राम, बाहर तो निकल! | कोचिंग हादसों और सिस्टम की नाकामी पर तीखा व्यंग्य

राम, बाहर तो निकल!

राम, बाहर निकल!
राम, बाहर तो निकल!

ज़्यादा हठ मत कर, मचमच मत कर। झटपट उठ। नल पर पानी भरने की चिंता छोड़—नल में पानी आजकल आता ही कहाँ है! तू बाहर नहीं निकलेगा तो ‘स्वच्छता अभियान’ की तस्वीर में झाड़ू कौन पकड़ेगा?

पकड़ अपनी बाल-पोथी। देख, सूरज चढ़ गया है, स्कूल की घंटी बज गई है। जा, पढ़। पढ़-लिखकर देश का भविष्य बन। और भविष्य बनने से पहले अगर जर्जर छत के नीचे दबकर मर जाए तो घबराना मत—सरकार तुझे “होनहार विद्यार्थी” घोषित कर देगी।

क्या कहा? स्कूल की छत झर-झर करती है? दीवारों में दरारें हैं? डर लगता है?

अरे राम, ऐसे छोटे-मोटे ‘अघट’ से मत डर। इस देश में अघट अब घटना नहीं, व्यवस्था है। छत गिरे, दीवार ढहे, पुल टूटे या सड़क धँसे—ये सब विकास के रास्ते में आने वाले सामान्य विराम-चिह्न हैं।

मौत से क्या डरना? वह तो घर में भी घर कर सकती है। फर्क बस इतना है कि घर में मरेगा तो निजी दुर्घटना कहलाएगी, सरकारी इमारत में मरेगा तो आँकड़ा बनेगा। आँकड़ा बनेगा तो मुआवज़ा मिलेगा, जाँच बैठेगी, बयान आएगा और लोकतंत्र कुछ देर के लिए सक्रिय दिखाई देगा।

राम, तू अभी बच्चा है। देश का भविष्य है। तुझे भविष्य-निर्माताओं के हाथों मरना अधिक शोभा देता है। घर में बेनाम मर जाएगा—भूख से, बीमारी से, गरीबी से या पिता की मजबूरियों के बोझ तले। बाहर निकलेगा तो सम्मानजनक विकल्प उपलब्ध हैं।

सरकार ने तेरे लिए हर मौसम का अलग प्रबंध किया है।

बरसात में कोचिंग के तहखाने तैयार हैं। ऊपर ज्ञान की दुकान, नीचे मौत का जलाशय। पानी सड़क से बहता हुआ बेसमेंट में घुसेगा, बिजली चली जाएगी, दरवाज़ा जाम होगा और बच्चे नोट्स, सपनों और पानी के बीच तैरते रह जाएँगे। बाद में बताया जाएगा कि निकासी व्यवस्था “मानकों के अनुरूप” थी, बस बादल कुछ ज़्यादा अनुशासनहीन हो गए थे।

गर्मी में दूसरा इंतज़ाम है। वही कोचिंग भवन, वही संकरी सीढ़ियाँ, वही बंद खिड़कियाँ, तारों का जाल और एक छोटा-सा शॉर्ट सर्किट। फिर धुआँ, चीखें, भगदड़ और खिड़कियों से छलाँग लगाते बच्चे। जिन कमरों में सफलता की गारंटी लिखी थी, वहीं बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलेगा।

सर्दी में धुँध है, सड़क हादसे हैं। गर्मी में आग है। बारिश में तहखाने हैं। बसंत में भीड़ है, चुनावी रैलियाँ हैं। त्योहारों में भगदड़ है। यानी ऋतुएँ बदलती हैं, मगर तेरे मरने का सरकारी पाठ्यक्रम नहीं बदलता।

राम, व्यवस्था ने तेरे लिए बारहमासी मृत्यु-योजना चला रखी है।

देख, हमने सरकारी भवन भी कितने कलात्मक बनाए हैं—जर्जर दीवारें, उखड़ा पलस्तर, लीक करती छतें, टेढ़े खंभे और चौड़ी होती दरारें। लगता है जैसे सिस्टम ने अपनी आत्मा की अमूर्त पेंटिंग इन दीवारों पर बना दी हो।

मत चल इतना संभलकर। कुछ सहयोग तू भी कर। सामने गड्ढे हैं—गिरकर मर। सड़क पर पानी भरा है—फिसलकर मर। पुल पर दरार है—विश्वास के साथ पार कर और मर। बिजली का खंभा झूलते तारों सहित तुझे गले लगाने को तत्पर है।

दरवाज़े पर दंगे हैं, गली में गुंडे हैं, सड़क पर रैलियाँ हैं, धर्मस्थल पर भीड़ है, सत्संग में भगदड़ है, पहाड़ दरक रहे हैं, नदियाँ उफन रही हैं और ट्रैफिक मतवाले हाथी की तरह दौड़ रहा है। बलात्कार, हत्या, आगजनी, लूटमार—लोकतंत्र के सारे विभाग तेरी सेवा में चौबीस घंटे खुले हैं।

बस तू बाहर तो निकल!

