जवान दिल की भी गारंटी नहीं होती
मैं जब किसी तीस-पैंतीस वर्ष के युवक को यह कहते सुनता हूँ कि “डॉक्टर साहब, मेरी उम्र ही क्या है, मुझे हार्ट की बीमारी कैसे हो सकती है?”, तो मुझे सबसे पहले यही लगता है कि हमारी सबसे बड़ी समस्या बीमारी नहीं, यह भरोसा है कि बीमारी अभी दूर है। उम्र निश्चित रूप से एक जोखिम कारक है, लेकिन युवा होना कोई सुरक्षा कवच नहीं। पिछले कुछ वर्षों में, खासकर कोविड महामारी के बाद, हम सबने ऐसी घटनाएँ अधिक सुनीं और देखीं जिनमें अपेक्षाकृत कम उम्र के लोग अचानक गंभीर हृदय समस्या के साथ अस्पताल पहुँचे। हर ऐसी घटना का कारण कोविड नहीं होता, न ही हर युवा खतरे में है, लेकिन इतना जरूर है कि इस दौर ने हमें दिल की सेहत को उम्र के भरोसे छोड़ देने की गलती से बाहर आने का संकेत दिया है।
कोविड के बाद की दुनिया में एक बदलाव और आया है,हमारे शरीर से ज्यादा हमारी दिनचर्या बदल गई। महीनों की बंदिशें, घर से काम, स्क्रीन के सामने लंबे घंटे, अनियमित नींद, वजन बढ़ना, तनाव, चिंता और फिर अचानक उसी शरीर से अत्यधिक प्रदर्शन की अपेक्षा। कुछ युवा दिनभर कुर्सी पर बैठे रहते हैं और शाम को अचानक बहुत तेज जिम या भारी कसरत कर लेते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग फिटनेस के नाम पर शरीर को लगातार उसकी सीमा से आगे धकेलते रहते हैं। दिल को दोनों अतियाँ पसंद नहीं,न लगातार निष्क्रियता, न बिना तैयारी का अंधाधुंध परिश्रम।
दिल अक्सर बहुत सहनशील होता है। वह वर्षों तक चुपचाप हमारा साथ देता है। शायद इसी वजह से हम उसे हल्के में लेने लगते हैं। । वह चेतावनियाँ देर से देता है। ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है, शुगर सीमा पार हो रही है, कोलेस्ट्रॉल ठीक नहीं है, वजन पेट के आसपास बढ़ रहा है,फिर भी आदमी कहता है, “मैं तो बिल्कुल फिट हूँ।” फिट दिखना और हृदय की दृष्टि से फिट होना एक ही बात नहीं है। जिम में अच्छी बॉडी, तेज चाल, या दिनभर काम करने की क्षमता किसी को हृदय रोग से स्वतः मुक्त नहीं करती।
एक और क्षेत्र है जिसके बारे में युवाओं को गंभीरता से समझना चाहिए,हृदय की विद्युत प्रणाली। कुछ लोगों में जन्म से ऐसी इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी संबंधी गड़बड़ियाँ या कार्डियोमायोपैथी हो सकती हैं जिनके कोई स्पष्ट लक्षण वर्षों तक नहीं दिखाई देते। कुछ स्थितियों में पहली बड़ी घटना बेहोशी, गंभीर धड़कन की अनियमितता या अचानक कार्डियक अरेस्ट तक हो सकती है। इसे “साइलेंट हार्ट अटैक” कहना हमेशा सही नहीं होगा, क्योंकि हार्ट अटैक और विद्युत गड़बड़ी अलग समस्याएँ हैं। लेकिन दोनों हमें एक ही बात सिखाते हैं,लक्षण न होना, जोखिम न होने का प्रमाण नहीं है।
