यात्रा को किए हुए दो दिन हो गए, लिखना तो था, पर डरता था कि कहीं बाल-अधिकार आयोग इसे पढ़कर मुझे ही नोटिस न भेज दे कि आपने बच्चों की स्वाभाविक प्रतिभा को आतंकवाद क्यों कहा। लेकिन उस रात थर्ड एसी के एक डिब्बे में जो हुआ, उसके बाद मुझे लगा कि देश को सच जानने का अधिकार है।
हवाई यात्रा में कैसे एक बच्चा पूरी फ्लाइट हाईजैक कर सकता है, यह तो मैं पहले अनुभव कर चुका था, और उस अनुभव को साझा भी किया था। पर ट्रेन यात्रा में दो बच्चे मिलकर पूरा थर्ड एसी कोच बंधक बना सकते हैं, यह ज्ञान मुझे उसी रात प्राप्त हुआ। आप शादी में गए हैं, आपके कज़िन की शादी,आपके परिवार में आपकी जनरेशन की सेकंड लास्ट शादी। आपको सरप्राइज लगेगा, लेकिन ऐसा ही है,हमारा भरापूरा संयुक्त परिवार है, जहाँ सास और बहू की डिलीवरी लगभग एक ही महीने या एक ही सप्ताह में देखी जा सकती है। मेरे सबसे छोटे चाचा, जिनकी उम्र मुझसे सिर्फ एक महीने बड़ी है, उन्हें मेरी मम्मी ने ही पालने में झुलाया है। तो ये नीचे से दूसरे नंबर के चाचा के बच्चे हैं, जिनकी शादी थी,तो वह कन्फ्यूजन तो दूर हुआ ना।
तो हाँ, शादी में खूब धमाल किया, रात जगा किया, और थक-हारकर हम शादियों के इस सीज़न में जैसे-तैसे थर्ड एसी में आरएसी टिकट जुटा पाए। जाहिर था, मन में एक अदद नींद की ख्वाहिश थी, ताकि सुबह पहुँचकर तीन दिन से बंद पड़े क्लिनिक के बैकलॉग मरीजों को देखने भर की हिम्मत बन सके।
हम रात की ट्रेन से लौट रहे हैं। मन में सुखद कल्पना थी कि होने को तो थर्ड एसी ही है ,फिर भी अगर रेलवे की मेहरबानी रहे तो एसी चल ही रहा होगा, चादर भी मिल ही जाएगी, तकिया न सही तो कंबल को ही सिरहाना लगाकर सो जाएंगे, और जीवन की भाग-दौड़ से निकली हुई थोड़ी-सी नींद भी मिल जाएगी। लेकिन भाग्य का क्या कहें,उसने पहले ही आरक्षण चार्ट में हमारे नाम के सामने अदृश्य स्याही से लिख दिया था, “आज इनकी नींद राष्ट्रहित में स्थगित की जाती है।”
हमारे कूपे में एक दंपती चढ़े। उनके साथ दो बच्चे थे। बच्चे तो बच्चे की उम्र के ही थे, लेकिन उम्र से आप क्या ही अंदाज़ा लगा सकते हैं..मित्र,ऊर्जा के मामले में वे किसी चुनावी रैली के लाउडस्पीकर से कम नहीं थे। माता-पिता के चेहरे पर मैंने ध्यान से देखा,वैसी ही गर्वमयी थकान थी जैसी किसी वैज्ञानिक के चेहरे पर होती है जिसने प्रयोगशाला में दो सफल परमाणु विस्फोट कर लिए हों।
पहली दृष्टि में ही स्पष्ट हो गया कि दोनों बच्चे शायद पहली बार एसी डिब्बे में आए थे। ट्रेन में घुसते ही दंपती ने सेल्फ-डिक्लेरेशन भी लगभग दे ही दिया था,“हमें तो एसी सूट नहीं करता, दम सा घुटता है, लेकिन ये तो बच्चों की जिद थी कि नहीं, एसी में ही यात्रा करनी है, इसलिए एसी बुक करना पड़ा।” बच्चे एसी कोच के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी अपने हमउम्र बच्चों से जुटाकर लाए होंगे। उन्हें यह कोच कोई म्यूज़ियम या चिड़ियाघर लगा होगा। वे बड़े कौतूहल से हम सभी निरीह जीवों को देख-परख रहे थे।
