डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 11, 2026
Health And Hospitals
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“यह समस्या केवल चिकित्सा जगत तक सीमित नहीं है।
यह समाज, मनुष्य, राजनीति, पर्यावरण और नैतिकता—सबमें एक साथ फैली हुई बीमारी है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हर जगह इलाज चल रहा है,
पर बीमारी ठीक नहीं हो रही—क्योंकि इलाज ही ग़लत है।”
आज की दुनिया में सबसे बड़ा संकट बीमारी का नहीं,
बल्कि बीमारी की पहचान का संकट है।
मन की बीमारियों के लिए मोटिवेशनल वीडियो,
पर्यावरण के लिए सम्मेलन,
राजनीति के लिए भावनात्मक नारे—
ये सब प्लेसीबो हैं।
जब नक़ली इलाज सामान्य हो जाता है,
तब असली मौतें सिर्फ़ आँकड़े बनकर रह जाती हैं।
Dr Shailesh Shukla
Feb 11, 2026
हिंदी कविता
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यह कविता आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ से उपजी थकान, आंतरिक रिक्तता और आत्मचिंतन की आवश्यकता को कोमल लेकिन गहरे दार्शनिक स्वर में व्यक्त करती है। यश, धन और शक्ति की आकांक्षाओं से मुक्त होकर शांति, प्रेम और करुणा को जीवन का वास्तविक सौभाग्य बताया गया है। मीरा, राम और वैराग्य के प्रतीकों के माध्यम से यह रचना विकास और शांति के संतुलन पर प्रश्न उठाती है और पाठक को ठहरकर अपने भीतर झाँकने का अवसर देती है।
Ram Kumar Joshi
Feb 11, 2026
हिंदी कविता
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यह कविता महानगर दिल्ली की चकाचौंध, अव्यवस्था और आम आदमी की असहजता पर तीखा, लेकिन हल्का-फुल्का व्यंग्य है। ‘बीबी कहाँ छिटक गई’ सिर्फ़ एक व्यक्ति के खोने की बात नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की स्थिति का रूपक है, जो महानगरीय भीड़, जेबकतरी, शोर और भ्रम में स्वयं को खो बैठता है। हाथी की पूँछ और हिलती डोर जैसी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ सत्ता, व्यवस्था और भ्रमजाल पर करारा कटाक्ष करती हैं। कविता सरल भाषा में शहरों की जटिल सच्चाई उजागर करती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 10, 2026
समसामयिकी
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सोना कोई उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि मानव आकांक्षाओं और असुरक्षाओं का सबसे चमकदार प्रतीक है। न वह भूख मिटाता है, न ठंड से बचाता है, फिर भी सदियों से उसे सबसे अधिक मूल्य दिया गया। इस लेख में सोने की बढ़ती कीमतों को बाज़ार की चाल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक मान्यताओं का परिणाम बताया गया है। कैसे हमने सोने को सम्मान, सुरक्षा, प्रतिष्ठा और विश्वास का पर्याय बना दिया—और बाज़ार ने इन्हीं भावनाओं को भुनाना सीख लिया। मंदिरों, बैंकों और आभूषणों में सिमटे सोने के माध्यम से यह रचना भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों पर गहन वैचारिक दृष्टि डालती है। यह लेख सोने से ज़्यादा मानव मन की कीमत पर सवाल उठाता है।
badk_anushka
Feb 9, 2026
Business talk
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यह लेख व्यक्तिगत वित्त की बुनियादी लेकिन ज़रूरी समझ को सरल हिंदी में प्रस्तुत करता है। इसमें वर्तमान आर्थिक स्थिति को समझने से लेकर कर्ज़ प्रबंधन, लक्ष्य निर्धारण, निवेश रणनीति, कार और घर जैसे बड़े फैसलों तक—हर विषय को व्यवहारिक उदाहरणों के साथ समझाया गया है। यह लेख उन सभी के लिए है जो पैसे को तनाव नहीं, साधन बनाना चाहते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 9, 2026
News and Events
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गोयल डेंटल क्लिनिक में डॉ. हिमांशु गोयल द्वारा 1 फरवरी से 31 मार्च 2026 तक संचालित निःशुल्क दंत चिकित्सा शिविर के अंतर्गत लायंस क्लब सार्थक परिवार के लिए विशेष शिविर आयोजित किया गया, जिसमें आधुनिक तकनीक से दंत परीक्षण, स्केलिंग एवं डिजिटल एक्स-रे की सुविधाएँ प्रदान की गईं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 9, 2026
व्यंग रचनाएं
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पेट की राजनीति बड़ी सीधी है—खाली पेट सिर्फ़ खाना माँगता है, भरा पेट सवाल। बब्बन चाचा के पेट से देश की प्रगति नापी जा सकती है, क्योंकि जहाँ खाना दिखा, वहाँ लोकतंत्र अपने आप चुप हो जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 8, 2026
Book Review
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यह भूमिका लेखक के आत्म-व्यंग्य, समाज से संवाद और व्यंग्य की सीमाओं पर एक चुटीला दार्शनिक वक्तव्य है। लेखक गंभीरता के पारंपरिक आग्रह को चुनौती देता हुआ बताता है कि व्यंग्य का उद्देश्य न तो अंतिम सत्य देना है, न उपदेश—बल्कि मुस्कान के बीच सोच का एक क्षण पैदा करना है। पुस्तक, पाठक और समाज—तीनों के बीच चलने वाली इस शाश्वत गलतफहमी को लेखक ने हल्के लेकिन तीखे अंदाज़ में प्रस्तुत किया है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 7, 2026
Humour
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Service without a selfie is like a donation without a receipt—you may have done it, but it can’t be proven.”
“Real faces are now for private use; public life runs on filters.”
“Travel no longer ends at the destination; it ends at the story highlight.”
“Everyone is a hero, every frame is the Mahabharata, and every filter slaughters the truth.”
“People don’t smile at people anymore—they smile only while taking selfies.”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 7, 2026
Cinema Review
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“कल रात ‘Binny and Family’ देखी… आज सुबह से मन में वही दृश्य घूम रहे हैं—जैसे दादाजी की खामोशी में पूरा परिवार बोल रहा हो।”
“यह फिल्म याद दिलाती है कि ‘पर्सनल स्पेस’ जरूरी है, लेकिन ‘किसी का होना’ उससे भी बड़ा सच है।”
“जब बॉलीवुड ‘एक्सट्रीम’ बेच रहा हो, तब ‘सामान्य’ परिवार दिखा देना भी एक साहसिक सिनेमा-क्रिया है।”