डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 7, 2026
Humour
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Service without a selfie is like a donation without a receipt—you may have done it, but it can’t be proven.”
“Real faces are now for private use; public life runs on filters.”
“Travel no longer ends at the destination; it ends at the story highlight.”
“Everyone is a hero, every frame is the Mahabharata, and every filter slaughters the truth.”
“People don’t smile at people anymore—they smile only while taking selfies.”
Ram Kumar Joshi
Dec 13, 2025
हिंदी लेख
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“मुगल-ए-आज़म के आधुनिकीकरण पर आधारित यह व्यंग्य-नाटिका सोलहवीं सदी के ठाठ-बाट को इक्कीसवीं सदी की भोंडी आधुनिकता से टकराते हुए दिखाती है—जहाँ बादशाह का दरबार दारू, डांस, ड्रामा और डिजिटल विद्रोह में बदल जाता है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 9, 2025
Poems
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“कचरा —
बन बैठा है मानवीय संबंधों का नया व्याकरण।
वह चाय के प्यालों में बहस बनकर उफनता है,
और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ‘ज्ञान’ में
अवधारणाओं को सड़ा देता है।”
Ram Kumar Joshi
Dec 9, 2025
व्यंग रचनाएं
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“भोजन चाहे जितना लजीज़ हो, पर यदि खाने वाले रौनकशुदा न हों तो सब बेकार—जैसे मुर्दे भोजन करने आ गए हों।”“साहबों, सूची में किसे बुलाना और किसे काटना—यही सबसे बड़ी भूख है। जो जितना बड़ा, उतना ही ज़्यादा भूखा।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 8, 2025
व्यंग रचनाएं
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"जितना सफेद बाल छुपाते हैं, वो उतनी ही तेजी से अपनी असलियत दिखाता है—जैसे व्यवस्था की कालिख सफ़ेदपोशों पर।"
Excerpt 2:
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 7, 2025
व्यंग रचनाएं
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नेता जी का यह इंटरव्यू लोकतंत्र के नाम पर एक शानदार हास्य-नाट्य है। हर सवाल का जवाब वे इतनी आत्मा-तुष्ट गंभीरता से देते हैं कि सच्चाई उनसे सावधान दूरी बनाकर खड़ी रहती है। बेहतरीन व्यंग्य, तीखे संवाद और कैमरे के सामने झूठ की अग्निपरीक्षा—सब कुछ यहाँ मौजूद है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 4, 2025
व्यंग रचनाएं
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“नवराष्ट्रवाद वह चूर्ण है जिसमें दो चुटकी डालते ही कोई भी बहस राष्ट्रभक्ति की आँच पर तवे की तरह लाल हो जाती है।”
“आजकल सवाल पूछना विचार नहीं, ‘कौन भेजा तुम्हें’ परीक्षा का पहला प्रश्नपत्र बन गया है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 2, 2025
आलोचना ,समीक्षा
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“व्यंग्य हँसाने की कला नहीं, हँसी के भीतर छुपी बेचैनी को जगाने की कला है। वह पल जब मुस्कान के बाद एक सेकंड की चुप्पी उतरती है—वही असली व्यंग्य है।”
“व्यंग्यकार हर दृश्य को तिरछी आँख से देखता है—क्योंकि सीधी आँख से देखने पर आजकल सब कुछ सामान्य लगने लगा है, और यही सबसे असामान्य बात है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 28, 2025
Poems
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“शादी के पंडाल में तंदूरी रोटी अब सिर्फ़ खानपान नहीं रही, पूर्ण युद्ध बन चुकी है। दूल्हे से ज़्यादा चर्चा उस वीर की होती है, जो तंदूर से सटकर खड़ा रहता है और दो रोटी के लिए इतिहास लिख जाता है। ‘वीर तुम डटे रहो’ इस जंग के मोर्चे पर खड़े हर भूखे शौर्यवान की व्यंग्य-गाथा है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 28, 2025
Cinema Review
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"गोविंद निहलानी की ‘पार्टी’ सिर्फ़ एक फिल्म नहीं, उच्चवर्गीय बौद्धिकता का एक्स-रे है। चमकते बंगले में इकट्ठा लोग साहित्य से ज़्यादा एक-दूसरे की पॉलिश चमकाते हैं। अनुपस्थित कवि अमृत की परछाईं पूरे माहौल पर भारी है, और उसका एनकाउंटर इस भीड़ की संवेदनहीनता को नंगा कर देता है।