Ram Kumar Joshi
Feb 11, 2026
हिंदी कविता
2
यह कविता महानगर दिल्ली की चकाचौंध, अव्यवस्था और आम आदमी की असहजता पर तीखा, लेकिन हल्का-फुल्का व्यंग्य है। ‘बीबी कहाँ छिटक गई’ सिर्फ़ एक व्यक्ति के खोने की बात नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की स्थिति का रूपक है, जो महानगरीय भीड़, जेबकतरी, शोर और भ्रम में स्वयं को खो बैठता है। हाथी की पूँछ और हिलती डोर जैसी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ सत्ता, व्यवस्था और भ्रमजाल पर करारा कटाक्ष करती हैं। कविता सरल भाषा में शहरों की जटिल सच्चाई उजागर करती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 4, 2026
व्यंग रचनाएं
1
डायल-अप की खटखट से लेकर 5G की बेचैनी तक—यह व्यंग्यात्मक लेख पीढ़ियों की उस यात्रा को पकड़ता है जहाँ रिश्ते तारों से जुड़े थे, सपने EMI पर चले और अब अस्तित्व चार्जिंग पॉइंट ढूँढ रहा है। Gen X की स्मृतियाँ, Gen Y की व्यावहारिकता, Gen Z की रील-हक़ीक़त और Gen Alpha की स्क्रीन-सभ्यता—सब एक कमरे में, एक ही नेटवर्क पर।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 21, 2026
व्यंग रचनाएं
0
यह टंकी सिर्फ़ कंक्रीट का ढाँचा नहीं थी, यह व्यवस्था का आईना थी। उद्घाटन से पहले गिरकर इसने बता दिया कि जब नीयत खोखली हो, तो सबसे मज़बूत ढांचा भी बैठ जाता है।
Prahalad Shrimali
Jan 9, 2026
हिंदी कविता
0
कभी कच्चा केला, कभी पका आम—
बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में
हर रिश्ता, हर मूल्य
अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 2, 2026
व्यंग रचनाएं
0
आज के समय में नाम समाधान नहीं, विकल्प बन गया है।
जहाँ समस्याएँ हटाना कठिन हो, वहाँ नाम बदल देना सबसे आसान नीति है।
यह व्यंग्य उसी नाम-प्रधान विकास दर्शन पर एक तीखा मुस्कुराता कटाक्ष है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 17, 2025
व्यंग रचनाएं
0
भूमिका वह साहित्यिक ढाल है जिसके पीछे लेखक अपनी रचना की सारी कमजोरियाँ छुपा लेता है। यह किताब का परिचय नहीं, बल्कि लेखक की अग्रिम क्षमायाचना होती है—जहाँ दोष शैली का होता है, लेखक का कभी नहीं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 15, 2025
व्यंग रचनाएं
0
इस देश में विकास कार्य अब सड़क, स्कूल और दरी से नहीं, सीधे प्रतिशत से तय होते हैं। विधायक विकास नहीं देखते, वे सिर्फ़ यह पूछते हैं—“हमें कितना प्रतिशत मिलेगा?” यह व्यंग्य लेख उसी आत्मविश्वासी भ्रष्टाचार का दस्तावेज़ है, जहाँ लोकतंत्र चार स्तंभों पर नहीं, चालीस प्रतिशत पर टिका है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 2, 2025
आलोचना ,समीक्षा
0
“व्यंग्य हँसाने की कला नहीं, हँसी के भीतर छुपी बेचैनी को जगाने की कला है। वह पल जब मुस्कान के बाद एक सेकंड की चुप्पी उतरती है—वही असली व्यंग्य है।”
“व्यंग्यकार हर दृश्य को तिरछी आँख से देखता है—क्योंकि सीधी आँख से देखने पर आजकल सब कुछ सामान्य लगने लगा है, और यही सबसे असामान्य बात है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 3, 2025
व्यंग रचनाएं
0
“अथ खालीदास साहित्यकथा” आज के साहित्य की खिचड़ी परोसती है। फेसबुकिये कविराज, ट्विटरबाज महंत, सेल्फी–क्वीन और रीलबाज कविगण – सब मंच से उतरकर मोबाइल स्क्रीन पर आ विराजे हैं। आलोचक चुहलबाज बने बैठे हैं और सत्य कोने में जम्हाई ले रहा है। लाइक–पुरुषों की अंगूठी साहित्य की असली मुहर बन चुकी है। यही है साहित्य का आज का फास्ट–फूड संस्करण।
Ram Kumar Joshi
Sep 12, 2025
व्यंग रचनाएं
0
मोगली सल्तनत का दरबार दो सदियों के बीच झूला झूलता है—एक ओर शाही खंजर, सुराही, घूंघरू; दूसरी ओर जींस, बीयर, पिज़्ज़ा और जिम। बादशाह की नीतियाँ अख़बारों से सीखी गईं, शहज़ादा सलीम ‘हैलो डैड’ कहकर बगावत की सूचना कुरियर से देता है। नर्तकी का ग्लास सिंहासन तक पहुँचता है, तलवारें जंग खाती हैं और घोड़े बेरोज़गार। सत्ता का तख़्त अंततः नृत्य-मंच में बदल जाता है—और जनता तमाशा देख हँसती।