“सोसल डिस्टेसिग के दौर में कोरोना”
डिस्टेसिग के दौर में
कवियों की भीड
गजल ढा रही है
‘वायरल’ हो मेरा
कोरोना काव्य
ये दिल की चाह
दिल से निकल रही है
जबकि मेरी चाहत है
इस कोरोना को ही
‘वायरल’हो जाये
डैगू,मलेरिया या
ऐसा ही कोई
रोग हो जाय
तो कोरोना को अपनी
जान के लाले पड जाय
ये वात मेरे दिमाग
में आयी है
इसी में मानवता
की भलाई है।
रचियता -महादेव प्रेमी
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