अफसरों सेवा धर्म
डा राम कुमार जोशी
वैसे नई दिल्ली की अनौपचारिक ट्रेनिंग में सबको स्पष्ट सलाह दी गई थी कि -हे भविष्य के राजा बाबूओं – आप जब भी फील्ड पोस्टिंग में रहे तो ज्यादा हाथ पांव मारने की आवश्यकता नहीं, खायें पर धीरे धीरे, ठंडा कर के। याद रखे आपके चारों तरफ जासूसों का जाल रहता है आपकी हर एक्टिविटी की खबर सरपंच से लेकर सीएमओ तक पहुंचती ही है । आपका रिपोर्ट कार्ड बनता है जिससे आपके भविष्य का निर्धारण होता है। ख़्याल रहें। शुभकामनाएं।
ट्रेनिंग की इन हिदायतों का पालन करना तो दूर उल्टे स्वयं को राजा समझ हुकुम चलाते प्रकृति का नियम भूल जाते हैं कि सेर को सवा सेर मिलता ही है।
हुआ यह कि हमारे एक जिला कलेक्टर साहब के पीए बाबू रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए और हाथ धुलाते रंग कुछ ज्यादा ही उतर आया। रकम ज्यादा थी।
सरपंच जी विरोधी पार्टी के थे और कलेक्टर जी काम के बदले रिजर्व बैंक के सिवाय किसी सिफारिश को मानते नहीं थे। अन्दर खाने सरपंच ने प्लान बनाया और कलेक्टर साहब के प्रतिनिधि पीए बाबू रुपये लेते धर लिए गये।
अखबारों समेत सभी मीडिया में समाचार साया हो गया। रिश्वत की राशि लाख रुपए से अधिक थी। वृद्ध पीए की औकात कुछ अधिक नहीं थी सो वर्दीधारीयों द्वारा पकड़ते,धमकाते ही उनका बीपी हाई होगया। सो हड़बड़ाहट में सच्चाई उगल गये – वर्दीधारी भैया जी! ये तो कुछ नहीं है कल रात ही चालीस लाख रुपए बंगले पर मेम साहब को दे आया हूं। मुझे छोड़ दो। मैंने आपका क्या बिगाड़ा है? हम तो हुकुम के गुलाम हैं। आदेश की पालना की है।
फिर रुककर बोले- “हम मातहत केवल सुनते हैं पर कहते कभी कुछ नहीं हैं। चुप रहने के कारण हमें इनके लिए भ्रष्ट होना पड़ता है। हम बाबू तो कुएं और खाई के बीच चलतें है। आज गिरें या कल।”
वर्दीधारी डिप्टी ने तुरन्त भ्रष्टवाड़ा निरोधक एसपी से बात की और चालीस लाख से लेकर सब नकुछ सच्चाई उगल दी। बात जिला कलेक्टर के बंगले की तलाशी पर अटक गई। कलेक्टर बंगले की तलाशी मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसी होगी। मूंछों वाला अधेड़ डिप्टी पसीने से तर था। साहब की सेल्युट से सीधे ही हथकड़ी की यात्रा कैसे करानी होंगी?
