चार्जर खोजता भविष्य और ज्ञान बाँटता अतीत

आजकल Gen Z का बड़ा शोर-शराबा चल रहा है। जब से आसपास के देशों में तख़्ता पलट जैसी घटनाएँ हुई हैं, तब से Baby Boomer पीढ़ी को भी कहीं-न-कहीं एक हल्की-सी आशा बँध गई है। वे लालची-सी नज़रों से Gen Z की तरफ़ देखते हैं—“कुछ तूफ़ानी करो यार!” जैसे यह देश जले तो वे भी अपने हाथ सेंक लें।
हमने भी सोचा—देखें तो सही, कहीं हमें भी Zen Z समझकर तो नहीं पुकारा जा रहा? खोजबीन की तो पता चला कि हम तो Gen X के हैं। हमारे बाद तो Gen Y भी आ चुकी है, जो हमारी ही तरह नाकारा साबित हुई। मुझे लगा—शायद यह सब नेट-स्पीड का मामला है। घर में दादा हैं तो उनका समय डायल-अप का है, पिता जी 4G पर अटके हुए हैं और बच्चा 5G की माँग ऐसे करता है जैसे यह कोई मूल अधिकार लिखवा कर लाया हो।

Gen Z से भी आगे अब Gen Alpha पीढ़ी है। यह क्या गुल खिलाएगी—इस पर थोड़ा विचार ज़रूरी है। Gen Alpha वह पीढ़ी है जिसने आँखें खोलते ही माँ का चेहरा बाद में देखा, मोबाइल की स्क्रीन पहले देखी। इनके लिए पहला लोरी-गीत मान लीजिए “लो-बैटरी वार्निंग” की बीप है और पहला खिलौना शायद रिमोट कंट्रोल।
Gen Alpha के बच्चे स्कूल बैग को ऐतिहासिक वस्तु मानते हैं। उन्हें लगता है यह कोई म्यूज़ियम पीस है, जिसे माता-पिता किसी भावनात्मक कारण से ढो रहे हैं। इनकी पढ़ाई ऐप में होती है, होमवर्क क्लाउड में जमा होता है और टीचर भी स्क्रीन के भीतर क़ैद रहते हैं—जो समय-समय पर किसी डिजिटल देवता की तरह प्रकट होते हैं। इन्हें अगर कोई कह दे कि “नेटवर्क चला गया”, तो यह वाक्य उतना ही भयावह होता है जितना हमारे लिए कभी “पानी नहीं आ रहा” हुआ करता था।

इन बच्चों का खेल-मैदान गली-कूंचे नहीं, लॉग-इन पेज है। दादी-नानी की कहानियाँ यूट्यूब के एल्गोरिदम में क़ैद हैं। राजा-रानी, जंगल-परी सब रिटायर हो चुके हैं; अब सुपरहीरो वही है जिसके पास सबसे ज़्यादा सब्सक्राइबर हैं। दूध की बोतल से ज़्यादा आकर्षण मोबाइल की बैटरी में है—चार्ज है तो जीवन है, डिस्चार्ज है तो अस्तित्व संकट मानो सामने खड़ा है।

जब ये बच्चे बड़े होंगे तो हो सकता है होमवर्क रोबोट करेगा और बच्चा उसे “गुड बॉय” कहकर रिव्यू देगा। रिश्ते भी एआई-थर्ड-मीडिएटर की सहायता से बनेंगे—डेट से पहले एल्गोरिदम बताएगा कि लड़ाई कब होगी और ब्रेक-अप किस दिन सुविधाजनक रहेगा। हो सकता है रोटी-पानी के जुगाड़ के साथ एआई वो काम करने लगे जो पापा नहीं कर पाते—क्योंकि पापा को अब एटीएम मशीन तो नहीं मन जाएगा , बस एक सवाल है—“पापा, वाई-फाई का पासवर्ड क्या है?” यही सवाल बाप-बेटे के रिश्ते तय करेगा। और सबसे बड़ा डर—“नेटवर्क डाउन तो नहीं?” माँ भी बच्चे को ऐसे ही डराएगी—“सो जा बेटा, नहीं तो नेटवर्क डाउन हो जाएगा।”