उनके लिए हर सीट एक पहेली थी, हर बर्थ एक पर्वत जैसा चैलेंज, हर चेन एक झूला, हर पर्दा मानो कठपुतली का खेल शुरू होने से पहले खींचा जाने वाला मंच का परदा, हर स्विच एक रहस्यमयी गुफा और हर यात्री एक संभावित दर्शक, जिसे वे बिना किसी टिकट के अपनी आतंकी कला-प्रतिभा का प्रदर्शन दिखा सकते थे।
बड़ा बच्चा आते ही ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ा, फिर नीचे उतरा, फिर बीच वाली बर्थ पर गया, फिर वापस नीचे आया। यह क्रम इतनी गति से चल रहा था कि एक बार तो मुझे लगा रेलवे ने शायद बच्चों के लिए कोई एडवेंचर पार्क शुरू कर दिया है। छोटा बच्चा उससे पीछे क्यों रहता? वह सीटों के बीच से ऐसे निकल रहा था जैसे किसी युद्ध-फिल्म में कमांडो दुश्मन की चौकियों के बीच से निकलता है।
माता-पिता बीच-बीच में औपचारिकता निभाते हुए कहते रहे, “बेटा, मत चढ़ो… गिर जाओगे।”
बच्चा इस सलाह को भारतीय लोकतंत्र में चुनावी घोषणा-पत्र की तरह सुनता, मुस्कुराता और अगली बर्थ पर चढ़ जाता। माता-पिता अपनी असहायता को दिखाने हेतु शर्म के साथ सभी से माफी मांगने की मुद्रा में औपचारिक आत्मसमर्पण करते नजर आए।
थर्ड एसी का पूरा डिब्बा अब उनका निजी प्ले-स्कूल बन चुका था। एक यात्री सोने की कोशिश कर रहा था, बच्चे ने उसके जूते को वैज्ञानिक जिज्ञासा से देखा और पूछा, “ये किसके हैं?”
यात्री ने कराहते हुए कहा, “मेरे हैं बेटा।”
बच्चा संतुष्ट नहीं हुआ। उसने अगला प्रश्न दागा, “आप कहाँ जा रहे हो?”
यात्री ने आँखें बंद रखते हुए कहा, “सोने जा रहा हूँ बेटा… अगर तुम सोने दो तो।”
बच्चा बोला, “लेकिन ट्रेन तो जयपुर जा रही है।”
ऐसे उत्तरों के सामने वयस्क मनुष्य तुरंत पराजित हो जाता है।
इसी बीच बच्चों को जैसे याद आया,माता-पिता घर से परांठे, अचार, नमकीन, चिप्स के पैकेट, बिस्कुट सब साथ लाए हैं। माता-पिता ने बच्चों की तांडवमयी गतिविधियों को देखते हुए ऊपर की बर्थ ही बुक कराई थी, ताकि बच्चों पर नियंत्रण रखा जा सके। लेकिन यह व्यवस्था बच्चों को अपनी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए और आसान कर गई,अब वे ऊपर से सब पर जो भी हाथ में आए, फेंक सकते थे, गिरा सकते थे। शुरुआत उन्होंने अपने घर के सामान से की। जब वह कम पड़ गया, तो रेलवे संपत्ति पर भी हाथ आजमाया गया।
दंपती की एक बड़ी शिकायत यह थी कि अगर उन्हें पता होता कि एसी डिब्बे में भी पंखे होते हैं, तो वे कभी बुकिंग नहीं कराते,क्योंकि बच्चों को आदत है चलते पंखे को बटन से नहीं, उंगली से बंद करने की। हमने सुझाव दिया कि पंखा बंद कर देते हैं, लेकिन बच्चों ने इसे एक नया चैलेंज समझ लिया,“चलते को बंद नहीं कर सकते तो बंद को चालू तो कर सकते हैं।” और वे उंगलियों से उसे घुमाने लगे।
तभी पहला वेंडर आया,“चाय-कॉफी!”
बच्चे ने उसे ऐसे देखा जैसे कोई नया चरित्र कहानी में प्रवेश कर गया हो।
“अंकल, आपके पास क्या है?”
“चाय है।”
“कॉफी है?”
“है।”
“समोसा है?”
“नहीं।”
“फिर आप समोसा क्यों नहीं लाए?”
