हनुमान जी का नामांकन और जाति का कॉलम
जब हनुमान जी चुनाव लड़ने पहुँचे, तो उन्हें सबसे बड़ा संकट रावण नहीं, बल्कि ‘जाति’ कॉलम में मिला। यह व्यंग्य भारतीय लोकतंत्र के उस कटु सत्य को उजागर करता है, जहाँ इंसानियत से पहले जाति पूछी जाती है।
जब हनुमान जी चुनाव लड़ने पहुँचे, तो उन्हें सबसे बड़ा संकट रावण नहीं, बल्कि ‘जाति’ कॉलम में मिला। यह व्यंग्य भारतीय लोकतंत्र के उस कटु सत्य को उजागर करता है, जहाँ इंसानियत से पहले जाति पूछी जाती है।
एक साधारण-सी घटना—तीर चलाना—कैसे समाज में असाधारण प्रतिक्रियाओं का कारण बन जाती है, यह व्यंग्य उसी मानसिकता की पड़ताल करता है, जहां व्यक्ति से ज्यादा उसकी छवि और उस पर होने वाली प्रतिक्रियाएं मायने रखती हैं।
“मैं उस दौर का अनाम प्रेमाचार्य था, जिसने प्रेम के सर्वहारा वर्ग के लिए जनहित याचिका की तरह प्रेमपत्र लिखे—निःशुल्क, निस्वार्थ और निस्संग।” “बिना शायरी के प्रेमपत्र ऐसा ही होता जैसे दाल बिना तड़के।” “एक ही प्रेमिका के लिए लिखते-लिखते हम भी ऊब गए—पर प्रेमियों के दिलों में आग बराबर जलती रही।”
देवर्षि नारद इंद्र को बताते हैं कि मृत्युलोक में मूर्खता अब योग्यता, नीति और प्रमोशन का आधार बन चुकी है। बुद्धिमान अल्पसंख्यक हो चुके हैं और प्रश्न करना अपराध माना जाने लगा है। इस व्यंग्यात्मक संवाद में मूर्खता के सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक स्वरूप का तीखा और हास्यपूर्ण चित्रण किया गया है।
“ऊर्जा स्वयं न पाजिटिव होती है न नेगेटिव—वह तो मात्र साधन है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसे साधु साधे या ‘साहिब’ साधे।”
आज के दौर में आदमी का मूल्य उसके चरित्र से नहीं, फाइल में लगी डिग्री से तय होता है। डिग्री ज्ञान का प्रमाण कम, सामाजिक प्रतिष्ठा का पासपोर्ट अधिक बन चुकी है—और बेरोज़गारी इस पासपोर्ट पर रोज़ वीज़ा रिजेक्ट कर रही है।
जब झूठ ने मार्केटिंग का चोला पहन लिया, तो सच आउटडेटेड घोषित कर दिया गया। “झूठ महा-सेल” में हर वर्ग के ग्राहक उमड़े—नेता, एंकर, धर्मगुरु, कोचिंग संचालक—सब अपने-अपने झूठ के पैकेट खरीदते दिखे। इसी भीड़ में एक बूढ़ा आदमी सच खोजता रह गया…
बीमारी से ज्यादा थका देने वाला होता है रिश्तेदारों का हाल-चाल महाकुंभ—जहाँ हर कोई डॉक्टर भी है, जज भी और जांच अधिकारी भी।
“मक्खनमहापुराण” चापलूस्योपनिषद् का उत्तर-आधुनिक संस्करण है, जहाँ प्रशंसा और चाटुकारिता के बीच की महीन रेखा पर तीखा व्यंग्य किया गया है। यह रचना दिखाती है कि कैसे ‘मक्खनयोग’ आज के दफ्तर, साहित्य, राजनीति और सामाजिक जीवन का अनिवार्य शास्त्र बन चुका है—जहाँ योग्यता से ज्यादा ‘लोचदार जीभ’ और सही समय पर किया गया लेपन ही सफलता की असली कुंजी है।
फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं— यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है, और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है— कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?