शर्म आती नहीं हमें — और यह हमारी राष्ट्रीय उपलब्धि है

शर्म आती नहीं हमें — और यह हमारी राष्ट्रीय उपलब्धि है

शर्म… यह शब्द हमारे शब्दकोश में है ही नहीं—या यूँ कहिए कि हमने बड़े जतन से इसे “आउट ऑफ सिलेबस” कर दिया है। आखिर शर्म भी कोई चीज़ है भला? कर्म ही सब कुछ है—और हमें तो यही सिखाया गया है कि कर्म करो, फल की चिंता मत करो। अब यह अलग बात है कि हमारे सारे “कांड” भी कर्मयोग की ही उपज हैं—इतने कर्म किए हैं कि फल अपने-आप ही उग आए!

शर्म तो वैसे ही गायब हो गई जैसे गधे के सिर से सींग—या यूँ कहिए कि वह पड़ोसी देशों में शरण ले चुकी है। बेवफा निकली जी! हमें लगा था कि शर्म हमारी स्थायी नागरिक है, लेकिन पता चला कि वह तो वीज़ा लेकर विदेश में बस गई है। और अब वही पड़ोसी देश—खासकर नेपाल—उसे वापस भेज-भेजकर हमें शर्मिंदा करने की साजिश रच रहे हैं।

देखिए न, हमने तो बेहयाई, निर्लज्जता और राजनीतिक नंगापन की जो विश्वस्तरीय मिसालें कायम की थीं, उनसे जलकर शायद नेपाल ने सोचा—“चलो, इन्हें उनकी ही भाषा में जवाब देते हैं!” लेकिन दिक्कत यह है कि हमने तो बेशर्मी को साधना की तरह साधा है—पीढ़ियों की तपस्या है इसमें!

अब ज़रा नेपाल को ही लीजिए। पड़ोसी धर्म निभाने के बजाय वह उल्टी गंगा बहा रहा है। हमने जो राजनीतिक परंपराएँ स्थापित कीं—जहाँ कुर्सी पाने के लिए नेता सालों तक पापड़ बेलते हैं, जातिवाद का मसाला डालते हैं, धर्म का तड़का लगाते हैं, वादों की खाद डालते हैं, और फिर गठबंधन की जटिल गणित से किसी तरह कुर्सी हासिल करते हैं—उस पूरे “वैज्ञानिक प्रयोग” को नेपाल ने एक झटके में फेल कर दिया!

बताइए, एक रैपर को कुर्सी पर बिठा दिया! अरे भाई, जिस कुर्सी के लिए हमारे नेता आधी ज़िंदगी घिस देते हैं, वहाँ कोई स्टेज से उतरकर सीधे सत्ता में आ जाए—यह तो लोकतांत्रिक अनुशासन का अपमान है! और वह भी कोई बुजुर्ग, अनुभवी, धवल केश और खद्दर धारी नहीं  !

यह तो युवाओं को भड़काने की खुली साजिश है। अगर ऐसे ही चलता रहा, तो बरसों से कुर्सी पर जमे हमारे अनुभवी—जिनके पैर कब के कब्र की देहरी लांघने को आतुर हैंl थोडा सब्र तो कर लें l ताउम्र राजनीती की बिलोनी से सत्ता की मलाई मथी है ,उसका स्वाद तो चख लेने दें ,मरते वक्त यही इनका गंगाजल है l  

और तो और, वहाँ के युवा नेता—बालेन शाह—जनता से मिलते हैं, सड़कों पर चलते हैं, काले चश्मे पहनते हैं, और सेल्फी लेते हैं। यह तो लोकतंत्र का खुला दुरुपयोग है भाई! जनता से मिलने के लिए कुर्सी की क्या जरूरत? यह काम तो बिना कुर्सी के भी हो सकता था! आप यहाँ के  युवाओं की आदतें बिगाड़ रहे हैं—कल को वे भी यही उम्मीद करेंगे कि नेता उनसे मिलें, उनकी सुनें—तो यह तो क्रांति हो जाएगी!

नेपाल ने VIP संस्कृति खत्म करने की बात की—अब यह तो हमारे “VIP दर्शन” पर सीधा हमला है। हम तो वर्षों से मानते आए हैं कि जितनी लंबी गाड़ी, उतना बड़ा लोकतंत्र। जितनी लाल बत्ती, उतनी गहरी जनसेवा।

और यहाँ आप कह रहे हैं कि मंत्री आम आदमी की तरह व्यवहार करें! अरे भाई, आम आदमी तो पहले से ही चूसा हुआ आम है—फिर मंत्री बनने का फायदा क्या?

यह एक तरह का “वैचारिक पेंडेमिक” है—संक्रमण का खतरा है। जेन-ज़ी में यह वायरस तेजी से फैल सकता है। लोकतंत्र के लिए यह खतरनाक है—कहीं ऐसा न हो कि युवा बहक जाएँ और बदलाव, योग्यता, पारदर्शिता जैसी बातें करने लगें।

नेपाल की यह “अत्यधिक सक्रियता” हमें असहज कर रही है। हम तो स्थिरता के पक्षधर हैं—इतनी स्थिरता कि कुर्सी खुद कहने लगी है—“भाई, अब तो कोई और भी बैठ ले!” कुर्सी की  पीठ भी दुखने लगी है, लेकिन नहीं—हम परंपरा निभाते हैं।

हम वही करते हैं जो वर्षों से करते आए हैं—क्योंकि अगर हम बदल गए, तो इतिहास हमें पहचान नहीं पाएगा।

तो नेपाल, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?
तुम विकास करके हमें असुविधा में डाल रहे  हो। तुम युवाओं को मौका देकर हमारी नींद खराब कर रहे  हो।
तुम व्यवस्था सुधारकर हम जैसे व्यंग्यकारों की रोज़ी-रोटी छीनना चाहते हो—अगर विसंगतियाँ ही खत्म हो गईं, तो हम लिखेंगे क्या?
हमें फिर से शर्म करने पर मजबूर मत करो। बड़ी मुश्किल से हमने यह बेशर्मी हासिल की है—यह हमारा पीढ़ीगत अधिकार है, जो हमने विरासत में पाया है और आगे ट्रांसफर करना है।

लेकिन निश्चिंत रहो—हमारी चमड़ी मोटी है।
हमारी परंपरा मजबूत है।

और सबसे बढ़कर—

हमें शर्म आती नहीं है… और यही हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय उपलब्धि है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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