डॉ मुकेश 'असीमित'
Jun 23, 2026
व्यंग रचनाएं
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बरसात में कोचिंग के तहखाने पानी से भर जाते हैं, गर्मी में बंद इमारतें आग का गोला बन जाती हैं और जर्जर स्कूलों की छतें बच्चों के सिर पर गिरती हैं। दुर्घटना के बाद मुआवजा, बयान और जाँच समिति तैयार मिलते हैं—सिर्फ जवाबदेही नहीं मिलती। इसी संवेदनहीन व्यवस्था पर करारा प्रहार है व्यंग्य रचना—“राम, बाहर तो निकल!”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 31, 2026
हिंदी लेख
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आज के दौर में आदमी का मूल्य उसके चरित्र से नहीं, फाइल में लगी डिग्री से तय होता है। डिग्री ज्ञान का प्रमाण कम, सामाजिक प्रतिष्ठा का पासपोर्ट अधिक बन चुकी है—और बेरोज़गारी इस पासपोर्ट पर रोज़ वीज़ा रिजेक्ट कर रही है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 26, 2025
Blogs
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एक और सरकारी छत गिरी, मासूम मरे, सिस्टम फिर बच निकला — जैसे संविधान में इसके लिए छूट हो। सरकार की संवेदना ट्विटर और प्रेस के लिए आरक्षित रही, नतीजे में निलंबन, मुआवजा और मगरमच्छी आँसू मिले। असल सवाल वही रहा — कब तक ढहती छतों के नीचे संवेदनशीलता दफन होती रहेगी और सिस्टम बाल बांका किए बिना बच निकलता रहेगा?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 7, 2025
हिंदी कविता
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सामाजिक विडंबनाओं पर करारा व्यंग्य करती ये कविता ‘वाह भाई वाह’ हमें उन विसंगतियों का एहसास कराती है जहाँ ज़िंदगी त्रासदी बन चुकी है, फिर भी आमजन तमाशबीन बना बैठा है। गड्ढों, महंगाई, रिश्तों की दूरी और शिक्षा की मार के बीच भी मुस्कुराता देश – ‘वाह भाई वाह’!