एसपी साहब ने पूछा कि कलेक्टर कौन है और नाम ज्ञात होते ही एसपी खिल पड़ा।
“अरे तुरंत छापा मारों। इसके आगे पीछे कोई नहीं है। कोई घबराने की जरूरत नहीं। स्साला ट्रेनिंग में हमारे साथ था। अकेला ही सारी दारु पी जाता था। बड़ा काइयां किस्म का अधिकारी है। साथ की ट्रेनी लड़कियां को पटाने में बड़ा उस्ताद था। रोमियो बना फिरता था। केस बनेगा तभी तो स्साला डब्ल्यू बन के नाचेगा। जाइये और मुखबिरों गवाहों को साथ रख तलाशी लीजिए। मैंने आपकी वार्ता रिकार्ड कर रखी है। ध्यान रहे। अब पीछे हटोगे तो मरोगे।” यह सब कहते एसपी साहब ने फोन काट दिया।
आखिर बड़ी जद्दोजहद के बाद जिला कलेक्टर बंगले की तलाशी हुई, अनगिनत नोटों के बंडल मिले। गिनने केलिए मशीनें मंगवानी पड़ी। गड्डियों में कुछ नोट नक़ली भी निकलें। बंगले के चपरासी सामूहिक रूप से रो रहें थे। एक दबी जुबान से कह रहा था – मेरी बेटी की शादी में मेमसाब ने लिफाफा तक नहीं दिया। इसमें से कुछ उधार ही दे देते तो किसी के काम तो आते। पुण्य भी मिलता। अब ये किस खजाने में जायेंगे। संतों- रूपये की गति न्यारी।
पीए बाबू के यहां भी तलाशी हुई थी पर मिला कुछ नहीं। रंगे हाथों पकड़े जाने की खबर लीक हो पीए बाबू के घर तक पहुंच गईं थीं। हाथों हाथ उनकी बड़ी बुआ सब बटोर कर ले गई थी। अब बुआजी से वापस उनको मिलेगा या नहीं ये तो भविष्य का प्रश्न होगा पर आज पुलिस तलाशी में कुछ भी नहीं मिला। केस कमजोर होने का प्रथम संकेत था।
दिन ख़राब आते हैं तो लटकी रस्सी भी सांप बन डराती है। उधर विशेष लाभान्वितों की टीम गिरफ्तारी के डर से तुरंत अंडर ग्राउंड हो गयी और शेष बचा कलेक्ट्रेट पीठ पीछे हंस रहा था।
उधर जिला कलेक्टर साहब का अफ़सरी वाला भ्रम टूट गया। वे अपने बंगले को अन एकांउटेड काली पूंजी रखने केलिए सुरक्षित क़िला मानते थे। आज महसूस हो रहा था कि आइएएस के बजाय आइपीएस ज्यादा तगड़ा होता है। अंग्रेज़ी टाइम में यही होता था। कलेक्टर तो बड़े खचान्जी होते थे जो लगान इकठ्ठा करते थे। पुलिस कप्तान के ठाठ होते थे।
पीए बाबू की गिरफ्तारी के साथ साहब को भी हथकड़ी लग गयी। कुछ साहबभीरु लाभान्वित कह रहे थे- लो जी कैसा राज आया। कलेक्टर भी बाबूओं के साथ जेल में रहेंगे। गिरफ्तारी कागजों में दिखा देते। कलेक्टर राजा होता है राजा। अब उसे जेल की फर्श पर सोना पड़ेगा और चड्डी बनियान तक खुद धोने पड़ेंगे। ये तो अन्याय ही होगा। भाग्य क्या क्या करवा रहा है। हे भगवान! ऐसे दिन किसी अफसर को न दिखाएं!
बिचारे पीए के रोते रोते आंखें सूज गयी। अब पेंशन भी नहीं मिलेगी। घर तो बना लिया था पर बेटी की शादी बाकी थी और लड़का तीन सालों से बेकार डोलता फिरता था। बुढ़ापे का सहारा ही लंगड़ा हो तो किसे कहें?
बेईमानी के साथ ईमानदारी का मेल केवल भ्रष्टाचारियों में ही पाया जाता है। पक्का एक बटा छः भाग ही मिलता था। उपरी कमाई तो थी पर इसमें ईमानदारी से सबके हिस्से कटते थे। तहसीलदार से लेकर ऊपर के सभी अफसरों की हाजरी में बंट जाता था।
घर में कुछ जमा तो थे पर ज्यादा पूंजी नहीं थी। बेटे बेटियों के खुले हाथ अब दुःख का कारण बन जायेंगे। जेल जाने से “कुछ जमा” तो शीघ्र ही समाप्त हो जायेगा, परिवार कहीं सडक पर न आ जाय, पीए बाबू को यही डर खायें जा रहा था।
अब उधार भी कौन देगा? हम बाबू लोग अपने परिवार को छोड़ रात-दिन किनके लिए खटते मरते हैं? इन अफसरों केलिए!
