Dr Shailesh Shukla
Jun 23, 2026
समसामयिकी
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लोकतंत्र : संवैधानिक प्रावधान और वास्तविक व्यवहार में बड़ा अंतर डॉ. शैलेश शुक्ला लोकतंत्र को विश्व की सर्वाधिक जनोन्मुख और उत्तरदायी शासन व्यवस्था माना जाता है। इसकी मूलअवधारणा अत्यंत सरल और आकर्षक है—सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। जनता अपनेप्रतिनिधियों का चुनाव करती है, सरकार बनाती है और अंततः वही शासन की अंतिम स्वामिनी होती […]
Pradeep Audichya
Jun 23, 2026
व्यंग रचनाएं
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बचा हुआ लोकतंत्र,, – लोकतंत्र किसके पास है ? ये प्रश्न मंच ने नीचे भरी सभा में फेंका ।इतनी जोर से फेंका कि तंत्र द्वारा घेरकर लाए गए लोक ( लोग) डर गए। लोग सोचने लगे शायद कुछ चोरी हो गया और इसका इल्ज़ाम हमपर आयेगा ।सभा में लोग एक दूसरे को संदेह की निगाह […]
Dr Shailesh Shukla
Apr 28, 2026
India Story \बात अपने देश की
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1826 के उदन्त मार्तण्ड से लेकर डिजिटल और AI युग तक हिंदी पत्रकारिता की 200 वर्षों की यात्रा, संघर्ष, विकास और चुनौतियों का विस्तृत विश्लेषण।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 15, 2026
व्यंग रचनाएं
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“हमने बेशर्मी को साधना की तरह साध लिया है—और अब जब पड़ोसी देश सुधार की बात करते हैं, तो हमें असुविधा होने लगती है।”
यह व्यंग्य न केवल भारतीय राजनीति की विडंबनाओं को उजागर करता है, बल्कि हमारे सामाजिक स्वभाव पर भी तीखा सवाल खड़ा करता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 19, 2026
व्यंग रचनाएं
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जब राजनीति पूजा करने लगे
और पूजा राजनीति करने लगे—
तब शंभो भी सोच में पड़ जाते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 15, 2025
व्यंग रचनाएं
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इस देश में विकास कार्य अब सड़क, स्कूल और दरी से नहीं, सीधे प्रतिशत से तय होते हैं। विधायक विकास नहीं देखते, वे सिर्फ़ यह पूछते हैं—“हमें कितना प्रतिशत मिलेगा?” यह व्यंग्य लेख उसी आत्मविश्वासी भ्रष्टाचार का दस्तावेज़ है, जहाँ लोकतंत्र चार स्तंभों पर नहीं, चालीस प्रतिशत पर टिका है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 2, 2025
शोध लेख/विमर्श
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"राग दरबारी कोई उपन्यास नहीं, भारतीय लोकतंत्र की एक्स-रे प्लेट है। श्रीलाल शुक्ल की यह कृति व्यवस्था के सड़ांधभरे तंत्र पर तीखा व्यंग्य करती है। शिवपालगंज की गलियों से लेकर विश्वविद्यालयों, संस्थानों, और मीडिया तक—हर जगह इस रचना के पात्र जीवित प्रतीत होते हैं। खन्ना मास्टर, वैद्यजी, रामाधीन — ये नाम नहीं, व्यवस्था के प्रतीक हैं। रचना की वन लाइनर्स आज भी उतनी ही प्रासंगिक और तीखी हैं, जितनी 60 वर्ष पूर्व थीं। ‘राग दरबारी’ हर पीढ़ी के लिए नया पाठ है—हँसाने के बहाने सोचने पर मजबूर करता हुआ।"
Prahalad Shrimali
Jul 13, 2025
व्यंग रचनाएं
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मुंगेरीलाल केवल एक चरित्र नहीं, हर आम आदमी की अंतरात्मा है जो कठिन यथार्थ के बीच भी सुनहरे सपने देखता है। वह न पाखंडी है, न अवसरवादी—बल्कि एक ऐसा मासूम है जो बिना किसी प्रचार के देश की खुशहाली का सपना पालता है। उसकी दुनिया रंगीन जरूर है, लेकिन अहिंसक, नेकनीयत और हानिरहित है। ऐसे मुंगेरीलाल देश पर बोझ नहीं, बल्कि भावना के सच्चे वाहक हैं।