बसें खाई में गिर सकती हैं। ट्रेनें पटरी से उतर सकती हैं। नावें पलट सकती हैं। अस्पताल में ऑक्सीजन खत्म हो सकती है। एम्बुलेंस रास्ते में अटक सकती है। हवाई जहाज़ तक गिर रहे हैं, लेकिन राम, तेरी औक़ात कहाँ इतनी हाई-प्रोफाइल मौत की! तेरे लिए ज़मीनी और किफ़ायती व्यवस्थाएँ पर्याप्त हैं।

तू बड़ा ज़िद्दी है। घर में क्यों पड़ा रहता है? देख, मौत कैसे पलक-पाँवड़े बिछाए बैठी है। सिस्टम ने तेरी हड्डी-पसली एक करने के लिए पूरा बुनियादी ढाँचा तैयार किया है। तू उसका लाभ ही नहीं उठा रहा।

क्या कहा—श्याम भी तो बाहर नहीं जा रहा, मैं क्यों जाऊँ?

राम, श्याम की चिंता मत कर। उसका बंदोबस्त घर पर ही है। मौत अब ‘डोरस्टेप डिलीवरी’ में विश्वास रखती है। कभी सिलेंडर फटेगा, कभी छत गिरेगी, कभी नाला उफनेगा, कभी कोई बेलगाम वाहन घर में घुस आएगा। प्रशासन कब से तेरी खबर लेने पर तुला है। तू अख़बार पढ़ने की चिंता मत कर—एक दिन तू स्वयं अख़बार बन जाएगा।

“कोचिंग के तहखाने में तीन छात्र डूबे।”

“शॉर्ट सर्किट से भवन में आग, कई बच्चे फँसे।”

“जर्जर छत गिरने से मासूम की मौत।”

तेरा नाम छोटा होगा, तस्वीर धुँधली होगी, मगर नेताओं के बयान बड़े और साफ़ छपेंगे।

एक तू ही है जो सिस्टम पर विश्वास नहीं करता। हमने अस्पतालों में भी पूरा इंतज़ाम कर रखा है कि राम आसानी से बच न पाए। कहीं डॉक्टर नहीं, कहीं दवा नहीं, कहीं बेड नहीं, कहीं मशीन खराब, कहीं इलाज से पहले जमा राशि ज़रूरी। तू यदि इन सबके बाद भी बच गया तो सचमुच प्रशासन की क्षमता पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।

पता नहीं यह राम कितना जीवट वाला है—मरता ही नहीं! बस जीने के लिए मरा जा रहा है।

यही तो सिस्टम की टेंशन है। तू बच गया तो योजनाओं का क्या होगा? मुआवज़ा किसे बाँटेंगे? न्यूज़ चैनलों की टीआरपी कैसे बढ़ेगी? विपक्ष को मुद्दा कहाँ से मिलेगा? सत्ता को संवेदना जताने का अवसर कैसे मिलेगा?

राम, थोड़ा दूसरों के बारे में भी सोच। इतना स्वार्थी मत बन।

तेरा मरना सिस्टम की मृत आत्मा के लिए सीपीआर जैसा है। किसी दुर्घटना के बाद दो-चार घंटे के लिए सिस्टम में साँसें लौटती हैं। मंत्री दौरा करते हैं। अधिकारी निलंबित होते हैं। हेल्पलाइन नंबर जारी होते हैं। मोमबत्तियाँ जलती हैं। जाँच समिति बनती है। फिर सिस्टम स्वस्थ घोषित होकर अगली दुर्घटना की प्रतीक्षा करने लगता है।

देख, कितनी मुस्तैदी से बुलडोज़र सबूतों का मलबा हटा रहे हैं। कितनी तेजी से प्रशासन जिम्मेदारी को विभागों के बीच स्थानांतरित कर रहा है। भवन मालिक कहेगा—अनुमति मिली थी। विभाग कहेगा—कागज़ अधूरे थे। नगर निकाय कहेगा—नोटिस दिया था। कोचिंग संचालक कहेगा—बारिश असामान्य थी। बिजली विभाग कहेगा—आग हमारी वजह से नहीं लगी।

और अंत में दुर्घटना स्वयं दोषी पाई जाएगी।

सिस्टम संवेदनाओं की फैशन परेड भी करेगा। कोई अस्पताल पहुँचेगा, कोई घर जाकर कंधे पर हाथ रखेगा, कोई कैमरे के सामने कहेगा—“दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।”

राम, यह वाक्य सुनते ही समझ लेना कि दोषी अब लगभग सुरक्षित है।

बस बाहर तो निकल! वोट देने निकल, रैली में भीड़ बढ़ाने निकल, धरना देने निकल, फीस भरने निकल, फॉर्म भरने निकल, प्रमाणपत्र बनवाने निकल। छत पर, छज्जे पर, गली में, कूचे में—कम से कम खिड़की से मुंडी ही निकाल दे, ताकि सिस्टम को प्रमाण मिल सके कि तू अभी जीवित है और अगली योजना का पात्र है।

भीतर मत रह। तेरी निष्क्रियता लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। सिस्टम में भागीदारी न करने के आरोप में तुझ पर कोई धारा लग सकती है।

राम, तेरी भलाई इसी में है कि तू साँस ले, कर भर, वोट दे और चुप रह। सवाल मत पूछ। रास्ता मत माँग। सुरक्षा मत माँग। जवाबदेही तो बिल्कुल मत माँग।

जैसा सिस्टम कहे, वैसा कर।

बरसात में तहखाने में उतर।
गर्मी में बंद इमारत में चढ़।
जर्जर छत के नीचे पढ़।
टूटे पुल पर चल।
खुले तारों के बीच से निकल।

क्योंकि तेरे मरने का इंतज़ाम सरकार ने किसी एक मौसम के भरोसे नहीं छोड़ा है।

राम, बाहर तो निकल!

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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