन पर” का रिव्यू लिखते हुए सबसे पहले वही सवाल सामने खड़ा हो जाता है जो अक्सर देर से देखी गई अच्छी फ़िल्मों के साथ होता है—इतनी लेट-लतीफ़ी क्यों? छह महीने पहले रिलीज़ हुई फ़िल्म का रिव्यू आज? तो जनाब, छोटे शहर में रहने वालों की मजबूरी समझिए। इंतज़ार था कि फ़िल्म OTT पर आए, ताकि बिना हाइप, बिना शोर और बिना सिनेमाघर की भीड़ के, आराम से देखा जा सके। और फिर कल यूँ ही यूट्यूब स्क्रॉल करते हुए अचानक यह फ़िल्म सामने आ गई। आमतौर पर यूट्यूब पर “फुल HD मूवी” का लालच देकर पाँच मिनट का रिव्यू पकड़ा दिया जाता है, जिसे घुमा-फिराकर दो घंटे का बना दिया जाता है—बड़ा लोचा है ये। लेकिन यहाँ मामला अलग था। घर में बेटी फ़िल्म देख रही थी, तीस मिनट बीत चुके थे और फ़िल्म सचमुच चल रही थी—तब यक़ीन हुआ कि हाँ, फ़िल्म आ चुकी है। वो भी बिना किसी विज्ञापन के। लगा शायद सरकार ने ही प्रमोट कर दी हो—और सच कहें तो ऐसी फ़िल्मों को प्रमोट किया ही जाना चाहिए।
“सितारे ज़मीन पर” एक ऐसी फ़िल्म है जो आपको धीरे-धीरे पकड़ती है। बिना शोर, बिना ज़ोर-ज़बरदस्ती। यह फ़िल्म दिव्यांगता को दया की नज़र से नहीं देखती, बल्कि समझ की ज़मीन पर खड़ा करती है। इसका सबसे सशक्त कथ्य यही है कि जो आपके लिए ‘नॉर्मल’ है, वह ज़रूरी नहीं कि दूसरे के लिए भी नॉर्मल हो। हर इंसान का अपना नॉर्मल होता है, और उसी के साथ वह जीता है। हमें समस्या उस इंसान से नहीं, अपनी असहजता से होती है। और फ़िल्म उसी असहजता को आईना दिखाती है।
फ़िल्म डाउन सिंड्रोम जैसे संवेदनशील विषय को बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली ढंग से समझाती है—इसे न तो मेडिकल लेक्चर बनाती है, न भावनात्मक ब्लैकमेल। बस यह बताती है कि किस्मत हाथों में नहीं होती, कई बार वह क्रोमोसोम में लिखी होती है—21वें क्रोमोसोम की एक अतिरिक्त प्रति, बस इतनी-सी बात, और पूरी ज़िंदगी का फ्रेम बदल जाता है। लेकिन ज़िंदगी कम नहीं होती।
रिलीज़ के समय फ़िल्म की हाइप अजीब तरह से कम रही। आमिर ख़ान, जो कभी अपनी फ़िल्मों को प्रमोट ही नहीं करते थे, इस बार हर इंटरव्यू में नज़र आए। कहीं नेशनलिटी प्रूव करते दिखे, कहीं रणनीतियाँ बदलते। सुबह के शो हटे, दोपहर से शो शुरू हुए, एडवांस बुकिंग में टिकटों का आँकड़ा भी चौंकाने वाला रहा। शायद यही वजह रही कि पुराने आमिर-फ़ैन्स को थोड़ी मायूसी हुई—क्योंकि आमिर की सबसे बड़ी ताक़त हमेशा उनकी रहस्यमय अनुपस्थिति रही है। लेकिन फ़िल्म देखने के बाद यह शिकायत खुद-ब-खुद फीकी पड़ जाती है।
कहानी की बात करें तो यह एक होलसम अनुभव है। आप जानते हैं कि यह रीमेक है, फिर भी भूल जाते हैं। हँसते हैं, रोते हैं, और फ़िल्म में ऐसे डूबते हैं कि क्लाइमेक्स आते-आते खड़े होकर तालियाँ बजाने का मन करने लगता है। यह वही पुराना बॉलीवुड एहसास लौटाती है—जहाँ कॉमेडी हँसाते-हँसाते आँखें नम कर दे, और इमोशन बोझ नहीं, राहत बन जाए।
आमिर ख़ान पहले हाफ़ में अपने जाने-पहचाने अंदाज़ में दिखते हैं, लेकिन दूसरे हाफ़ में जब भावनात्मक परत खुलती है, तब वे पूरी तरह फ़िल्म को अपने कंधों पर उठा लेते हैं। जेनेलिया डिसूज़ा का अभिनय सहज है, बिना ओवरडोज़ के। और फ़िल्म की सबसे बड़ी जीत है—डाउन सिंड्रोम से जुड़े रियल एक्टर्स की कास्टिंग। उनका अभिनय नहीं, उनकी मौजूदगी ही फ़िल्म को ईमानदार बनाती है।
हाँ, अगर शिकायत करनी हो तो बस इतनी कि बैकग्राउंड स्कोर कुछ जगहों पर और प्रभावी हो सकता था। लेकिन सच कहें तो यह शिकायत भी तब याद आती है जब फ़िल्म ख़त्म हो जाती है—देखते वक्त आप पॉज़िटिव से बाहर ही नहीं आ पाते।
“सितारे ज़मीन पर” उन गिनी-चुनी फ़िल्मों में है जिन्हें परिवार के साथ बैठकर देखा जाना चाहिए। यह ज़मीन पर नहीं लाती, बल्कि भीतर के सितारों को जगा देती है। साल की बेहतर बॉलीवुड फ़िल्मों में इसकी जगह पक्की है। अगर आपने इसे नज़रअंदाज़ किया है, तो शायद आपको फ़िल्मों की शिकायत करने का हक़ भी थोड़ी देर के लिए टाल देना चाहिए।
चार में से चार नहीं, लेकिन चार में से चार के बेहद क़रीब—एक दिल से बनी, दिल तक पहुँचने वाली फ़िल्म। यह सिर्फ़ देखी नहीं जाती, महसूस की जाती है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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