व्यंग्य की बाराखड़ी : समय, संवेदना और सच की वर्णमाला

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 5, 2026 Book Review 0

‘बाराखड़ी’ केवल व्यंग्य-रचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय की नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों की वर्णमाला है। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी अपने तीखे लेकिन संतुलित व्यंग्य के माध्यम से पाठक को हँसाते नहीं, बल्कि सोचने को विवश करते हैं। इस समीक्षा में ‘लड़की का बाप’, ‘घोटालाटूर’, ‘खाली देगची और भूखी पंगत’, ‘गरीबी हटेगी’, ‘पहचान हो तो ठीक रहता है’ जैसी रचनाओं के चयनित उद्धरणों के सहारे यह दिखाने का प्रयास है कि कैसे लेखक हास्य को साधन बनाकर गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाते हैं। यह संग्रह पाठकों के साथ-साथ व्यंग्यकारों के लिए भी एक पाठशाला की तरह है, जहाँ शिल्प, संवेदना और सरोकार का संतुलन सीखने को मिलता है। ‘बाराखड़ी’ आज के समय को समझने के लिए एक अनिवार्य व्यंग्य-पाठ है।

रिश्तों की गाड़ी और दो करोड़ की एक्सेसरीज़

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 4, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज रिश्ते तय नहीं होते, डेमो दिए जाते हैं। बायोडाटा अब परिचय नहीं, प्रोडक्ट कैटलॉग है—जिसमें माइलेज, एसेट्स और फ्री एक्सेसरीज़ गिनाई जाती हैं। सवाल बस इतना है: क्या संस्कार भी EMI पर मिलते हैं?

गुमनाम हूं ,लेकिन ,नाम वाला, हो जाऊं तो रिश्ते निकाल लेना!

Prem Chand Dwitiya Feb 4, 2026 व्यंग रचनाएं 1

पद्म पुरस्कारों की सूची ने एक बार फिर साबित किया कि नाम पहले नहीं, काम पहले आता है। जो लोग जिंदगी भर गुमनाम रहकर समाज की सफाई, शिक्षा, पर्यावरण और संवेदना की नींव मजबूत करते रहे—वही एक दिन नाम बन गए। असल में नाम कोई पदक नहीं, वह गुमनामी से निकलकर कर्मों की पहचान बन जाता है।

मेरा नाम करेगा रोशन

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 21, 2026 व्यंग रचनाएं 0

बेटा पैदा करने की ज़िद में परिवार ने इतिहास नहीं, मानसिकता की केस-स्टडी लिख दी। नौ बेटियाँ जैसे प्राकृतिक आपदा और बेटा जैसे एनडीआरएफ की टीम। ‘काफ़ी’ और ‘माफ़ी’ बेटियों के नाम नहीं, समाज के लिए छोड़े गए मूक नोट्स हैं। समाज आज भी प्रसव-कक्ष के बाहर खड़ा पूछ रहा है—“लड़का हुआ या फिर…?”

लिखा के लाए हैं…

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 16, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“जो लिखा है, वही होगा—बाक़ी सब तर्क अतिरिक्त हैं।” “किस्मत ने परमानेंट मार्कर से लिखा है साहब।” “इंसान से सहमति नहीं ली गई, फिर भी संविधान लागू है।” “कुछ लोग फूल लिखाकर लाए, कुछ काँटे समेटते रह गए।”

पंचतत्व पैकेज : आत्मा की शिकायत पेटी से

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 14, 2026 व्यंग रचनाएं 0

मरना तय था, यह हम मान चुके थे— पर किस तत्व से मरना है, यह विकल्प भी अस्पताल तय करेगा, यह हमें बताया नहीं गया। पहले आग, अब पानी… लगता है अस्पताल पंचतत्व को सीरियल-वाइज टेस्ट कर रहा है।

कागजों में मरण-

Ram Kumar Joshi Jan 9, 2026 व्यंग रचनाएं 1

मेरा बाप घर में मर गया, पर बाबूजी की फ़ाइल में अभी ज़िंदा है। बिन पैसे के यहाँ कोई मरता नहीं— यहाँ मौत भी सरकारी प्रक्रिया है।