युद्धोन्माद, बाज़ार और डीप स्टेट : सभ्यता के कगार पर खड़ी मानवता

इतिहास हमेशा तलवार लेकर नहीं आता।
अक्सर वह शब्दों, नीतियों और व्यापारिक अनुबंधों की फाइलों में दबा-ढका प्रवेश करता है। जब तक हम पहचान पाते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आज जिस अंतरराष्ट्रीय टैरिफ युद्ध, आर्थिक प्रतिबंधों और राष्ट्रवादी उन्माद को हम “नीति” या “रणनीति” कहकर सामान्य बना रहे हैं, वह दरअसल उसी इतिहास का नया संस्करण है—अधिक सभ्य, अधिक तकनीकी, लेकिन उतना ही क्रूर।

युद्ध अब अचानक नहीं फूटता।
वह पहले बाज़ार में उतरता है।
वह पहले मुद्रा पर हमला करता है, फिर रोटी पर।
वह पहले रोज़गार छीनता है, फिर जीवन।

आज की दुनिया में युद्ध कोई अपवाद नहीं रहा, बल्कि एक प्रबंधित प्रक्रिया बन चुका है। इसे उकसाया जाता है, नियंत्रित किया जाता है, बेचा जाता है। राष्ट्राध्यक्ष सामने होते हैं, लेकिन फैसलों की डोर कहीं और खिंचती है—उस अदृश्य सत्ता-संरचना में, जिसे सुविधाजनक शब्दों में “डीप स्टेट” कहा जाता है। यह वह सत्ता है जो सरकारें बदलने पर भी नहीं बदलती; जो लोकतंत्र के भीतर रहते हुए लोकतंत्र से ऊपर काम करती है; और जिसे शांति से ज़्यादा युद्ध पर भरोसा है, क्योंकि युद्ध में ही उसका व्यापार फलता-फूलता है।

इतिहास इस स्थिति से अपरिचित नहीं है।
बीसवीं सदी में भी ऐसा ही हुआ था, बस तब शब्द थोड़े अलग थे। राष्ट्र का गौरव, अपमान का बदला, खोई हुई महानता की पुनर्प्राप्ति—इन नारों ने जनता को सम्मोहित किया। बेनितो मुसोलिनी ने रोम के अतीत का स्वप्न दिखाकर वर्तमान को युद्ध में झोंक दिया। एडोल्फ़ हिटलर ने आर्थिक हताशा और पहचान की राजनीति को हथियार बनाकर पूरी दुनिया को आग में धकेल दिया। इन दोनों के पीछे केवल व्यक्तिगत पागलपन नहीं था; उनके पीछे वह तंत्र था जो युद्ध से मुनाफ़ा देखता है, जो सत्ता के विस्तार में अपना भविष्य तलाशता है।

यह समझना ज़रूरी है कि इतिहास कभी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं होता। एक व्यक्ति केवल मुखौटा होता है; असली चेहरा वह व्यवस्था होती है जो उसके उन्माद को दिशा देती है। जब किसी शासक का अहंकार हथियार उद्योग के हितों से मिल जाता है, जब बाज़ार की भूख राष्ट्रवाद की भाषा बोलने लगती है, तब युद्ध लगभग अनिवार्य बना दिया जाता है। जनता को यह यक़ीन दिलाया जाता है कि यह युद्ध “ज़रूरी” है—सुरक्षा के लिए, अर्थव्यवस्था के लिए, संस्कृति के लिए। और जब युद्ध को ज़रूरी साबित कर दिया जाता है, तब नैतिकता अपने-आप गैरज़रूरी हो जाती है।

युद्ध में किसका भला होता है?
यह प्रश्न पूछना आज लगभग असुविधाजनक माना जाता है।

सैनिक मरते हैं—वे जिनके पास निर्णय का अधिकार नहीं होता।
नागरिक मरते हैं—वे जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं होता।
शहर उजड़ते हैं, सभ्यताएँ विस्थापित होती हैं, पीढ़ियाँ आघात के साथ जीना सीखती हैं।

और दूसरी ओर—हथियारों के शेयर चढ़ते हैं।
युद्ध सामग्री के ऑर्डर बढ़ते हैं।
“राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर बजट फुलाए जाते हैं।

युद्ध का सबसे स्थायी ग्राहक वही होता है जिसने युद्ध शुरू नहीं किया, लेकिन जिसने युद्ध को संभव बनाया।

मीडिया इस पूरी प्रक्रिया में एक निर्णायक भूमिका निभाता है। युद्ध को प्रश्न की तरह नहीं, तमाशे की तरह प्रस्तुत किया जाता है। बम “सटीक” हो जाते हैं, मौतें “कोलैटरल डैमेज” कहलाने लगती हैं, और लाशें आँकड़ों में बदल जाती हैं। स्क्रीन पर युद्ध एक रोमांचक दृश्य बन जाता है—ऐसा दृश्य जिसमें दर्द दिखाई नहीं देता, केवल रणनीति दिखाई देती है। जब युद्ध दृश्य बन जाता है, तब करुणा अदृश्य हो जाती है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि युद्ध को अब असामान्य नहीं माना जाता।
हम उसे जीवन की तरह स्वीकार करने लगे हैं—जैसे महँगाई, जैसे बेरोज़गारी, जैसे प्रदूषण।
यह स्वीकृति ही सबसे बड़ी हार है।

आज की दुनिया परमाणु हथियारों, जैविक युद्ध और साइबर हमलों के युग में जी रही है। अगला युद्ध केवल सीमाएँ नहीं बदलेगा; वह अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है। इसके बावजूद सत्ता-संरचनाएँ युद्ध को रोकने के बजाय उसे “मैनेज” करने की भाषा बोलती हैं। मानो विनाश भी अब एक प्रशासनिक प्रक्रिया हो।

मानवता इस पूरे परिदृश्य में सबसे कमजोर पक्ष है, क्योंकि उसके पास न बाज़ार है, न हथियार, न लॉबी। उसके पास केवल स्मृति है—और स्मृति बार-बार चेतावनी देती है। हर युद्ध के बाद यही प्रश्न उठता है: क्या यह टाला जा सकता था? और लगभग हर बार उत्तर होता है—हाँ, लेकिन चाहा नहीं गया।

जब शांति लाभकारी नहीं रह जाती, तब युद्ध नैतिक हो जाता है।
यही सभ्यता का सबसे खतरनाक मोड़ है।

आज आवश्यकता किसी नए हथियार की नहीं, बल्कि नए विवेक की है। उस विवेक की जो राष्ट्रवाद से ऊपर मनुष्यता को रख सके; जो बाज़ार से ऊपर जीवन को रख सके; जो सत्ता से यह सवाल पूछ सके कि उसका अस्तित्व मानवता के लिए है या मानवता उसके लिए।

इतिहास हमें बार-बार अवसर देता है—सीखने का।
लेकिन इतिहास यह भी दर्ज करता है कि हमने उन अवसरों के साथ क्या किया।

यदि हम आज भी युद्ध को अपरिहार्य मानते रहे,
यदि हम बाज़ार की भाषा को अंतिम सत्य मानते रहे,
तो आने वाली पीढ़ियाँ हमारे समय को उसी दृष्टि से देखेंगी—
जैसे हम उन युगों को देखते हैं जहाँ लोगों ने सब जानते हुए भी विनाश को चुना।

और तब इतिहास बहुत शांति से, बहुत ठंडे स्वर में लिखेगा—
मनुष्य के पास चेतना थी,
पर उसने उसे स्थगित कर दिया।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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