बयान लिखवाने केलिए कैमरों की निगरानी में दोनों कोतवाली में लायें गये। कलेक्टर समेत पीए को गाड़ी में पीछे सीट पर बैठना पड़ा। पास में बैठें कांस्टेबल के कपड़ों से पसीने की बदबू आ रही थी। पहले पीए बाबू के बयान लिखे गये। फिर डिप्टी ने साहब के बयान लिए। अंदर से खबर आई थी साहब ने कुछ नहीं बोला और बयानों पर हस्ताक्षर भी नहीं किए। मुए कैमरों ने सारा खेल बिगाड़ रखा है।
तरह तरह की सलाह दी जा रही थी।सहानुभूति वालों के आइडिया अनुसार “रात में सोने केलिए बंगले पर चले जाय, सुबह मुंह अंधेरे वापस जाय।”
बिचारी मैडम जी अकेली कैसे सोयेगी! अभी तो उम्र भी कोई ज्यादा नहीं है। मरे पत्रकार सब मोबाइल कैमरे लेकर बैठे हैं। कुछ करना भी हाथ नहीं।
हां- खाना घर से आगया था पर कौर भरते ही ऊबकाई सी आगयी। नमक बहुत था।खबर थी कि जेल के डर से बंगले के सारे चपरासी भाग गये। खाना मैडम ने ही बना के भेजा था।
साहब केलिए सोने की तैयारियां क्या करें, अर्दली ने एक बदबू दार कम्बल बिछाने के लिए और एक चादर जाली वाले भारी भरकम गेट को बिना खोले अदब के साथ रख दिए थे। चुपके से ठंडे पानी की बोतलें रखी गयी। इतने में दोनों के घर से ज़रुरी सामान आ गया। साहब को दो पेग की आदत थी। थाने के डिप्टी ने सभी पत्रकारों को हाथ जोड़ विनती कर घर भेज दिया।
रात्रि में डाक्टरी जांच के लिए का बहाना रच पीए समेत कलेक्टर साहब को हॉस्पीटल लेजाया गया। बड़ा डाक्टर बड़ा ईमानदार निकला पर्ची में साफ-साफ दिख दिया कि छप्पन वर्षीय पीए हार्ट पेशेंट है सो भर्ती किया जा सकता है पर कलेक्टर अभी जवान है और स्वस्थ हैं। इनके लिए यहां भर्ती की कोई गुंजाइश नहीं है। जहां से लाये गये है वहीं रखें। भाग्य ख़राब हो तो गली का कुत्ते भी भौं भौं करते हैं।
विशेष लाभान्वितों की चिंता थी कि साहब की आज रात कैसे कटेगी?
रातके एक बजे थाने के सभी कैमरे आफ किये गये, डिप्टी के एसी वाले कमरे में खाट लगाई गयी। सफाई कर्मी को रात में बुला टायलेट की विशेष धुलाई करवाई गयी। पसंदीदा खूशबू वाली रुम फ्रेशनर की बट्टियां रखी गयी। बस एक ही उद्देश्य था कि कैसे भी हो रात कट जाय।
उधर किसी वकील का अखबारनवीसों को दिया बयान वायरल हो गया। उसमें आरोप था कि कलेक्टर के साथ उनकी पत्नी भी रिश्वत लेने के अपराध में शामिल होने के कारण गिरफ्तार होनी चाहिए थी। यह पढ़ते ही मैडम जी एकबारगी सुन्न सी पड़ गई।उनका सोचना था कि हमें क्या पता कि ये रिश्वत की राशि है या पसीने की। हमारा काम घर संभालना होता है और यही कर रहे हैं। जो करे वो भुगतें।
उन्होंने तो जेल तो क्या कभी थाना तक नहीं देखा था।
जैसे ही मैडम ने ये बयान पढ़ा तो तुरंत ड्राइवर को कॉल किया पर वो ढीढ बन आया ही नहीं। आखिर मैडम ने अपने स्त्री धन वाले गहने और थोड़ी बहुत नकदी जो जब्त नहीं हो पाई थी, को बैग में भर के कार से भाग चलीं। विधवा सासू मां तक को नहीं बताया कि कहां जा रही है? मोबाइल को भी स्वीच ऑफ कर दिया। जेल का भय बहुत कुछ करवा रहा था। यही भय पहले आ जाता तो ये सब घटित ही नहीं होता। लोग वाह-वाह करते होते पर अब वो ही थू थू कर रहे हैं।
