चौराहे पर बैठा राजा

Pradeep Audichya Dec 16, 2025 व्यंग रचनाएं 0

चौराहे पर बैठा वह कोई साधारण जानवर नहीं था—वह डर, लापरवाही और व्यवस्था की मिली-जुली पैदाइश था। उसकी गुर्राहट में कानून की चुप्पी और उसके सींगों में सत्ता की स्वीकृति चमक रही थी।

वाह रे ज़माना — डिज़ाइनर बेबी का

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 16, 2025 व्यंग रचनाएं 0

अब बच्चा भगवान की देन नहीं, माता-पिता की पसंद बनता जा रहा है। आँखों का रंग, करियर, आईक्यू—सब कुछ पैकेज में मिलेगा। पर सवाल यह है कि डिज़ाइन में मासूमियत का कॉलम क्यों छूट गया?

बधाई हो, शर्मा जी अंकल बन गए!

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 8, 2025 व्यंग रचनाएं 0

"जितना सफेद बाल छुपाते हैं, वो उतनी ही तेजी से अपनी असलियत दिखाता है—जैसे व्यवस्था की कालिख सफ़ेदपोशों पर।" Excerpt 2:

नेता जी का इंटरव्यू – हम झूटन के बाप

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 7, 2025 व्यंग रचनाएं 0

नेता जी का यह इंटरव्यू लोकतंत्र के नाम पर एक शानदार हास्य-नाट्य है। हर सवाल का जवाब वे इतनी आत्मा-तुष्ट गंभीरता से देते हैं कि सच्चाई उनसे सावधान दूरी बनाकर खड़ी रहती है। बेहतरीन व्यंग्य, तीखे संवाद और कैमरे के सामने झूठ की अग्निपरीक्षा—सब कुछ यहाँ मौजूद है।

पानी–पूरी दर्शन : भारतीय ज्ञान–परंपरा का सबसे कुरकुरा, चटपटा और लोकतांत्रिक उपनिषद

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 4, 2025 हास्य रचनाएं 0

“गोलगप्पा केवल चाट नहीं—भारत का चलित विश्वविद्यालय है, जहाँ मीठा, खट्टा और तीखा स्वाद जीवन-दर्शन बनकर उतरता है।” गोलगप्पा–लाइन भारतीय लोकतंत्र की असली प्रयोगशाला है—आईएएस हो या कवि, सबकी कटोरी बराबर काँपती है

समोसे का सार्वभौमिक सत्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 29, 2025 व्यंग रचनाएं 0

“समोसा सिर्फ नाश्ता नहीं—भारतीय समाज, राजनीति और प्रेमकथाओं का सबसे स्थायी त्रिकोण है। डॉक्टर से लेकर दफ़्तर और दाम्पत्य तक, हर मोड़ पर यह तला-भुना फल अपना प्रभाव दिखाता है। बर्गर रोए या बाबू सोए—पर समोसा आए तो सब जग जाएं! यही है समोसे का सार्वभौमिक सत्य।”

आप तो बस लिखते रहिए..

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 24, 2025 व्यंग रचनाएं 0

“आप लिखते हैं तो लोग आपको क्रांतिकारी समझ लेते हैं—खुद रिमोट बदलने से डरते हैं पर क्रांति की बंदूक आपके कंधे पर रखकर चलाना चाहते हैं। यह व्यंग्य उन लोगों का चश्मा है जो चाहते हैं—बगावत आपकी हो, जोखिम आपका हो… और तमाशा उनका।”

कान-भरैयों का महाग्रंथ :बात आपकी, कथा इनकी—और बीच में कानों की चिल्लम

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 24, 2025 व्यंग रचनाएं 0

“कान-भरैयों की दुनिया बड़ी विचित्र है—ये आधा सुनते, चौथाई समझते और बाकी अपनी कल्पना की दही में फेंटकर ऐसी तड़कती-भड़कती कहानी बना देते हैं कि बेचारा सुनने वाला सोचता रह जाए—‘मैंने तो नमस्कार कहा था, इसमें षड्यंत्र कहाँ से आ गया?’ यह व्यंग्य उन्हीं महापुरुषों का महाग्रंथ है।”

अब मेरा कौन सहारा: देसी इलाज, सरकारी योजनाएँ और छेदी लाल का व्यंग्य

Ram Kumar Joshi Nov 23, 2025 व्यंग रचनाएं 2

सरकारी अस्पताल से बाहर निकलता छेदी लाल सिर्फ़ दवा की कमी से नहीं, टूटी परंपराओं और बदलती नीतियों से भी परेशान है। संधाणा के दिनों से लेकर आरजीएचएस की च्यवनप्राश छूट तक, और अब आयुर्वेदिक दवाओं के कटते नामों से लेकर एलोपैथिक सूची के फैलते आकार तक—उसकी शिकायत में जनता का असली दर्द झलकता है। व्यंग्य का सीधा सवाल यही है कि जब “स्वदेशी” के नाम पर वोट माँगे गए थे, तो देसी दवाओं का गला किस टेबल पर घोंटा जा रहा है?

व्यंग्य का वैश्विक और हिंदी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 22, 2025 आलोचना ,समीक्षा 0

पश्चिमी साहित्य में ऑस्टेन, स्विफ्ट, ऑरवेल और हक्सले जिस तीक्ष्ण हास्य से समाज और सत्ता की विसंगतियों को खोलते हैं, वहीं हिंदी में परसाई, शरद जोशी और चतुर्वेदी उसी परंपरा को देसी अंदाज़ में आगे बढ़ाते हैं। व्यंग्य भाषा नहीं देखता—वह मनुष्य की आदतों, पाखंड, लालच, दिखावे और सामाजिक मूर्खताओं पर चोट करता है। यही कारण है कि व्यंग्य वैश्विक भी है और गहरे स्थानीय भी।