यहीं स्क्रीनिंग की बात आती है। मैं यह नहीं कहता कि हर युवा हर महीने दर्जनों जांच करवाता रहे। लेकिन बेसलाइन स्वास्थ्य मूल्यांकन को टालते रहना भी समझदारी नहीं। रक्तचाप, शुगर, लिपिड प्रोफाइल, पारिवारिक इतिहास और डॉक्टर द्वारा किया गया सामान्य हृदय मूल्यांकन हमें बहुत कुछ बता सकता है। जिन लोगों के परिवार में कम उम्र में अचानक मृत्यु, हार्ट अटैक, गंभीर अरिदमिया या कार्डियोमायोपैथी का इतिहास हो, जिन्हें बेहोशी, असामान्य धड़कन, व्यायाम के दौरान चक्कर, सीने में तकलीफ या असामान्य सांस फूलना हो, उनके लिए चिकित्सकीय जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जरूरत के अनुसार ECG, इकोकार्डियोग्राफी, होल्टर मोनिटरिंग या अन्य परीक्षण किए जा सकते हैं। कोई भी स्क्रीनिंग हर भविष्य की घटना की गारंटी नहीं देती, लेकिन जोखिम पहचानने का अवसर जरूर देती है।
मुझे आज के युवाओं में एक और चीज चिंतित करती है,तनाव को उपलब्धि का प्रमाण मान लेना। कम सोना, लगातार काम करना, हर समय ऑनलाइन रहना, कैफीन पर दिन चलाना और फिर कहना कि “यही तो उम्र है मेहनत की।” मेहनत जरूरी है, लेकिन शरीर को मशीन समझ लेना खतरनाक है। लगातार तनाव, खराब नींद, धूम्रपान, शराब, अनियमित भोजन और निष्क्रियता मिलकर हृदय पर ऐसी पृष्ठभूमि तैयार कर सकते हैं जिसका पता देर से चलता है।
इसी तरह फिटनेस का जुनून भी विवेक से जुड़ा होना चाहिए। अचानक भारी वजन उठाना, बिना तैयारी लंबी दौड़, बीमारी या बुखार के तुरंत बाद तीव्र व्यायाम, या शरीर के संकेतों को “कमजोरी” समझकर दबा देना समझदारी नहीं। व्यायाम दिल का मित्र है, लेकिन सही मात्रा, सही तैयारी और नियमितता के साथ। लंबे समय से निष्क्रिय व्यक्ति को सीधे अत्यधिक परिश्रम में कूदने के बजाय धीरे-धीरे क्षमता बढ़ानी चाहिए, खासकर यदि जोखिम कारक मौजूद हों।
मैं युवाओं से डरने को नहीं कह रहा। मैं केवल इतना कह रहा हूँ कि “मैं जवान हूँ” को मेडिकल रिपोर्ट मत मानिए। अपने शरीर से दोस्ती कीजिए। अपने ब्लड प्रेशर, शुगर, लिपिड, वजन को जानिये । परिवार में हृदय रोग का इतिहास हो तो उसे केवल पारिवारिक किस्सा न समझें। धड़कन अचानक बहुत तेज हो, बार-बार बेहोशी हो, व्यायाम में सीने में दबाव या असामान्य सांस फूलना हो तो इसे नजरअंदाज न करें। साल में एक बार अपने डॉक्टर से जोखिम की समीक्षा करा लेना कई बार उस समस्या को समय रहते पकड़ सकता है, जो बाहर से बिल्कुल दिखाई नहीं देती।
विश्व हृदय दिवस पर युवाओं से मेरी बस इतनी-सी बात है,अपनी जवानी पर भरोसा रखिए, लेकिन दिल की जांच से नहीं भागिए। न कुर्सी से चिपकी जिंदगी ठीक है, न शरीर को रोज युद्धभूमि बना देना। बीच का रास्ता ही सबसे सुरक्षित है,नियमित गतिविधि, पर्याप्त आराम, संतुलित व्यायाम, तनाव पर नियंत्रण और समय-समय पर उचित स्क्रीनिंग। क्योंकि दिल की बीमारी उम्र पूछकर दरवाजा नहीं खटखटाती; और समझदारी यही है कि दरवाजा खुलने से पहले हम घर के अन्दर की खबर लेते रहें।
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