वेंडर के चेहरे पर वही भाव आया जो संसद में अचानक कठिन सवाल पूछे जाने पर मंत्री के चेहरे पर आता है। वह चुपचाप आगे बढ़ गया। बच्चा कुछ देर तक उसे देखता रहा, मानो तय कर रहा हो कि इस आदमी को अगली बार पूछताछ के लिए बुलाना पड़ेगा।
माँ ने बच्चों की भूख का संज्ञान लेते हुए परांठे-अचार की पोटली खोल दी। बच्चों को खिलाने की जिद में कुछ ग्रास मुँह में गए, कुछ नीचे सो रहे पैसेंजर के सिर पर गिरे। हम आरएसी साइड लोअर पर थे, इसलिए बाईस्टैंडर घायल होने के कोलैटरल डैमेज से बचे रहे।
पिता ने बैग से चिप्स निकाले। बच्चे ने चिप्स खोले, दो खाए, बाकी पूरे डिब्बे के सामाजिक वितरण के लिए बिखेर दिए। अब फर्श पर चिप्स थे, सीट पर चिप्स थे, चादर पर चिप्स थे और वातावरण में आलू-नमक की सोंधी सुगंध फैल चुकी थी।
माता-पिता ने भोजन शुरू किया, पर वे भोजन कम और कक्षा अधिक संचालित कर रहे थे,“अच्छा मुँह खोलो… देखो-देखो… चिड़िया को खिला दूँगी… आ जा चिड़िया खा जा… देखो बाबाजी को पकड़वा दूँगी… नहीं मम्मी मुझे पिज़्ज़ा चाहिए… अगले स्टेशन दिलवा दूँगी, पहले ये खत्म करो…” इस तरह साम, दाम, दंड, भेद से मोर्चा चलता रहा। मैं देख रहा था,पैसेंजर खामोश थे और हमारी पत्नी माथा पकड़े हुए इस भूकंप के गुजर जाने का इंतज़ार कर रही थीं।
इधर खाना खत्म हुआ तो उन्हें ध्यान आया कि बच्चों का शैक्षिक सत्र भी पूरा कर लिया जाए। उन्होंने पूरा पाठ्यक्रम वहीं खोल दिया,
“ए फॉर?”
“एप्पल।”
“बी फॉर?”
“बॉल।”
“ट्रेन में कौन बैठे हैं?”
“अंकल।”
यह ‘अंकल’ मैं था। मेरा अपराध यह था कि मैं सामने वाली सीट पर था और अभी तक सो नहीं पाया था। अब मुझे भी इस बाल-शिक्षा अभियान का अनौपचारिक निरीक्षक बना दिया गया।
माँ बोली, “अंकल को पोएम सुनाओ।”
बच्चे ने मेरी तरफ देखा। मैंने अपराधी की तरह मुस्कुराकर गर्दन हिलाई। उसने कविता शुरू की। कविता की पहली दो पंक्तियाँ पहचान में आईं, तीसरी से वह स्वतंत्र छंद में चला गया और चौथी तक आते-आते कविता का संबंध राष्ट्रगीत, पहाड़ा और कार्टून चैनल से जुड़ चुका था।
माता-पिता प्रसन्न थे। पूरा डिब्बा मौन पीड़ा में था। ऐसा लग रहा था जैसे सभी किसी रक्षक दल का इंतजार कर रहे हों, जो उन्हें इस अपहरण से मुक्ति दिलाए।
रात गहराने लगी। यात्री अपने-अपने बिस्तर खोलने लगे। किसी ने कंबल ओढ़ा, किसी ने मोबाइल में ईयरफोन लगाया, किसी ने ऊपर वाली बर्थ पर चढ़कर आत्मनिर्वासन ले लिया। पर बच्चों की ऊर्जा का सूर्यास्त अभी दूर था। वे अब एसी वेंट, रीडिंग लाइट, मोबाइल चार्जिंग पॉइंट, पानी की बोतल, पर्दे की रिंग और सीढ़ी के डंडों का निरीक्षण कर रहे थे।
एक बच्चे ने अचानक पूछा, “पापा, ट्रेन कैसे चलती है?”
पिता ने संक्षेप में कहा, “इंजन से।”
बच्चा बोला, “इंजन कहाँ है?”
“आगे।”
“कितना आगे?”
“बहुत आगे।”
“हम देखने चलें?”
पिता ने पहली बार भयभीत होकर कहा, “नहीं!”
