विश्वास करने की कला –आर्ट ऑफ़ बीलिविंग
जीने की कला नहीं ,विश्वास करने की कला ही कारगर है l सच तो यह है कि विश्वास कोई दार्शनिक पहेली नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक मजबूरी है। यह होने की चीज़ कम, मान लेने की प्रक्रिया ज़्यादा है,क्योंकि विकल्प भी क्या है?
बचपन में गणित के मास्टरजी ने हमें यही सिखाया,“मान लो तुम्हारे पास सौ रुपये हैं, मान लो तुम्हारे पास बारह केले हैं।” अब हमारी जेब फटी हुई थी, उसमें एक सिक्का टिकता नहीं था, बारह केले कहाँ समाते! लेकिन सवाल हल करने के लिए ‘मानना’ पड़ता था। भीतर ही भीतर डर यह भी कि अगर ये काल्पनिक केले सच में मिल गए और हम क्लास में ही खा गए, तो घर जाकर बाबूजी को क्या जवाब देंगे।
मास्टरजी का अपना विश्वास भी कम दिलचस्प नहीं था। उन्हें पूरा यकीन था कि हम सब पढ़-लिखकर भी ‘ढोर के ढोर’ ही रहेंगे। उनकी शब्दावली में छात्र और पशु प्रजाति के बीच कोई फर्क नहीं था ,कोई गधे का बच्चा, कोई सूअर का पिल्ला, कोई ऊँट की पूँछ। उस दौर की गालियाँ भी ईमानदार थीं,सीधे-सीधे इंसान को जानवर घोषित कर देती थीं। मास्टरजी के लिए इतना काफी था कि वे खुद को इंसान मानते थे और हम पशु-सामान जीवों को सुधारने की जिम्मेदारी उन्हें मिली है,बस यही उनका अटूट विश्वास था।
यही विश्वास प्रेम कहानियों का भी आधार है। प्रेमी चाँद-तारे तोड़ लाने की कसम खाता है, और प्रेमिका उसे कविता नहीं, सच्चाई मान लेती है। खत चाहे स्याही से लिखा हो, पढ़ने वाली उसे खून समझ लेती है। उसे भरोसा होता है कि प्रेमी या तो घरवालों को मना लेगा या फिर उसे भगा ले जाएगा। हमारे गाँव में तो एक ऐसी सार्वजनिक नायिका थी, जिसके कई प्रेमपत्र मेरे ही हाथों लिखवाये जाते थे,क्योंकि सबको विश्वास था कि मैं राज़ नहीं खोलूँगा। जब एक ही शैली के पत्र अलग-अलग नामों से मिलने लगे, तो उसे शक हुआ, पर उसने अपने किसी भी प्रेमी का विशवास तोड़ा नहीं सभे को बराबर प्यार दिया ।
विश्वास की खूबी यह है कि वह दिखाई नहीं देता, पर हर जगह मौजूद रहता है। बचपन में कहा गया,भगवान पर विश्वास रखो। हमने रखा। फिर गुरु, फिर बैंक, फिर बीमा एजेंट, और अंत में नेता,सब उसी कतार में शामिल हो गए। हम इतने आज्ञाकारी निकले कि सबको बराबर-बराबर भरोसा दे बैठे।
दरअसल, विश्वास में विष का वास नहीं, ‘वश’ करने की शक्ति है। जो आप पर विश्वास कर लेता है, वह धीरे-धीरे आपके प्रभाव में आ जाता है। यही वजह है कि विश्वास पैदा करने वाले लोग सबसे सफल कलाकार होते हैं। वे बिना रंग-तूलिका के तस्वीर खींचते हैं और बिना सुर के संगीत रच देते हैं। लेखक को भरोसा है कि उसे रॉयल्टी मिलेगी, और प्रकाशक को भरोसा है कि लेखक को हिसाब समझ में नहीं आएगा।
पूरा बाज़ार इसी भरोसे पर टिका है। बाबा कहते हैं,हम आपको स्वर्ग का रास्ता दिखाएँगे। बाज़ार कहता है,अगर आप महत्वाकांक्षी हैं, तो यह स्कीम आपको रातों-रात अमीर बना देगी; अगर डरे हुए हैं, तो सुरक्षा का आश्वासन है। ग्राहक खुद आता है, जेब खोलता है, और बदले में एक अदृश्य संतोष लेकर लौट जाता है। आस्तिक और नास्तिक,दोनों अपने-अपने विश्वास को उतनी ही मजबूती से पकड़े रहते हैं।
विज्ञान इस माहौल में थोड़ा असहज हो जाता है। वह प्रमाण माँगता है, जबकि विश्वास कहता है,मान लो। विज्ञान सवाल खड़े करता है, और विश्वास सवाल करने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर देता है। भीड़तंत्र का इंजन भी विश्वास से ही चलता है, जहाँ तर्क की जगह नारे काम करते हैं।
रिश्तों में भी विश्वास एक अनकहा समझौता है। पति देर से लौटकर कहता है,ऑफिस में काम था। पत्नी मान लेती है, या कम से कम ऐसा जताती है। डॉक्टर कहता है,सब नियंत्रण में है, और मरीज उस पर भरोसा कर लेता है, क्योंकि अविश्वास बीमारी से बड़ा बोझ बन जाता है।
राजनीति में विश्वास का नशा सबसे गाढ़ा होता है। घोषणा पत्र वादों का तिलिस्म रचते हैं, और जनता हर बार उसी उत्साह से उन्हें सच मान लेती है। आज विश्वास एक उद्योग बन चुका है,ब्रांड भरोसा बेचते हैं, बाबा श्रद्धा, और संस्थाएँ सुरक्षा।
समस्या विश्वास में नहीं, उसकी दिशा में है। हम यह समझ ही नहीं पाते कि कब हम खुद विश्वास कर रहे हैं और कब हमसे करवाया जा रहा है। यही महीन अंतर हमें निर्णयकर्ता से उपभोक्ता बना देता है।
विश्वास एक साथ भ्रम भी है और सहारा भी। इसके बिना जीवन की गाड़ी चलना मुश्किल है, और इसके साथ चलना कभी-कभी खतरनाक। लेकिन अंततः,चलती तो इसी के भरोसे है।
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