मंचीय कवि सम्मेलन की मच मच
आज का मंचीय कवि सम्मेलन कविता का नहीं, प्रदर्शन का उत्सव बन गया है—जहाँ कविता घूंघट में सिमटी रहती है और चुटकुले, अभिनय और जुगाड़ का नाच चलता रहता है।
आज का मंचीय कवि सम्मेलन कविता का नहीं, प्रदर्शन का उत्सव बन गया है—जहाँ कविता घूंघट में सिमटी रहती है और चुटकुले, अभिनय और जुगाड़ का नाच चलता रहता है।
मृत्युलोक की राजनीति में “कड़े कदम” उठाने की अद्भुत तकनीक विकसित हो चुकी है। हर संकट में घोषणा होती है कि कड़े कदम उठाए जाएंगे—और जनता आश्वस्त हो जाती है। जब इस तकनीक की चर्चा देवलोक पहुँची, तो इंद्रदेव ने नारद मुनि को इसकी तहकीकात के लिए भेजा। उनकी रिपोर्ट सुनकर देवसभा भी सोच में पड़ गई—कहीं यह तकनीक देवलोक को भी मृत्युलोक न बना दे।
कभी पटिए पर बैठकर शहर की राजनीति, समाज और संस्कार तय होते थे; अब वही चर्चाएँ व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम की स्क्रीन पर सिमट गई हैं। पटिया संस्कृति का यह पटाक्षेप समय की विडंबना है।
तलाक का असली कारण अब ईगो या संवादहीनता नहीं, दूल्हे का जूता घोषित हो चुका है। शादी में जूता चुराई नहीं, मानो वैवाहिक सत्ता परिवर्तन का शंखनाद हो गया हो।
यह भूमिका लेखक के आत्म-व्यंग्य, समाज से संवाद और व्यंग्य की सीमाओं पर एक चुटीला दार्शनिक वक्तव्य है। लेखक गंभीरता के पारंपरिक आग्रह को चुनौती देता हुआ बताता है कि व्यंग्य का उद्देश्य न तो अंतिम सत्य देना है, न उपदेश—बल्कि मुस्कान के बीच सोच का एक क्षण पैदा करना है। पुस्तक, पाठक और समाज—तीनों के बीच चलने वाली इस शाश्वत गलतफहमी को लेखक ने हल्के लेकिन तीखे अंदाज़ में प्रस्तुत किया है।
ज़िंदगी घटनाओं की नहीं, व्याख्याओं की शृंखला है। हर इंसान अपने कंधे पर एक बैग उठाए चढ़ रहा है—यह मानकर कि उसमें सोना है। पर ऊँचाई बढ़ते ही जब साँस फूलने लगती है, तब सवाल उठता है— क्या सच में बोझ की क़ीमत थी, या हम सिर्फ़ कहानी ढो रहे थे?
“रास्ते मिल गए हैं, पर मंज़िल गुम हो गई है कहीं।” “हम आगे इसलिए नहीं बढ़े कि सबको साथ ले जाएँ, बल्कि इसलिए कि पीछे छूटे लोग दिखाई न दें।” “वे लोकतंत्र के पहियों तले कुचले गए— लेकिन ट्रैफिक नहीं रुका।”
बेटा पैदा करने की ज़िद में परिवार ने इतिहास नहीं, मानसिकता की केस-स्टडी लिख दी। नौ बेटियाँ जैसे प्राकृतिक आपदा और बेटा जैसे एनडीआरएफ की टीम। ‘काफ़ी’ और ‘माफ़ी’ बेटियों के नाम नहीं, समाज के लिए छोड़े गए मूक नोट्स हैं। समाज आज भी प्रसव-कक्ष के बाहर खड़ा पूछ रहा है—“लड़का हुआ या फिर…?”
दुनिया की कूटनीति कभी-कभी इतनी जटिल नहीं होती, जितनी एक रूसे फूफा की नाराज़गी। एक फोन कॉल, थोड़ी तारीफ़ और ज़रा-सा अपनापन— न हो तो टैरिफ, ट्वीट और ताने वैश्विक स्तर पर चलने लगते हैं।
सोशल मीडिया पर बैन की ख़बर ने किशोरों को सिर्फ़ चिंतित नहीं किया, उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया। जहाँ किशोर अपनी डिजिटल पहचान के छिनने से डर रहे हैं, वहीं बुज़ुर्ग पीढ़ी उसी स्मार्टफोन में गुम है, जिस पर प्रतिबंध की बात हो रही है। यह कहानी केवल मोबाइल की नहीं, बल्कि पीढ़ियों के दोहरे चरित्र और डिजिटल नैतिकता की है।