दीवारों का कैनवास और-दीवारें फिर बोल उठी -हास्य व्यंग्य रचना
“दीवारों का कैनवास और-दीवारें फिर बोल उठी बचपन में ले चलता हूँ… क्या करूँ, सारी मीठी यादें तो बचपन के पिटारे में ही रह गईं। बिल्कुल उसी दादी माँ के पिटारे की तरह, जिसे हम उनकी नज़रों से बचाकर उत्सुकतावश खोल ही लेते थे। मन में कौतूहल—आख़िर दादी इस पिटारे में क्या छुपाकर रखती हैं? […]