अगर पीछे मुड़कर देखें तो Gen X यानी हमारी वह पीढ़ी थी जिसने टाइपराइटर की खटखट में जीवन का संगीत सुना। प्रेम-पत्र लिखने में महीनों लगते थे और जवाब आने तक भावनाएँ पक-पक कर टपकने लगती थीं। बचत हमारा धर्म था और फिजूलखर्ची महापाप। जीन्स तब तक पहनी जाती थी जब तक वह स्वयं आत्मसमर्पण न कर दे। रिश्ते वायर्ड थे, इसलिए कटते कम थे।

Gen Y ने बीच का पुल बनाया। पेजर से मोबाइल, ऑर्कुट से लिंक्डइन तक का सफ़र इन्होंने तय किया। ज़िंदगी EMI पर चलने लगी, पर सपने अब भी फुल-एचडी में देखे जाते थे। प्यार प्रैक्टिकल हो गया—पैकेज, लोकेशन और भविष्य की प्लानिंग के साथ। वीकेंड का मतलब नेटफ्लिक्स और स्विगी, और सोमवार का मतलब कर्ज़ और EMI की याद।

फिर आए Gen Z। आते ही घोषणा कर दी—“रील है तो रियल है।” किताबें भारी लगने लगीं, ज्ञान मीम में सिमट गया। प्रेम-पत्र का युग समाप्त हुआ, एसएमएस भी पुराना पड़ गया; अब घोस्टिंग ही अंतिम संवाद है। लाइक मिलना आत्मसंतोष नहीं, अस्तित्व का प्रमाण हो गया।

और इन सबके बीच Gen Alpha खड़ा है—इतिहास से अनजान, भविष्य से बेपरवाह, वर्तमान में पूरी तरह चार्ज्ड। इतिहास की किताबें शायद लिखेंगी—मनुष्य पहले प्रकृति से डरता था, फिर भगवान से, और अंत में नेटवर्क डाउन से। घर की बातचीत अब ऐसी हो गई है—दादा कहते हैं, “हमारे ज़माने में पाँच रुपये में पेट भर जाता था।” पिता कहते हैं, “हमारे ज़माने में पाँच सौ में डेट हो जाती थी।” बच्चा कहता है, “आज पाँच सौ में बस ज़ोमैटो का डिलीवरी चार्ज कटता है।”

तीनों पीढ़ियाँ एक ही कमरे में हों तो दृश्य किसी रियलिटी शो जैसा लगता है—अतीत अभी ज्ञान देने में लगा है, वर्तमान अपने सपनों की बची-खुची साँसों का हिसाब लगा रहा है और भविष्य चार्जर ढूँढ रहा है। दादा रिश्तों की बात करते हैं, पिता नेटवर्क की, और बच्चा पूछता है—“हे गूगल, ये लोग क्या कह रहे हैं?”

शायद यही विकास है। इंसान ने आग जलाई, पहिया बनाया, कंप्यूटर खोजा और अब ऐसे बच्चे पैदा कर रहा है जो उससे पूछते हैं—“आप मैन्युअली इतना कैसे सोच लेते थे?” मूर्खता प्राकृतिक रूप से विकसित हो रही है, बुद्धिमत्ता कृत्रिम होती जा रही है। होते तो कहते—सभ्यता आगे बढ़ रही है, बस आदमी पीछे छूटता जा रहा है। और Gen Alpha? वह आगे नहीं देख रहा, पीछे नहीं देख रहा—बस स्क्रीन देख रहा है, पूरे विश्वास के साथ कि वहीं पूरी दुनिया है।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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