बी.पी.एल. संस्कृति-हास्य व्यंग्य रचना
भारत की बी.पी.एल. संस्कृति पर तीखा व्यंग्य—जहाँ लग्ज़री कार वाले भी गरीब हैं और असली गरीब सिस्टम में फंसे हैं। पढ़ें लोकतंत्र की विडंबनाओं पर हास्य-व्यंग्य से भरपूर लेख।
भारत की बी.पी.एल. संस्कृति पर तीखा व्यंग्य—जहाँ लग्ज़री कार वाले भी गरीब हैं और असली गरीब सिस्टम में फंसे हैं। पढ़ें लोकतंत्र की विडंबनाओं पर हास्य-व्यंग्य से भरपूर लेख।
भारतीय समाज में लाइन में लगना एक कला बन चुकी है—गैस सिलेंडर से लेकर ऑनलाइन बुकिंग तक। पढ़िए एक रोचक और तीखा व्यंग्य “लाइन में खड़े रहने का हुनर”।
“हमने बेशर्मी को साधना की तरह साध लिया है—और अब जब पड़ोसी देश सुधार की बात करते हैं, तो हमें असुविधा होने लगती है।” यह व्यंग्य न केवल भारतीय राजनीति की विडंबनाओं को उजागर करता है, बल्कि हमारे सामाजिक स्वभाव पर भी तीखा सवाल खड़ा करता है।
रंग बदलने के पुराने उस्ताद गिरगिट भी आजकल इंसानों की रंगबाज़ी से हैरान हैं। सुरक्षा के लिए रंग बदलने वाले जीव अब अपनी साख बचाने की बैठक कर रहे हैं। व्यंग्य यह है कि बदनाम गिरगिट हैं, मगर रंग बदलने की असली महारत इंसानों ने हासिल कर ली है।
देवर्षि नारद इंद्र को बताते हैं कि मृत्युलोक में मूर्खता अब योग्यता, नीति और प्रमोशन का आधार बन चुकी है। बुद्धिमान अल्पसंख्यक हो चुके हैं और प्रश्न करना अपराध माना जाने लगा है। इस व्यंग्यात्मक संवाद में मूर्खता के सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक स्वरूप का तीखा और हास्यपूर्ण चित्रण किया गया है।
नेताजी कर्मदास की राजनीति जनसेवा से नहीं, फीता-कटिंग से संचालित होती है। कैंची उनकी पहचान है और उद्घाटन उनका धर्म। लेकिन जब बाबा धर्मदास ने उनकी जगह ले ली, तो नेताजी के राजनीतिक अस्तित्व पर ही कैंची चल गई।
फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं— यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है, और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है— कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?
मृत्युलोक की राजनीति में “कड़े कदम” उठाने की अद्भुत तकनीक विकसित हो चुकी है। हर संकट में घोषणा होती है कि कड़े कदम उठाए जाएंगे—और जनता आश्वस्त हो जाती है। जब इस तकनीक की चर्चा देवलोक पहुँची, तो इंद्रदेव ने नारद मुनि को इसकी तहकीकात के लिए भेजा। उनकी रिपोर्ट सुनकर देवसभा भी सोच में पड़ गई—कहीं यह तकनीक देवलोक को भी मृत्युलोक न बना दे।
सरकार की पशुपालन योजना में गाय-भैंस को तो जगह मिल गई, पर गधे को अभी भी पहचान का इंतजार है। गधा गणना में घटती संख्या ने विशेषज्ञों को चौंका दिया है। इस व्यंग्य में गधा संरक्षण, पति पंजीकरण और पड़ोसी देशों की गधाग्राही अर्थव्यवस्था के बहाने समाज और व्यवस्था पर हल्का-फुल्का कटाक्ष किया गया है।
“आपने प्रशासन को जगाया है न? अब भुगतो। विकास की सुरसा अब खुले मुँह आपके नथुनों तक पहुँच चुकी है।”