आप तो बस लिखते रहिए..
“आप लिखते हैं तो लोग आपको क्रांतिकारी समझ लेते हैं—खुद रिमोट बदलने से डरते हैं पर क्रांति की बंदूक आपके कंधे पर रखकर चलाना चाहते हैं। यह व्यंग्य उन लोगों का चश्मा है जो चाहते हैं—बगावत आपकी हो, जोखिम आपका हो… और तमाशा उनका।”
“आप लिखते हैं तो लोग आपको क्रांतिकारी समझ लेते हैं—खुद रिमोट बदलने से डरते हैं पर क्रांति की बंदूक आपके कंधे पर रखकर चलाना चाहते हैं। यह व्यंग्य उन लोगों का चश्मा है जो चाहते हैं—बगावत आपकी हो, जोखिम आपका हो… और तमाशा उनका।”
“कान-भरैयों की दुनिया बड़ी विचित्र है—ये आधा सुनते, चौथाई समझते और बाकी अपनी कल्पना की दही में फेंटकर ऐसी तड़कती-भड़कती कहानी बना देते हैं कि बेचारा सुनने वाला सोचता रह जाए—‘मैंने तो नमस्कार कहा था, इसमें षड्यंत्र कहाँ से आ गया?’ यह व्यंग्य उन्हीं महापुरुषों का महाग्रंथ है।”
सरकारी अस्पताल से बाहर निकलता छेदी लाल सिर्फ़ दवा की कमी से नहीं, टूटी परंपराओं और बदलती नीतियों से भी परेशान है। संधाणा के दिनों से लेकर आरजीएचएस की च्यवनप्राश छूट तक, और अब आयुर्वेदिक दवाओं के कटते नामों से लेकर एलोपैथिक सूची के फैलते आकार तक—उसकी शिकायत में जनता का असली दर्द झलकता है। व्यंग्य का सीधा सवाल यही है कि जब “स्वदेशी” के नाम पर वोट माँगे गए थे, तो देसी दवाओं का गला किस टेबल पर घोंटा जा रहा है?
पश्चिमी साहित्य में ऑस्टेन, स्विफ्ट, ऑरवेल और हक्सले जिस तीक्ष्ण हास्य से समाज और सत्ता की विसंगतियों को खोलते हैं, वहीं हिंदी में परसाई, शरद जोशी और चतुर्वेदी उसी परंपरा को देसी अंदाज़ में आगे बढ़ाते हैं। व्यंग्य भाषा नहीं देखता—वह मनुष्य की आदतों, पाखंड, लालच, दिखावे और सामाजिक मूर्खताओं पर चोट करता है। यही कारण है कि व्यंग्य वैश्विक भी है और गहरे स्थानीय भी।
भरोसीलाल ने चाय के डिस्पोज़ल कप को देखते हुए कहा — “ये चाय है चुनाव और कप है जनता, चुनाव खत्म तो जनता कचरे में!” चुनाव के मौसम में बिजली ओवरटाइम करती है, सड़कें अचानक स्वस्थ हो जाती हैं, और नेता जनता की “कीमत” लगाते हुए मंडी में उतर आते हैं। वोट की कीमत कभी दस हज़ार, कभी तीस हज़ार, तो कभी एक साड़ी और पेय पदार्थ में तय होती है। भरोसीलाल का निष्कर्ष था — “इससे बढ़िया हाट बाजार तो कोई हो ही नहीं सकता!”
मुद्दा कोई साधारण प्राणी नहीं — यह राजनीति की चुहिया है, जिसे वक्त आने पर पिंजरे से निकालकर भीड़ में छोड़ दिया जाता है। झूठे वायदों की हवा और घोषणाओं के पानी से यह फूली-फली जाती है, और फिर चुनाव आते ही इसका खेल शुरू होता है। नेता डुगडुगी बजाते हैं, जनता तालियाँ पीटती है — और “मुद्दा” लोकतंत्र का मुख्य पात्र बनकर सबका मनोरंजन करता है।
कंजूस लोग धन को संग्रह करते हैं, उपभोग नहीं। मगर यह भी कहना होगा कि ये लुटेरों और सूदखोरों से फिर भी भले हैं—क्योंकि कम से कम किसी का लूट नहीं करते, बस खुद को ही नहीं खिलाते। उनका आदर्श वाक्य है — “चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए।” ... जहाँ नेता प्रचार से मशहूर होते हैं, वहाँ कंजूस बिना खर्च के ही चर्चा में रहते हैं। मोहल्ले की चाय की थड़ियों पर उनके नाम के किस्से चलते हैं। ... कहते हैं, ये लोग लंबी उम्र जीते हैं — शायद इसलिए कि ज़िंदगी भी बहुत संभालकर खर्च करते हैं।
सड़कों पर “देवता-तोल” का नया युग — जहाँ खतरनाक मोड़ और पुल नहीं, बल्कि चढ़ावे की रसीदें आपकी जान बचाती (या बिगाड़ती) हैं। सरकार टेंडर दे, देवता ठेका ले — वाह री व्यावसायिक भक्ति!
देशभर में बढ़ते सड़क हादसे अब सिर्फ समाचार नहीं, बल्कि हमारी संवेदनहीन व्यवस्था का आईना हैं। जहाँ नियम पालन करने वाले मरते हैं, और व्यवस्था सिर्फ बयान जारी करती है। ट्रैफिक पुलिस की आँखें खुली हैं — मगर देखती नहीं। जब तक जिम्मेदारी सिर्फ फाइलों में रहेगी, सड़कें श्मशान बनती रहेंगी।
देवराज इंद्र की सभा के बीच अचानक नारद मुनि माइक्रोफोन लेकर प्रकट होते हैं और देवताओं को बताते हैं कि अब असली अमृतकाल मृत्युलोक में चल रहा है—जहाँ मानव ने देवों से भी बड़ी कला सीख ली है, रूप बदलने की। एक ओर देवता नृत्य और सोमरस में मग्न हैं, तो दूसरी ओर मानव मोबाइल कैमरे से लाशों की तस्वीरें खींचकर “मानवता शर्मसार” का ट्रेंड बना रहा है। व्यंग्यपूर्ण संवादों और पौराणिक प्रतीकों के माध्यम से यह रचना बताती है कि जब मानवता ही मर जाए, तो अमरत्व भी व्यर्थ है।