तीर चल दिया मां — इस बार तुक्का नहीं था

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 13, 2026 व्यंग रचनाएं 0

एक साधारण-सी घटना—तीर चलाना—कैसे समाज में असाधारण प्रतिक्रियाओं का कारण बन जाती है, यह व्यंग्य उसी मानसिकता की पड़ताल करता है, जहां व्यक्ति से ज्यादा उसकी छवि और उस पर होने वाली प्रतिक्रियाएं मायने रखती हैं।

रंग बदलने के खतरे को लेकर गिरगिटों की हाई लेवल मीटिंग !

Prem Chand Dwitiya Apr 8, 2026 व्यंग रचनाएं 1

रंग बदलने के पुराने उस्ताद गिरगिट भी आजकल इंसानों की रंगबाज़ी से हैरान हैं। सुरक्षा के लिए रंग बदलने वाले जीव अब अपनी साख बचाने की बैठक कर रहे हैं। व्यंग्य यह है कि बदनाम गिरगिट हैं, मगर रंग बदलने की असली महारत इंसानों ने हासिल कर ली है।

प्रेम पत्र में घोस्ट राइटिंग

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 5, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“मैं उस दौर का अनाम प्रेमाचार्य था, जिसने प्रेम के सर्वहारा वर्ग के लिए जनहित याचिका की तरह प्रेमपत्र लिखे—निःशुल्क, निस्वार्थ और निस्संग।” “बिना शायरी के प्रेमपत्र ऐसा ही होता जैसे दाल बिना तड़के।” “एक ही प्रेमिका के लिए लिखते-लिखते हम भी ऊब गए—पर प्रेमियों के दिलों में आग बराबर जलती रही।”

झूठ का मेगा मॉल

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 31, 2026 व्यंग रचनाएं 0

जब झूठ ने मार्केटिंग का चोला पहन लिया, तो सच आउटडेटेड घोषित कर दिया गया। “झूठ महा-सेल” में हर वर्ग के ग्राहक उमड़े—नेता, एंकर, धर्मगुरु, कोचिंग संचालक—सब अपने-अपने झूठ के पैकेट खरीदते दिखे। इसी भीड़ में एक बूढ़ा आदमी सच खोजता रह गया…

नेताजी कर्मदास की कैंची लीला

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 30, 2026 व्यंग रचनाएं 0

नेताजी कर्मदास की राजनीति जनसेवा से नहीं, फीता-कटिंग से संचालित होती है। कैंची उनकी पहचान है और उद्घाटन उनका धर्म। लेकिन जब बाबा धर्मदास ने उनकी जगह ले ली, तो नेताजी के राजनीतिक अस्तित्व पर ही कैंची चल गई।

भगवान बचाए ऐसे रिश्तेदारों से!

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 28, 2026 व्यंग रचनाएं 0

बीमारी से ज्यादा थका देने वाला होता है रिश्तेदारों का हाल-चाल महाकुंभ—जहाँ हर कोई डॉक्टर भी है, जज भी और जांच अधिकारी भी।

मक्खनमहापुराण-चापलूस्योपनिषद् का उत्तर आधुनिक खंड

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 26, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“मक्खनमहापुराण” चापलूस्योपनिषद् का उत्तर-आधुनिक संस्करण है, जहाँ प्रशंसा और चाटुकारिता के बीच की महीन रेखा पर तीखा व्यंग्य किया गया है। यह रचना दिखाती है कि कैसे ‘मक्खनयोग’ आज के दफ्तर, साहित्य, राजनीति और सामाजिक जीवन का अनिवार्य शास्त्र बन चुका है—जहाँ योग्यता से ज्यादा ‘लोचदार जीभ’ और सही समय पर किया गया लेपन ही सफलता की असली कुंजी है।

मंचीय कवि सम्मेलन की मच मच

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 26, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज का मंचीय कवि सम्मेलन कविता का नहीं, प्रदर्शन का उत्सव बन गया है—जहाँ कविता घूंघट में सिमटी रहती है और चुटकुले, अभिनय और जुगाड़ का नाच चलता रहता है।

नाम में क्या रखा है? — बहुत कुछ रखा है

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 17, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“आजकल आपका नाम वो नहीं होता जो माता-पिता ने रखा था, बल्कि वो होता है जो किसी अज्ञात व्यक्ति ने अपने मोबाइल में सेव कर रखा है… और तभी आप डॉक्टर से सीधे ‘HD Wallpaper’ बन जाते हैं।”

राष्ट्रीय गधा पालन योजना

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 12, 2026 व्यंग रचनाएं 0

सरकार की पशुपालन योजना में गाय-भैंस को तो जगह मिल गई, पर गधे को अभी भी पहचान का इंतजार है। गधा गणना में घटती संख्या ने विशेषज्ञों को चौंका दिया है। इस व्यंग्य में गधा संरक्षण, पति पंजीकरण और पड़ोसी देशों की गधाग्राही अर्थव्यवस्था के बहाने समाज और व्यवस्था पर हल्का-फुल्का कटाक्ष किया गया है।