Mardaani 3 Review: रानी मुखर्जी की वापसी, लेकिन कहानी क्यों रह गई अधूरी?

“मर्दानी 3” उन फिल्मों में से है, जिन पर यह लाइन एकदम सटीक बैठती है—जब Rani Mukerji जैसी अभिनेत्री कमबैक करती हैं, तो दर्शकों की उम्मीदें सिर्फ फिल्म नहीं, एक “इवेंट” देखने की होती हैं। “मर्दानी” और “मर्दानी 2” के बाद तीसरी किस्त आई है—वही खून खौलाने वाला विषय, वही नारी शक्ति का घोष—“बुरी नज़र डाली तो आँखें निकलवा दी जाएँगी।”

लेकिन सवाल यह है—क्या इस बार कुछ नया है? या फिर यह भी उसी फ्रेंचाइज़ बीमारी का शिकार हो गई है, जिसमें कहानी पीछे छूट जाती है और ब्रांड आगे निकल जाता है?

Mardaani 3 का मूल विषय वही पुराना लेकिन जरूरी संघर्ष है—पुलिस बनाम अपराध। और इस बार फिल्म एक दिलचस्प सवाल उठाती है—जब एक अमीर की बेटी और एक गरीब की बेटी, दोनों एक ही अपराध का शिकार बनती हैं, तो क्या कानून की नजर दोनों को बराबर देखती है?

कहानी में शिवानी रॉय फिर उसी वर्दी में लौटती हैं, लेकिन इस बार उनकी वर्दी पर एक और दाग लग जाता है—जब उनकी आँखों के सामने एक बाप से उसकी बेटी छीन ली जाती है। यहीं से शुरू होता है चूहे-बिल्ली का खेल—लेकिन इस बार खेल थोड़ा ज़्यादा अंधेरा है।

सबसे बड़ा झटका यह है कि इस बार विलेन कोई साधारण चेहरा नहीं है। वह खुद को “अम्मा” कहलवाती है—और मासूम लड़कियों को एक ऐसे अंधे खेल में धकेलती है, जहाँ इंसानियत की आखिरी परत भी उतर जाती है। यह सिर्फ किडनैपिंग नहीं, बल्कि एक संगठित, सोच-समझकर रचा गया अपराध है—जहाँ उम्र, वर्ग और शरीर—सबका अपना “मूल्य” तय किया गया है।

फिल्म यहाँ एक नया ट्विस्ट देने की कोशिश करती है—कि हर गायब होने वाली बच्ची किसी खास पैटर्न के तहत उठाई जा रही है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, आपको महसूस होने लगता है कि यह “नया” उतना नया भी नहीं है। बस पुराने आइडिया को नए पैकेट में पैक करके परोसा गया है।

और यही “मर्दानी 3” की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।

फिल्म बार-बार आपको चौंकाने की कोशिश करती है—यह कहकर कि जो दिख रहा है, वही सच नहीं है। लेकिन समस्या यह है कि दर्शक अब इतने मासूम नहीं रहे। उन्हें पता है कि ट्विस्ट कहाँ आएगा और कैसे आएगा। नतीजा—क्लाइमेक्स आते-आते कहानी का सस्पेंस दम तोड़ देता है।

एक और अफसोस यह है कि इतने अच्छे कलाकार होने के बावजूद, किसी को भी खुलकर चमकने का मौका नहीं दिया गया। विलेन, जो इस फ्रेंचाइज़ की असली ताकत रही है, इस बार सेकंड हाफ में कमजोर पड़ जाता है—और एक खतरनाक “अम्मा” अचानक एक बेबस किरदार में बदल जाती है।

अगर तुलना करें, तो “मर्दानी” इंटेलिजेंट थी, “मर्दानी 2” खौफनाक थी—लेकिन “मर्दानी 3” न तो उतनी दिमागी है, न उतनी डरावनी। यह बस एक “ठीक-ठाक” क्राइम ड्रामा बनकर रह जाती है।

आज के दौर में, जहाँ Crime Patrol और CID जैसे शोज़ का एक एपिसोड भी इतना थ्रिल दे देता है, वहाँ 2-ढाई घंटे की फिल्म से उम्मीदें कहीं ज्यादा होती हैं। और “मर्दानी 3” उन उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती।

सच कहें तो यह फिल्म थिएटर से ज्यादा ओटीटी के लिए बनी लगती है। अगर इसे सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ किया जाता, तो शायद दर्शक इसे ज्यादा अपनाते और इसकी खामियों को भी नजरअंदाज कर देते।

कुल मिलाकर—फिल्म खराब नहीं है, लेकिन खास भी नहीं है। रानी मुखर्जी अपना काम ईमानदारी से करती हैं, लेकिन कहानी उनका साथ नहीं दे पाती। क्लाइमेक्स प्रेडिक्टेबल है, इमोशंस कमजोर हैं, और जो असर होना चाहिए था—वह कहीं खो जाता है।

पाँच में से दो स्टार्स—एक Rani Mukerji के लिए, और एक इस कोशिश के लिए कि फिल्म बिना फालतू मसाले के सिर्फ कहानी पर फोकस रखती है।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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