मुझे लगा, अभी यह बच्चा टीटीई से मिलकर इंजन निरीक्षण की अनुमति माँग लेगा। अगर अनुमति मिल जाती, तो संभव था कि अगली घोषणा होती,“यात्रियों से अनुरोध है कि ट्रेन अभी बच्चे द्वारा संचालित की जा रही है, कृपया सीट बेल्ट बाँध लें। हालांकि ट्रेन में सीट बेल्ट नहीं है, फिर भी भावनात्मक रूप से बाँध लें।”
रात लगभग बारह बजे डिब्बे में शांति की संभावना बनी। तभी छोटे बच्चे ने घोषणा की, “मुझे अकेले ऊपर सोना है।”
माँ बोली, “नहीं बेटा, तुम गिर जाओगे।”
बच्चा रोने लगा।
पिता बोले, “ठीक है, थोड़ी देर ऊपर सो जाओ।”
ऊपर गया। दो मिनट बाद बोला, “मुझे नीचे आना है।”
नीचे आया। पाँच मिनट बाद बोला, “मुझे मम्मी के पास सोना है।”
मम्मी के पास गया। फिर बोला, “मुझे पापा के पास जाना है।”
उस रात वह बच्चा नहीं, रेलवे का आंतरिक ट्रांसफर विभाग था,हर पाँच मिनट में पोस्टिंग बदल रही थी।
सहयात्रियों के चेहरे अब दर्शनशास्त्र में प्रवेश कर चुके थे। एक बुजुर्ग ने चुपचाप करवट बदली, मानो कह रहे हों, “जीवन अस्थायी है, नींद मायावी है और बाल-शोर शाश्वत है।” एक युवक ने ईयरफोन की आवाज इतनी बढ़ा दी कि संगीत के शोर से उस चीख-पुकार को दबा सके। एक आंटी ने धीरे से कहा, एक विवश औपचारिक मुस्कान के साथ,“आजकल के बच्चे बहुत एक्टिव हैं।” उनके स्वर में ‘एक्टिव’ शब्द का अर्थ था, “हे भगवान, हमें बचाइए।”
माता-पिता भी बेचारे क्या करते! वे बार-बार मुस्कुराकर कहते, “पहली बार एसी में बैठे हैं न, इसलिए एक्साइटेड हैं।”
तभी टीटी आया। श्रीमती जी ने एक सीट कोच के दूसरे कोने में अलॉट करने की गुहार लगाई। टीटी को दया आ गई। श्रीमती जी ऐसे भागीं जैसे किसी पिंजड़े से छूटा हुआ पंछी,मानो मुक्ति का द्वार खुल गया हो।
रात के लगभग दो बजे आखिरकार बच्चों की बैटरी थोड़ी डाउन हुई। वे सो गए। पर तब तक डिब्बे की नींद शहीद हो चुकी थी। जो यात्री सो सकते थे, वे अब इस भय से जाग रहे थे कि कहीं अगला स्टेशन आते ही ये फिर न उठ जाएँ।
सुबह बच्चे फिर तरोताज़ा उठे। हम सब ऐसे उठे जैसे दिन-दहाड़े लूटे हुए राहगीर। बच्चे मुस्कुरा रहे थे। माता-पिता गर्वित थे। यात्री थके हुए थे। ट्रेन समय पर थी, लेकिन हमारी आत्मा लेट चल रही थी।
ऐसी यात्राओं के लिए रेलवे को कुछ विशेष नियम बनाने चाहिए। जैसे थर्ड एसी में “बाल-आपदा प्रबंधन कोर्स” अनिवार्य हो। हर कोच में एक प्रशिक्षित लोरी विशेषज्ञ नियुक्त हो। टिकट बुक करते समय पूछा जाए,“क्या यात्री के साथ बच्चा है?” यदि उत्तर हाँ हो, तो अगला प्रश्न आए,“सामान्य बच्चा, सक्रिय बच्चा या पूर्णकालिक कोच-हाईजैकर?”
ऐसे बच्चों के लिए अलग “चाइल्ड एक्सप्लोरेशन कोच” होना चाहिए, जिसमें चढ़ने-उतरने के लिए बर्थ, दबाने के लिए नकली बटन, पूछने के लिए वेंडर, सुनाने के लिए कविता, और थकाने के लिए कुछ अतिरिक्त माता-पिता रखे जाएँ।
और सबसे ज़रूरी बात,यात्रियों को टिकट के साथ एक वैधानिक चेतावनी दी जाए:
“इस यात्रा में आपकी नींद, शांति और मानसिक संतुलन बालसुलभ गतिविधियों के अधीन रहेंगे। रेलवे किसी भी प्रकार की भावनात्मक क्षति के लिए उत्तरदायी नहीं होगा।”
सही बात है,ट्रेन में असली खतरा चोर, चेन-पुलिंग या लेट होना नहीं है। असली खतरा वह मासूम चेहरा है, जो आपकी सीट के सामने खड़े होकर पूछता हुआ मिल सकता है,“अंकल, आप सो क्यों रहे हो?”
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