बी.पी.एल. संस्कृति-हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 17, 2026 व्यंग रचनाएं 0

भारत की बी.पी.एल. संस्कृति पर तीखा व्यंग्य—जहाँ लग्ज़री कार वाले भी गरीब हैं और असली गरीब सिस्टम में फंसे हैं। पढ़ें लोकतंत्र की विडंबनाओं पर हास्य-व्यंग्य से भरपूर लेख।

लाइन में खड़े रहने का हुनर: भारतीय जीवन की सबसे बड़ी स्किल पर व्यंग्य

Prem Chand Dwitiya Apr 15, 2026 व्यंग रचनाएं 1

भारतीय समाज में लाइन में लगना एक कला बन चुकी है—गैस सिलेंडर से लेकर ऑनलाइन बुकिंग तक। पढ़िए एक रोचक और तीखा व्यंग्य “लाइन में खड़े रहने का हुनर”।

शर्म आती नहीं हमें — और यह हमारी राष्ट्रीय उपलब्धि है

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 15, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“हमने बेशर्मी को साधना की तरह साध लिया है—और अब जब पड़ोसी देश सुधार की बात करते हैं, तो हमें असुविधा होने लगती है।” यह व्यंग्य न केवल भारतीय राजनीति की विडंबनाओं को उजागर करता है, बल्कि हमारे सामाजिक स्वभाव पर भी तीखा सवाल खड़ा करता है।

रंग बदलने के खतरे को लेकर गिरगिटों की हाई लेवल मीटिंग !

Prem Chand Dwitiya Apr 8, 2026 व्यंग रचनाएं 1

रंग बदलने के पुराने उस्ताद गिरगिट भी आजकल इंसानों की रंगबाज़ी से हैरान हैं। सुरक्षा के लिए रंग बदलने वाले जीव अब अपनी साख बचाने की बैठक कर रहे हैं। व्यंग्य यह है कि बदनाम गिरगिट हैं, मगर रंग बदलने की असली महारत इंसानों ने हासिल कर ली है।

मूर्खोपाख्यानम् : देवलोक सभा में मूर्खता का महातांडव

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 3, 2026 व्यंग रचनाएं 0

देवर्षि नारद इंद्र को बताते हैं कि मृत्युलोक में मूर्खता अब योग्यता, नीति और प्रमोशन का आधार बन चुकी है। बुद्धिमान अल्पसंख्यक हो चुके हैं और प्रश्न करना अपराध माना जाने लगा है। इस व्यंग्यात्मक संवाद में मूर्खता के सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक स्वरूप का तीखा और हास्यपूर्ण चित्रण किया गया है।

नेताजी कर्मदास की कैंची लीला

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 30, 2026 व्यंग रचनाएं 0

नेताजी कर्मदास की राजनीति जनसेवा से नहीं, फीता-कटिंग से संचालित होती है। कैंची उनकी पहचान है और उद्घाटन उनका धर्म। लेकिन जब बाबा धर्मदास ने उनकी जगह ले ली, तो नेताजी के राजनीतिक अस्तित्व पर ही कैंची चल गई।

फागुन में दिलों की कश्तियाँ

Shakoor Anvar Mar 21, 2026 गजल 0

फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं— यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है, और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है— कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?

कदमोपाख्यान : देवसभा में कड़े क़दमों पर कशमकश 

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 16, 2026 व्यंग रचनाएं 0

मृत्युलोक की राजनीति में “कड़े कदम” उठाने की अद्भुत तकनीक विकसित हो चुकी है। हर संकट में घोषणा होती है कि कड़े कदम उठाए जाएंगे—और जनता आश्वस्त हो जाती है। जब इस तकनीक की चर्चा देवलोक पहुँची, तो इंद्रदेव ने नारद मुनि को इसकी तहकीकात के लिए भेजा। उनकी रिपोर्ट सुनकर देवसभा भी सोच में पड़ गई—कहीं यह तकनीक देवलोक को भी मृत्युलोक न बना दे।

राष्ट्रीय गधा पालन योजना

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 12, 2026 व्यंग रचनाएं 0

सरकार की पशुपालन योजना में गाय-भैंस को तो जगह मिल गई, पर गधे को अभी भी पहचान का इंतजार है। गधा गणना में घटती संख्या ने विशेषज्ञों को चौंका दिया है। इस व्यंग्य में गधा संरक्षण, पति पंजीकरण और पड़ोसी देशों की गधाग्राही अर्थव्यवस्था के बहाने समाज और व्यवस्था पर हल्का-फुल्का कटाक्ष किया गया है।