सुबह का समय था। शर्मा जी बालकनी में बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। चाय सामने रखी थी और जीवन में वैसी ही शांति पसरी हुई थी, जैसी किसी रिटायर्ड आदमी के चेहरे पर तब दिखाई देती है, जब घर में पत्नी न हो और मोबाइल में कोई मिस्ड कॉल न हो। तभी उनकी नज़र अख़बार के एक विज्ञापन पर अटक गई। विज्ञापन कुछ ऐसा था कि चश्मा नाक से फिसल गया और शर्मा जी की आत्मा तक सरकारी गंभीरता में चली गई।
विज्ञापन था:
“फुल-टाइम पति की आवश्यकता है।”
नीचे लिखा था:
“अनुभवी उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जाएगी।”
शर्मा जी चौंके। नौकरी के विज्ञापन तो बहुत देखे थे। चौकीदार चाहिए, ड्राइवर चाहिए, मैनेजर चाहिए, अकाउंटेंट चाहिए, पर पति चाहिए, वह भी फुल-टाइम, यह पहली बार देखा था। आज तक समाज में पति को अनावश्यक उपलब्ध वस्तु माना जाता रहा है। जैसे घर में झाड़ू, बाल्टी, पुराना अख़बार और पति, सभी किसी न किसी कोने में पड़े रहते हैं और जरूरत पड़ने पर याद किए जाते हैं।
विज्ञप्ति में सबसे ऊपर पात्रता की अनिवार्य शर्त लिखी थी:
उम्मीदवार का पहली पत्नी के कार्यालय से ऐच्छिक या अनैच्छिक त्यागपत्र हो चुका हो। यदि पहली पत्नी इस लोक से प्रस्थान कर चुकी हो तो मृत्यु प्रमाण-पत्र संलग्न करना होगा। यदि पहली पत्नी जीवित हो, तो उसका अनापत्ति प्रमाण-पत्र अनिवार्य होगा। बिना एनओसी वाले उम्मीदवारों के आवेदन स्वतः निरस्त माने जाएंगे।
शर्मा जी ने पढ़ते-पढ़ते लंबी साँस ली। विवाह संस्था में पति का जीवन वैसे भी एक स्थायी संविदा जैसा होता है। सरकारी संविदा में तो फिर भी नवीनीकरण की संभावना होती है, विवाह में नहीं।
आगे योग्यता लिखी थी:
उम्र साठ वर्ष से अधिक हो। सरकारी या निजी सेवा से सेवानिवृत्त हो। धैर्यवान, सहनशील और पत्नी की बात सुनने में दक्ष हो। गूंगा उम्मीदवार चलेगा, लेकिन बहरा नहीं होना चाहिए, क्योंकि पत्नी के निर्देश सुनना इस पद की मूल योग्यता है। घर-बाहर के छोटे-बड़े कार्यों का अनुभव हो। बिजली का बिल भरना, गैस बुक करना, सब्जी लाना, ड्राइवर न आने पर ड्राइविंग करना, मेहमान आने पर मुस्कुराना और पत्नी की सहेलियों के सामने सामाजिक रूप से प्रस्तुत होने की क्षमता होनी चाहिए।
एक विशेष शर्त मोटे अक्षरों में लिखी थी:
उम्मीदवार पत्नी के “दिन” को दिन और पत्नी के “रात” को भी दिन कहने में निपुण हो। कहने का अर्थ कि पत्नी की हाँ में हाँ और पत्नी की ना में भी हाँ मिलाने वाले उम्मीदवारों को विशेष प्राथमिकता दी जाएगी।
शर्मा जी की आँखें चमक उठीं। उन्हें लगा, यह पद तो जैसे उन्हीं के लिए निकला है। पूरी नौकरी में उन्होंने बॉस की हाँ में हाँ मिलाई थी। अब जीवन के उत्तरार्ध में उसी अनुभव का वैवाहिक पुनर्वास संभव था।
अयोग्यता की सूची और भी रोचक थी:
जिस उम्मीदवार का वैवाहिक रिकॉर्ड खंगालने पर यह पाया जाएगा कि उसने कभी पत्नी को शॉपिंग से रोका है, बिस्तर पर गीला तौलिया छोड़ा है, घर में मित्रों के साथ दारू पार्टी की है, हरिद्वार जाने के नाम पर थाईलैंड गया है, या पत्नी के साथ बहस में कभी गलती से जीत गया है, वह इस पद के लिए अयोग्य माना जाएगा।
काम का विवरण भी दिया गया था:
सुबह चाय बनाने से लेकर रात में दरवाजा बंद करने तक की जिम्मेदारी। सप्ताह में कम से कम दो बार रसोई में खाना बनाना। आवश्यकता पड़ने पर किटी पार्टी में कुर्सियाँ लगवाना। पत्नी को साहित्यिक रुचि हो तो उनकी कविताएँ, संस्मरण, लघुकथाएँ और हास्य-व्यंग्य ध्यानपूर्वक सुनना। जहाँ आवश्यक हो वहाँ हँसना, जहाँ समझ न आए वहाँ भी हँसना, और जहाँ पत्नी स्वयं रुके, वहाँ ताली बजाना अनिवार्य होगा।
विज्ञप्ति में विशेष प्राथमिकता के अंतर्गत लिखा था:
रिटायर्ड कर्मचारियों को विशेष प्राथमिकता दी जाएगी क्योंकि वे जीवन में दो-दो बॉस झेल चुके होते हैं। एक दफ्तर वाला और दूसरा घर वाला। ऐसे उम्मीदवारों में आदेश पालन, मौन धारण, फाइल आगे बढ़ाने और गलती स्वीकार करने की स्वाभाविक क्षमता विकसित हो चुकी होती है।
आवेदन प्रक्रिया भी कम कठोर नहीं थी:
उम्मीदवार अपने पूर्व वैवाहिक और सेवानिवृत्ति अनुभव का विस्तृत विवरण भेजें। साथ में यह भी बताएं कि पत्नी के दैनिक नखरों, आकस्मिक क्रोध, मौन-व्रत, तिरछी दृष्टि और “रहने दीजिए, आपसे नहीं होगा” जैसे वाक्यों से कैसे निपटेंगे। आवेदन के साथ मुस्कुराते हुए फोटो संलग्न करना अनिवार्य है। यदि आवेदन स्वीकृत हुआ, तो इंटरव्यू में धैर्य परीक्षा ली जाएगी।
शर्मा जी चौंके। धैर्य परीक्षा! वे सोचने लगे, यह भी कोई परिक्षा है ? जीवन भर साहब की मीटिंग झेली, जूनियरों की छुट्टी अर्जियाँ झेलीं, फाइलों पर आपत्ति झेली, बच्चों की फीस झेली और पत्नी की टिप्पणी झेली।
शर्मा जी ने अख़बार मोड़ा और सोफे पर लेट गए। कल्पना ने पंख फैलाए। उन्होंने खुद को नए घर में देखा। वे सुबह चाय बना रहे हैं। पत्नी जी चाय पीकर कह रही हैं, “ठीक है।” भारतीय वैवाहिक जीवन में “ठीक है” नोबेल पुरस्कार से कम नहीं होता।
फिर उन्होंने खुद को बाजार में देखा। पत्नी आगे-आगे चल रही हैं, वे पीछे-पीछे थैला उठाए चल रहे हैं। गोलगप्पे वाले के सामने पत्नी याचक भाव से खड़ी हैं और शर्मा जी ईर्ष्या से सोच रहे हैं कि इस संसार में कुछ पुरुष सचमुच भाग्यशाली हैं, जिन्हें महिलाएँ इतनी कोमल दृष्टि से देखती हैं।
अचानक शर्मा जी को विज्ञापन की सबसे बड़ी कमी दिखी। वे बुदबुदाए, “सैलरी का तो कहीं उल्लेख ही नहीं है।”
फिर खुद ही मुस्कुराए। पति पद पर सैलरी कौन देता है?
शर्मा जी ने निर्णय ले लिया। वे आवेदन करेंगे। आखिर इस उम्र में फुल-टाइम पति की नौकरी मिले, इससे बड़ा पुनर्वास क्या हो सकता है!
उन्होंने कलम उठाई और आवेदन लिखना शुरू किया:
“मान्यवर, मैं साठ वर्ष से अधिक आयु का अनुभवी, सेवानिवृत्त, आज्ञाकारी, धैर्यवान और परिस्थितिजन्य मौन धारण करने में दक्ष पुरुष हूँ। मैंने जीवन में पत्नी, बॉस, बच्चों और बिजली विभाग, सभी की बातें सुनी हैं। आवश्यकता पड़ने पर गलती मेरी न हो, तब भी क्षमा माँग सकता हूँ। पत्नी की कविता पर ताली बजाने, किटी पार्टी में प्लेटें सजाने, बाजार में थैला उठाने और बिना कारण अपराधबोध महसूस करने का पर्याप्त अनुभव है। अतः कृपया मुझे फुल-टाइम पति पद हेतु विचारार्थ स्वीकार करें।”
आवेदन पूरा करके शर्मा जी ने ऊपर देखा। आसमान में बादल थे। हवा चल रही थी। पंछी चहक रहे थे। उन्हें लगा कि प्रकृति भी कह रही है, “जाओ शर्मा, फिर से विवाह संस्था के रणक्षेत्र में उतर जाओ।”
तभी भीतर से कामवाली बाई ने आवाज लगाई, “शर्मा जी, चाय में चीनी कितनी डालूँ?”
शर्मा जी ने घबराकर कहा, “जितनी मैडम कहें।”
फिर उन्हें याद आया, अभी तो आवेदन भेजा भी नहीं है। लेकिन अभ्यास तो शुरू हो ही चुका था।
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