आखिर किसी तरह सुबह हो गयी। मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए गए। पुरजोर मांग के विरुद्ध जमानत रिजेक्ट होगई। करोड़ से अधिक की रिश्वत किसने दी, क्यों दी, कब दी, सब कुछ ज्ञात करना शेष था। तीन दिन पुलिस रिमांड, थाने की कस्टडी।
इधर थानाप्रभारी ने गैर प्रशासनिक घोषणा कर दी कि आगामी तीन दिनों तक किसी को गिरफ्तार नही करें जब-तक कि अतिआवश्यक न हो। कैदी कक्ष में कलेक्टर के साथ जेबकतरे थोड़ी ही रख सकते हैं।
कलेक्टर की गिरफ्तारी थाने केलिए बोझा बन गयी थी।
इधर भ्रष्टाचार निरोधक एसपी ने आरोपी कलेक्टर की उपस्थिति में बंगले के बेड रूम की तलाशी ली जिसमें कुछ हिसाब-किताब वाली डायरियां, विदेशी दारू और अश्लील फोटो युक्त पठन सामग्री मिल गईं। बेड रूम सील कर दिया गया। कुछ और भी कानूनी धाराएं फिट हो गई।
मां आईएएस बेटे को गले लगा बड़ी देर तक रोती रही। अब रोना ही शेष बचा था। तीर हाथ से निकल चुका था।
राजधानी से लेकर गली गली चर्चा छा गई।
एक आईएएस के क्या भूख आई थी जो इतने रुपये खाने पड़े। अब क्या होगा, ज़िन्दगी जेल में ही बीतेगी। सब चटकारे लेले के कहानियां कह सुन रहे थे। सुना था कि पिछले साल हुई शादी में पांच करोड़ का दहेज़ मिला था। वो कहां रखा होगा?
नोटों की गिनती वाला कह रहा था सारे नोट नये थे।
विरोधी पार्टी वाले इसका श्रेय लेने के लिए तत्पर थे पर सरपंच अंडर ग्राउंड होगया था।उसको डर था कि भविष्य में सभी सरकारी अधिकारी दुश्मन हो जायेंगे। इसलिए भीचू मीचू हो पीछे हट रहा था। बडेरे कह गये थे अफसर माटी का बहुत होता है। ये तो आइएएस है। सप्लाई- ठेके सब बंद। धंधा कैसे करेंगे? सांप के बिल में हाथ तो डाल दिया, अब मरे या बचें! बचें तो कैसे?
देश में समाज वादी विचार गहरे होने के कारण छोटे बड़े सभी यूनियन बाजी में विश्वास करते हैं। आनन फानन में कलेक्टर यूनियन बन गई। ब्रह्मचर्य से लेकर संन्यास आश्रम में जीने वाले आइएएस कुलबुला कर फ्रंट फुट पर आ गये। समाज पर लगा कलंक जो धोना था।
राजधानी में सरकार के सलाहकारों ने भी गोपनीय सलाह दी कि आगे कार्रवाई से सारा तंत्र ध्वस्त हो सकता है। बहुत बड़ा टर्मोइल क्रियेट हो जायेगा। किसी बहाने से पीछे हटने में ही श्रेय है।
उधर प्रेस कान्फ्रेंस में आइएएस अफसरों के खिलाफ षड्यंत्र करने के आरोप लगाये गये। गृहमंत्री को दिये जाने वाले ज्ञापन की प्रति भी वितरित की गई।
अपुष्ट सूत्रों से खबर मिली कि बड़े मंत्री महोदय को धमकी भरे स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि यदि इस केस को ज़ारी रखा तो हमारे लोग आपको जो बोरे भर-भरकर राशि सौंपते हैं वह अब बन्द हो जायेगी। आपके और हमारे रास्ते अलग हो जायेंगे। सोच लें हमारे बिना न तो सरकार चल सकतीं है और न आपकी पार्टी। हम हैं तो आप है।
