मेरी बात हो गई है ऊपर-व्यंग्य रचना

Pradeep Audichya Jul 31, 2025 व्यंग रचनाएं 2

नेता जी ने बचपन में ही तय कर लिया था कि वह सिर्फ नेता बनेंगे। अब जनसेवा के नाम पर वह चाय की दुकानों पर घूमते हैं, उधारी बढ़ाते हैं और हर बात में कहते हैं – "मेरी बात ऊपर हो गई है।" कार्यकर्ता जेल में हो या शहर अधर में – समाधान ऊपर तय होता है।

संस्था का स्वयंवर: ‘योग्यता’ नहीं, ‘जुगाड़’ की वरमाला!

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 30, 2025 व्यंग रचनाएं 6

संस्था अब कोई विचारशील मंच नहीं, एक शर्मीली दुल्हन बन चुकी है, जिसका स्वयंवर हर दो साल बाद होता है। यहां वरमाला योग्यताओं पर नहीं, जुगाड़ और सिफारिशों पर डाली जाती है। मंच सजे हैं, दूल्हे कतार में हैं—किसी के पास डिग्री, तो किसी के पास 'ऊपर' तक पहुंच। पढ़िए, जब संस्था के मंडप में लोकतंत्र लपका बनने निकल पड़ा!

वोट से विष तक : नागों का लोकतांत्रिक सफर

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 29, 2025 व्यंग रचनाएं 6

यह रचना नाग पंचमी के बहाने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है। इसमें नाग रूपी नेताओं की तुलना असली साँपों से करते हुए बताया गया है कि किस तरह जनता अपने वोट, टैक्स और परंपरा से इन नागों को दूध पिलाने का काम करती है, जो बाद में उसे ही डसते हैं। यह व्यंग्य परंपरा, राजनीति और नकली महानताओं का आइना है।

सिस्टम, सिस्टमैटिकली बच निकला है —व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 26, 2025 Blogs 7

एक और सरकारी छत गिरी, मासूम मरे, सिस्टम फिर बच निकला — जैसे संविधान में इसके लिए छूट हो। सरकार की संवेदना ट्विटर और प्रेस के लिए आरक्षित रही, नतीजे में निलंबन, मुआवजा और मगरमच्छी आँसू मिले। असल सवाल वही रहा — कब तक ढहती छतों के नीचे संवेदनशीलता दफन होती रहेगी और सिस्टम बाल बांका किए बिना बच निकलता रहेगा?

बाढ़ में डूबकर भी कैसे तरें-हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 15, 2025 व्यंग रचनाएं 6

बाढ़ आई नहीं कि सरकारी महकमें ‘आपदा प्रबंधन’ में ऐसे सक्रिय हो गए जैसे ‘मनौती’ पूरी हो गई हो। नदी उफनी नहीं कि पोस्टर लग गए, हेलिकॉप्टर उड़ गए, और राहत की थैलियाँ गिरने लगीं। मगरमच्छ तक घरों में घुस आए और मंत्रीजी बोले—“हर घर नल-जल योजना अब पूरी हो चुकी है।” प्रेस कांफ्रेंस में ठंडा पिलाकर सवाल बंद करवाना ही शायद सरकार का असली राहत प्रबंधन है।

गिरने में क्या हर्ज़ है-किताब समीक्षा-प्रभात गोश्वामी

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 15, 2025 Book Review 3

डॉ. मुकेश असीमित का व्यंग्य संग्रह ‘गिरने में क्या हर्ज़ है’ न केवल भाषा की रवानगी दिखाता है, बल्कि विसंगतियों की गहरी पड़ताल भी करता है। समकालीन व्यंग्य की धारा में यह संग्रह एक उम्मीद की रेखा खींचता है।

व्यंग्य चिंतन में मुंगेरीलाल

Prahalad Shrimali Jul 13, 2025 व्यंग रचनाएं 1

मुंगेरीलाल केवल एक चरित्र नहीं, हर आम आदमी की अंतरात्मा है जो कठिन यथार्थ के बीच भी सुनहरे सपने देखता है। वह न पाखंडी है, न अवसरवादी—बल्कि एक ऐसा मासूम है जो बिना किसी प्रचार के देश की खुशहाली का सपना पालता है। उसकी दुनिया रंगीन जरूर है, लेकिन अहिंसक, नेकनीयत और हानिरहित है। ऐसे मुंगेरीलाल देश पर बोझ नहीं, बल्कि भावना के सच्चे वाहक हैं।

आजाद गजल -क्या मिला!

Prahalad Shrimali Jul 10, 2025 गजल 2

प्रह्लाद श्रीमाली की यह रचना हास्य और कटाक्ष के माध्यम से सामाजिक व्यवहारों, ढकोसलों और राजनीतिक विडंबनाओं पर करारा व्यंग्य करती है। 'क्या मिला?' के सवाल के साथ यह रचना हमें अपने ही कर्मों, परंपराओं और सोच पर पुनर्विचार करने को मजबूर करती है।

देव सो रहे हैं और आम आदमी पिट रहा है….? व्यंग्य

Sunil Jain Rahee Jul 8, 2025 व्यंग रचनाएं 5

जब देव सोते हैं तो देश की नींव भी ऊंघने लगती है। जनता, बाबू, साहब और चपरासी सब अपनी-अपनी तरह से नींद का महिमामंडन करते हैं। जागने की ज़िम्मेदारी बस सेना और कुछ अदृश्य प्रहरी निभाते हैं। इस नींद में सत्ता फलती है, और जनहित सो जाता है।

वाह भाई वाह -कविता -हास्य व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 7, 2025 हिंदी कविता 0

सामाजिक विडंबनाओं पर करारा व्यंग्य करती ये कविता ‘वाह भाई वाह’ हमें उन विसंगतियों का एहसास कराती है जहाँ ज़िंदगी त्रासदी बन चुकी है, फिर भी आमजन तमाशबीन बना बैठा है। गड्ढों, महंगाई, रिश्तों की दूरी और शिक्षा की मार के बीच भी मुस्कुराता देश – ‘वाह भाई वाह’!