Roses & Thorns — Reached a Literary Giant!

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 3, 2025 Book Review 4

Dr. Mukesh Aseemit’s "Roses & Thorns" is a witty collection of satirical essays reflecting India’s socio-political contradictions. With humor and depth, it critiques modern absurdities—from politics to pop culture—offering both laughs and truths. A bouquet of insight and irony for readers who enjoy thinking while they smile.

हैप्पी डॉक्टर्स डे – व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 30, 2025 Blogs 0

डॉक्टर्स डे के दिन एक पत्रकार ‘VIP एंट्री’ की जिद पर अड़ा था। डॉक्टर की शोकेस डिग्रियों से भरी थी लेकिन वह ‘चंदा देकर सम्मानित’ होने को भी तैयार था। अंततः 'गलत इंजेक्शन' वाले रिसर्च का नाम सुनते ही पत्रकार डर से भाग गया। कटाक्ष और हँसी का जबरदस्त मिश्रण।

जब आप लड़की देखने जाए श्रीमान तो इन पांच बातों का रखें विशेष ध्यान

Mukesh Rathor Jun 30, 2025 Blogs 0

रोटी, कपड़ा, मकान के बाद अब नौकरी और छोकरी युवा की प्रमुख आवश्यकताएं बन गई हैं। लड़की देखने जाना शादी से पहले की सबसे बड़ी सामाजिक परीक्षा है, जिसमें चाय, मुस्कान और मूक संवादों के बीच कई बार ऐसा पंच पड़ता है कि रिश्ता बनने के पहले ही बिखर जाता है।

उनके होंठ-कविता -बात अपने देश की

Veerendra Narayan jha Jun 26, 2025 Poems 0

उनके होंठ बस होंठ नहीं, सत्ता के हथियार हैं — हवा में तैरते छल्लों जैसे, जो कभी बयान बनते हैं, कभी धमकी। दिल और दिमाग के ताले में बंद आत्मा, जब बोलने लगे बिना सोचे, तो सीज़फायर से स्ट्राइक तक का फ़ैसला भी होंठ ही करते हैं।

डॉक्टर साहब, आप तो भगवान हैं।

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 22, 2025 Blogs 0

तुम भगवान हो, तो गलती नहीं कर सकते — क्योंकि इंसान की तो गलती माफ़ होती है। अब जब भगवान बना दिया है, तो ये भी जान लो... इंसानों के हक़ मांगोगे, तो चोला उतार फेंका जाएगा। क्या कहा? छुट्टी चाहिए? भगवानों को छुट्टी नहीं मिलती... बस पूजा मिलती है या पत्थर!

मेडिकल का आँचलिक भाषा साहित्य – बिंब, अलंकारों, प्रतीकों से भरपूर

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 8, 2025 Blogs 1

"डॉक्टर साहब, आपकी पढ़ाई अपनी जगह… हम तो इसे 'नस जाना' ही मानेंगे!" ग्रामीण चिकित्सा संवादों में हर लक्षण का एक लोकनाम है — 'चक चली गई', 'हवा बैठ गई', 'गोड़ा बोल गया', 'ऊपर की हवा का असर है'। ये केवल शब्द नहीं, एक पूरी चिकित्सा-व्याख्या है, जिसमें विज्ञान, विश्वास और व्यंग्य की त्रिवेणी बहती है। गाँव के मरीज डॉक्टर से नहीं, खुद अपनी बीमारी का निदान लेकर आते हैं। इस लेख में इन्हीं रंग-बिरंगे अनुभवों, प्रतीकों और मुहावरों के ज़रिए एक लोक-चिकित्सा संस्कृति का हास्य-चित्रण किया गया है।

The Kaliyug God and His Temple of Modern Times

डॉ मुकेश 'असीमित' May 6, 2025 Blogs 0

A darkly humorous satire on modern-day healthcare, portraying a doctor's hospital as a “Kaliyug temple” where survival needs CCTV, bouncers, panic buttons, and soundproof walls. Packed with witty metaphors, real-world ironies, and tongue-in-cheek advice for new doctors, it exposes the chaos of violence, politics, and DJ culture outside hospital doors — where healing meets havoc in India’s twisted reality.

Candle March — Of the Mighty “Mom-Batti Veers”

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 30, 2025 Blogs 2

A razor-sharp satire on today’s photo-op revolutions, Candle March – Of the Mighty "Mom-Batti Veers" mocks performative activism where grief is glamorized and protests are lit by candles, not courage. From WhatsApp warriors to Instagram patriots, it exposes how revolutions have become aesthetic rituals, not acts of change. A hilarious yet biting commentary on symbolic resistance in a nation addicted to drama over action.

“मजे की राजनीति: भारतीय जीवन का मस्ती भरा दर्शन”

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 14, 2024 व्यंग रचनाएं 2

भारतीय आम आदमी की ज़िंदगी में काम नहीं, मज़ा ज़रूरी है। वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स उसे नहीं समझ पाया — लेकिन वो तो मस्ती के लिए जीता है! नेताओं के भाषण हों या सरकारी घोषणाएं, सब कुछ ‘मजा आया की नहीं?’ से तय होता है। यही तो असली लोकतंत्र है – मजेदार लोकतंत्र!

गर्मी के तेवर-व्यंग रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' May 30, 2024 व्यंग रचनाएं 0

यह लेख गर्मी की तीव्रता और उसके व्यंग्यात्मक पहलुओं पर केंद्रित है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे व्हाट्सएप पर गलतफहमियाँ फैलाने वाले संदेश गर्मी की वास्तविकता से अलग होते हैं। एक राजनेता भाषण के दौरान खुद पर ठंडा पानी डालते हुए दिखाई देता है, जबकि जनता पसीने में तरबतर है। बिजली कटौती, गर्मी से जूझते लोग, और ट्रांसफार्मर को ठंडा करने के प्रयासों का वर्णन है। लेख में चुनावी गर्मी और वैश्विक तापमान वृद्धि के प्रभावों पर भी व्यंग्य किया गया है, जिसमें गर्मी के कारण होने वाली परेशानियों का जिक्र है।