बड़े मंत्री जी ने सभी तरह से सहायता देने का वादा किया। हाथों हाथ फोन की घंटियां बज उठी। भ्रष्ट वाड़ा विभाग में बड़े ट्रांसफर परिवर्तन हुए। सभी को मौखिक हिदायतों से बांध दिया। भविष्य में छापें पटवारी, बाबू और सहायक श्रेणी के कर्मचारियों तक ही सीमित रखें जावें। कहा गया कि आइएएस अधिकारी सरकार के हाथ होते हैं, इनकी इज्जत राष्ट्रीय इज्जत के समकक्ष है।
इस केस में स्पेशल आदेश जारी किए जाते हैं कि समस्त कागजात गृह मंत्रालय को आज ही प्रेषित कर अग्रिम आदेश की प्रतीक्षा की जाय। तत्पश्चात ही जिला स्तर पर कार्यवाही होगी।
इसके साथ ही एडीशनल कलेक्टर को आदेश दिए जाते हैं कि जिला कलेक्टर जो आरोपी हैं परन्तु आरोपी न मानते हुए ससम्मान राजधानी पहुंचाने की व्यवस्था करें।
लोग ठीक कहते हैं नई बात नौ दिन, खेंचे ताणे तेरह दिन। जनता की स्मृति बहुत कम होती है। घटनाएं भूलने के लिए होती है। थानाधिकारी ने केस डायरी में एक लाइन लिख भरपाई कर दी कि राज्य सरकार से अनुमति प्राप्ति पश्चात कार्यवाही की जावेगी।
वर्षों बीत गये सरकारें आती रही, जाती रही पर कलेक्टर बंगले की छापेमारी वाली कीमिया फाइल पता नहीं किस कब्रिस्तान में दफन हुईं कोई नहीं बता सकता। चाय ढाबों पर कभी-कभी नकदी ज़ब्ती का जिक्र जरूर होता था। “आजकल सब खाते हैं” कहकर विषय का पटाक्षेप हो जाता है।
इतना जरूर हुआ कि फिर कभी किसी कलेक्टर के बंगले पर छापा नहीं पड़ा और उस दुर्घटना के बाद सभी नवोदित आइएएस अधिकारियों को प्रोटेक्शन दिया गया और स्वत: ही ईमानदारी के सर्टिफिकेट जारी होते रहे।
इधर पीए बाबू बिचारे जेल में ही मर गये। उनकी जमानत का भी प्रबंध हो नहीं पाया था। सारा दोष उनके अनुभवी कंधों पर रखा गया। किसी को तो भेड़ बन कटना ही था।
बाबू जात बनीं ही इसलिए है।
उन्होंने वैसे भी सारा नौकरी जीवन जी लिया था। जेल में रहे या बाहर, क्या फर्क पड़ता है?
हा- उनका परिवार सड़क पर जरुर आगया था। कलंकित बाप की लड़की आजतक बिनब्याही ही रहीं, मां की सेवा से पुण्य अर्जित कर रही है और लड़का शराबी होगया। लेकिन पीए बाबू ने जेल में भी उफ नहीं की। “अफसरों- सेवा धर्म” इसी को अपना प्रारब्ध मान लिया था।
जेल का पटेदार पजामा पहने गाते हुए कहते थे –
रिश्वत बटोरे बाबूजी, बांटे सबको समान
पकड्यौ जाय सजा मिले, भुगतें अपने नाम।
या -“परमार्थ के कारणें बाबू धरयो सरीर “
आजाद भारत में सभी कामगारों की यूनियन बड़ी सफलता पूर्वक कार्य करती रही है पर बाबू जात कभी एक नहीं हो पाई। बिचारे पीए बाबू को अफसरों की श्रृद्धांजलि नसीब हुई नहीं। भाग्य का खेल है। कुछ लोग इस धरती पर चुकाने केलिए आते हैं बाबू उसी का नाम है।
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डॉ मुकेश 'असीमित'
31 minutes ago“रिश्वत सबने खाई…
पर सजा सिर्फ बाबू को मिली।”
#Corruption #Satire #HindiVyangya